पुलिस विभाग की अंदरूनी राजनीति, संबंधों का असंतुलन, पसंद-नापसंद से उपजी तकरार, और अफसरों की संवादहीनता की हकीकत को बारीकी से उजागर करता अमित सेंगर का व्यंग्यात्मक विश्लेषण। थानों से लेकर अफसरों की केबिन तक फैली चुप्पियों और शिकायतों का दिलचस्प दस्तावेज़।

बरकरार है रिश्ता
जिला भले बदल गया लेकिन रिश्ता नही बदला बल्कि रिश्ते में फेवीकोल के जोड़ जैसी मजबूती आ गई है। यह जरूर है कि इन रिश्तों की वजह से कुछ की नाराजगी बढ़ी है,नाराज होना भी स्वाभाविक है। दरअसल बात यह है कि पड़ोसी जिले से आने के बाद उस जिले के लोगों के हितों का ख्याल पूरी तरह रखा है,इनके कारण लोकल खिलाड़ी मैदान से बाहर हो चुके है। हांलाकि इनके द्वारा भरसक प्रयास किया गया कि कुछ छोटा-मोटा ही मिल जाए लेकिन हांथ अभी खाली ही है। इन रिश्तों की जब चर्चा होती है तो सफाई आती है कि साहब के राज में क्या यह संभव है! जो हो रहा सब नियम से। वहां के लोग नियम फॉलो कर रहे सो उनका काम हो रहा,बात भी सही कही जा रही हो तो सब नियम के दायरे में ही,पर सवाल भी लाजमी है कि आखिर लोकल खिलाड़ी नियम फॉलो क्यों नहीं कर पा रहा। वैसे जानने के लिए बता दे कि यह शाखा साहब के दफ्तर से बेहद नजदीक है।
इन्हें अपने ‘हिसाब’ का चाहिए प्रभारी
अरे भईया सब सही चल रहा है कुछ लोग होते ही हंै ऐसे कि वो कभी खुश हो नहीं सकते, अब उनकी खुशी के लिए विभाग के नियम तो नहीं बदले जा सकते,खुश रहो या नाराज, इससे कोई फर्क नही पड़ने वाला किसी को,जो उनका काम है वो करे बस। ऐसी चर्चा खाकी के गलियारे के एक चलायमान केंद्र के लोगों के बीच आम है। बात कुछ ऐसी है कि एक मोहतरमा की अपने प्रभारियों से बन नहीं रही । पहले के रहे हो या अभी की, कहानी वही पुरानी है। अब सवाल है कि आखिर इनका तालमेल बैठ क्यों नहीं पाता किसी से। कहा जा रहा कि इनकी मंशा है जो इन्हें पसंद हो प्रभारी उसी अनुरूप निर्णय ले, इनकी बातों को प्रमुखता दे,क्या करना है कैसे करना है इस पर चर्चा करें। अब प्रभारी कोई भी रहे वो तो निर्णय स्वयं लेगा वो भी अपने स्वविवेक से,आखिर जबावदेही तो प्रभारी की है मातहत की नहीं । मोहतरमा के इस रुख पर सहयोगी कहते सुनाई देते हं कि जाने दीजिए कुछ दिन में एक और स्टार लग जाएगा।
कहां तक सुने दर्द
आमतौर पर इंसान एक-दूसरे की मदद करता है ,सुख-दु:ख में साथ देता है,ऐसा करना भी चाहिए, आखिर इंसानियत यही है लेकिन कुछ महाशय ऐसे भी है कि सब सुख-सुविधा उपलब्ध होने के बाद भी दु:खी रहते हैं,जो कोई मिला उसके सामने अपना दुखड़ा रोने लगते है। इस मर्ज के शिकार साहब के दफ़्तर के एक महाशय हैं। इनके पास जो भी जाता है,उसे देखते ही ये शुरू हो जाते हैं । नियम-कायदों के पाठ पढ़कर अपनी काबिलियत की कहानी सुनाने लग जाते हैं। ,अंत में जुबां पर दर्द आ जाता है,यह देखो ऐसा हो रहा कोई देखने-सुनने वाला नही है। यह सुन-सुन कर यहां आने वाले लोग ऊब चुके हैं। कुछ कहो तो महाशय उखड़ जाते हैं, दरअसल महाशय गर्म मिजाज के है। इनके स्वभाव के कारण इनके कक्ष में जाने से लोग कतराने लगे,जाना कई बार मजबूरी रहती है,सो इनके पास जाने वाला यह कहते सुनाई देता है कि पता नहीं इस बार कौन सा दर्द सुनना पड़े।
कहीं बात बिगड़ न जाए
संवाद जरूरी है,संवादहीनता से रिश्तों में तल्खी आ जाती है,खासतौर से खाकी को संवादहीनता से बचना चाहिए,लेकिन उर्जाधानी में पदस्थ एक साहब अलग ही रवैया अपनाए हुए हैं। इनके ‘बोल-वच्चन’ से बनी हुई बात बिगड़ रही है,इनके ‘बोल बच्चन’ की बाते साहब तक पहुंच चुकी है लेकिन समझाइश का कोई फर्क नजर नहीं आ रहा। ये महाशय विभाग की खबरों को लेकर खासे चिंतित नजर आते है। इनकी मंशा रहती है कि वही तस्वीर पेश की जाए जो विभाग की छवि पर चाँद-तारे लगा दे। आईना दिखाने पर आइना ही फोड़ने पर एतारू हो जाते हैं और बताने लगते है कानूनी प्रकिया। पहले तो सोचा गया ऐसा स्वभाव होगा या फिर कोई गलतफहमी होगी,लेकिन इन साहब ने एक-एक कर या यूं कहें कि टारगेट पर टारगेट साधने लगे। इनके तौर-तरीके को लेकर विभाग में आवाजें उठने लगी,कहा जाने लगा कि मामला कुछ जातीय नजर आ रहा है। मामला क्या है यह उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना जिम्मेदार कुर्सी पर बैठ कर यंू बोल-बच्चन करना। हाल-फिलहाल मुद्दे को कुछ के हस्तक्षेप के कारण ठंडा कर दिया गया,पर तौर-तरीका यही रहा तो दुष्प्रभाव रिस्तों पर पड़ेगा। ऐसे में जरूरी है कि साहबान इन्हें संवाद और रिश्तों की अहमियत बताए।

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