सतना जिले में वायरल फीवर का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। सबसे ज्यादा असर बच्चों पर देखा जा रहा है, जिनमें कोविड जैसे लक्षण पाए जा रहे हैं। जिला अस्पताल का पीकू वार्ड ओवरलोड हो गया है—20 बेड वाले वार्ड में 75 से ज्यादा बच्चे भर्ती हैं। कई बच्चों का बुखार पैरासिटामॉल से भी नहीं उतर रहा और एंटीबायोटिक डोज देनी पड़ रही है।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
जिले में बदले मौसम से संक्रामक बीमारियों का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। जिला अस्पताल में मरीजों की संख्या में रोजाना बढ़ोत्तरी देखने को मिल रही है। इलाज कराने आ रहा हर मरीज वायरल फीवर से ग्रसित मिल रहा है। बताया गया कि वायरल फीवर का सबसे ज्यादा प्रभाव इस समय बच्चों में देखने को मिल रहा है। सर्दी खांसी के साथ बच्चों का बुखार नहीं उतर रहा है। बच्चों में कोविड जैसे लक्षण नजर आ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार बच्चों में वायरल फीवर के लक्षण कोविड जैसे हैं। बच्चों के बुखार को उतारने के लिए कई बार दवाइयां तक बदलनी पड़ रही है। अगर बुखार फिर भी नहीं उतरा तो बच्चे को भर्ती करने की सलाह दी जा रही है। शिशु रोग विशेषज्ञ ने बताया कि जिला अस्पताल की पीडियाट्रिक ओपीडी रोजाना 200 के पार पहुंच रही है। यह केवल जिला अस्पताल के आंकड़े हैं। अगर बात पूरे जिले की करें तो यह आंकड़ा 500 तक पहुंच सकता है।
पीकू वार्ड ओवरलोड, 20 बेड के वार्ड में 75 से ज्यादा बच्चे भर्ती
चिकित्सकों के अनुसार बच्चों में वायरल फीवर, वायरल निमोनिया, वायरल दस्त कॉमन रूप से देखा जा रहा है। बच्चों में बुखार तेजी से चढ़ रहा है। प्लेटलेट्स और डब्ल्यूबीसी डाउन हो रहे हैं। कई बच्चों में स्क्रबटाइफस व डेंगू की पुष्टि भी हो रही है। वायरल फीवर के चलते जिला अस्पताल में स्थापित पीकू वार्ड ओवरलोड है। वर्तमान में 20 बेड के वार्ड में 75 से ज्यादा बच्चे भर्ती हैं। रोजाना 8 से 10 बच्चों को पीकू और बच्चा वार्ड में भर्ती की सलाह दी जा रही है। पीकू वार्ड में 15 दिन में 150 से अधिक बच्चों को भर्ती कर इलाज किया गया, जो की वायरल फीवर से पीड़ित थे। इसके अलावा स्क्रब टाइफस और मेनेंजाइटिस बीमारी से पीड़ित बच्चों को हायर सेंटर रेफर करना पड़ रहा है।
50 फीसदी बच्चों को एंटीबायोटिक डोज
इन भर्ती बच्चों में प्लेटलेट्स डाउन के मरीज ज्यादा हैं। इस वायरल फीवर के चलते बच्चों के दिमाग में सूजन आ रही है। कई बच्चों के दिमागी हालत तक खराब हो रहे हैं। चिकित्सक के अनुसार बुखार में दी जाने वाली पैरासिटामाल दवा भी काम नहीं आ रही है। भर्ती मरीजों व बच्चों का बुखार उतारने इनजेक्टेबल पैरासिटामाल दिया जा रहा है। इसके अलावा एंटीबायोटिक और एंटीएलर्जिक दवाओं का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। चिकित्सकों के अनुसार गंभीर स्थिति में एंटीबायोटिक दवाएं देना जरूरी होता है। वार्ड में भर्ती करीब 50 फीसदी बच्चों को एंटीबायोटिक डोज देना पड़ रहा है। जैसे ही बच्चा नार्मल होता है सामान्य दवाएं शुरू कर दी जाती हैं।
4 नर्सिंग स्टाफ के भरोसे पीकू वार्ड
जानकारी के मुताबिक जिला अस्पताल में संचालित पीकू वार्ड में केवल 4 नर्सिंग स्टाफ की तैनाती की गई है। वर्तमान में वार्ड की क्षमता से अधिक बच्चों के एडमिशन में बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। चूंकि एक बच्चे को वैसे भी एक स्टाफ द्वारा हैंडल नहीं किया जा सकता। इस कार्य में कम से कम दो स्टाफ की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि सभी बच्चों का डोज अलग-अलग निर्धारित होता है। बताया गया कि इस समय 20 बेड के वार्ड में 75 से जयादा बच्चे भर्ती हैं, यानि एक बेड में दो से तीन बच्चों को लिटाकर इलाज किया जा रहा है। वर्तमान में बच्चों को इंजेक्शन और दवाइयां देते-देते ही दो बज जाता है और स्टाफ के घर जाने का समय हो जाता है और अन्य कार्य के लिए दूसरे स्टाफ पर निर्भर रहना पड़ता है।
इस समय पीकू वार्ड ओवरलोड है। बच्चों में वायरल फीवर के केस सबसे ज्यादा आ रहे हैं। लक्षण कोविड जैसे ही हैं, बच्चों का बुखार उतरने में तीन से चार दिन का समय भी लग रहा है। गंभीर बच्चों को भर्ती की सलाह दी जा रही है। अगर बच्चे का शरीर गर्म लग रहा है या बच्चे को सर्दी-जुखाम है और बुखार नहीं उतर रहा है तो चिकित्सकीय सलाह जरूर लें।
डॉ. संजीव प्रजापति, शिशु रोग विशेषज्ञ एवं इंचार्ज पीकू वार्ड


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