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सतना सीवर हादसा: बिना सुरक्षा उपकरणों के गड्ढे में उतरे मजदूर, मिथेन गैस से मौत – दो गंभीर, 21 माह में तीसरी जान गई, ठेका कंपनी और प्रशासन की लापरवाही पर सवाल

सतना में सीवर लाइन परियोजना फिर हादसे का कारण बनी। रीवा रोड पर सीवेज चेंबर में उतरे तीन सफाईकर्मी मिथेन गैस के रिसाव से बेहोश हो गए। एक मजदूर की मौत, दो गंभीर हालत में। 21 माह में 3 मौतें, 4 घायल। ठेका कंपनी की लापरवाही और प्रशासन की उदासीनता पर उठ रहे सवाल।

By: Yogesh Patel

Sep 26, 20256:31 PM

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सतना सीवर हादसा: बिना सुरक्षा उपकरणों के गड्ढे में उतरे मजदूर, मिथेन गैस से मौत – दो गंभीर, 21 माह में तीसरी जान गई, ठेका कंपनी और प्रशासन की लापरवाही पर सवाल

हाइलाइट्स

  • 21 माह में तीसरी मौत, सुरक्षा इंतजाम शून्य
  • ठेका कंपनी और विभागीय लापरवाही पर सवाल
  • मजदूरों की जान से हो रहा खिलवाड़, प्रशासन मौन

सतना, स्टार समाचार वेब

206 करोड़ की लागत से 9 साल पूर्व शुरू की गई सतना की सीवर लाइन परियोजना अब लोगों के साथ साथ अपने ही कर्मचारियों के जीवन के लिए काल साबित हो रही है। गुरुवार को रीवा रोड स्थित टोयटा शोरूम के सामने सीवर लाइन में उतरे तीन मजदूर मिथेन गैस के रिसाव से बेहोश हो गए। लेकिन ठेका कंपनी इन विराट  के कर्मचारी सभापुर थानांतर्गत पडुहार हाल मुकाम गणेश नगर नई बस्ती निवासी 37 वर्षीय संत कुमार कुशवाहा पिता राम शंकर कुशवाहा को बचाया नहीं जा सका। वह दो साल से इस कंपनी के लिए सीवर पर काम कर रहा था।  मौके पर मौजूद लोगों ने एम्बुलेंस से आॅक्सीजन सिलेंडर लेकर रस्सी की मदद से तीनों कर्मचारियों को बाहर निकाला और अस्पताल पहुंचाया। यहां डॉक्टरों ने एक कर्मचारी को मृत घोषित कर दिया। दो का इलाज जारी है। प्रत्यक्षदर्शियों का आरोप है कि तीनों कर्मचारी बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर में काम करने उतरे थे। 

कंपनी किसके संरक्षण में नियमों को धता बता रही है?

संत कुमार कुशवाहा की मौत के बाद यह सवाल उठने लगा है कि ठेका कंपनी की लापरवाही व विभागीय अधिकारियों की उदासीनता आखिर सीवर लाइन को पूरा करने के लिए अभी और कितनी बलि लेगी? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सीवर चेम्बरों की सफाई मैनुअली करने पर सख्त प्रतिबंध है तो फिर कंपनी किसके संरक्षण में इन नियमों को धता बता रही है? करार के अनुसार कंपनी को हाइड्रो जेटिंग मशीन, पावर रोडिंग, सीवर इंस्पेक्शन कैमरा जैसे उपकरणों से काम करना था, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों की जान से खेलते हुए बिना किसी सुरक्षा इंतजाम के काम कराया जा रहा है। न तो सेफ्टी गैजेट्स हैं और न ही मौके पर आपदा से निपटने की  व्यवस्था। गंभीर पहलू यह है कि बीते रविवार को भी पतेरी के पास दो मजदूर गैस के असर से बेहोश हो गए थे। बावजूद इसके जिम्मेदार न चेते और न ही किसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई। यही वजह है कि गुरुवार को एक और मजदूर को अपनी जान गंवानी पड़ी। प्रशासन और विभागीय अधिकारियों की यह उदासीनता मजदूरों की मौत के लिए कहीं अधिक जिम्मेदार है।

7 साल के बच्चे ने दी जानकारी

सफाई कर्मचारियों के सीवर लाइन के चेंबर में फंसे होने की जानकारी स्थानीय निवासी सौरभ सिंह को एक 7 साल के बच्चे ने दी। बच्चे को सीवर चेंबर से कुछ आवाजें सुनाई दीं, तो पास में मौजूद सौरभ को उसने बताया। सौरभ सिंह ने जब चेंबर के पास जाकर देखा, तो अंदर किसी की मौजूदगी समझ आई।

इस बीच मौके से दिवित हॉस्पिटल की एम्बुलेंस जा रही थी, उसे रोककर उससे आॅक्सीजन सिलेंडर लिया गया। फिर रस्सी के सहारे सौरभ सिंह चेंबर में उतरे और एक-एक कर सभी को बाहर निकाला गया। 2 कर्मचारियों की तो जान बच गई, लेकिन तीसरे की मौत हो चुकी थी। सौरभ सिंह की इस बहादुरी की अधिकारी भी तारीफ कर रहे हैं।

परिजन को 50 लाख मुआवजा मिलेगा

हादसे में मृत अमित कुमार कुशवाहा परिवार का इकलौता बेटा था। उसकी भी 4 बेटियां है। मृतक के परिजन को ठेका कंपनी की ओर से 20 लाख रुपए मुआवजा दिए जाने पर सहमति बनी है। वहीं, हादसे की एफआईआर के बाद नगर निगम भी 30 लाख रुपए परिजन को देगा।

21 माह में 3 श्रमिकों की मौत, 4 बाल-बाल बचे 

आंकड़े बताते हैं कि केवल पिछले 1 साल 9 माह में ही सीवर लाइन के काम के दौरान 3 मजदूरों की मौत हो चुकी है और 4 मौत के मुंह से लौटे हैं। गुरुवार को दो तो पांच दिन पूर्व रविवार को पतेरी के निकट सीवर लाइन पर ऐसे ही काम करते हुए  पीसी स्रेहल कंपनी के कर्मचारी अहरी टोला निवासी किशन परमार व आदर्श शुक्ला मिथेन गैस के दुष्प्रभाव से बाल-बाल बचे थे। राजेंद्र नगर वार्ड 26 सीवर लाइन में माउंटेन चैन के धंसकर गिर जाने से इसी साल 23 फरवरी को  सीधी जिले के मुनेश तिवारी की  मौत हो गई थी। इसी प्रकार 11 जनवरी 2024  को मारूति नगर की शारदा कालोनी में सीवर लाइन में काम कर रहे इनविराट कंपनी के कर्मचारी  खिलाड़ी कुशवाहा की सीवर के मलबे में दबकर मौत हुई थी।

इन लगातार हो रही मौतों से साफ है कि ठेका कंपनी मजदूरों को सस्ते साधन मान रही है और प्रशासन मूकदर्शक बनकर केवल गिनती का इंतजार कर रहा है। सवाल यह उठता है कि आखिर और कितने परिवार उजड़ने के बाद जिम्मेदार जागेंगे?

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