उज्जैन में चैत्र नवरात्रि की महाअष्टमी पर श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी द्वारा आयोजित नगर पूजा की पूरी जानकारी। जानें 24 खंबा मंदिर की परंपरा और मदिरा भोग का महत्व।
By: Ajay Tiwari
Mar 26, 20264:02 PM
उज्जैन। स्टार समाचार वेब
धर्मधानी उज्जैन में चैत्र नवरात्रि के अंतिम चरण में महाअष्टमी के शुभ अवसर पर गुरुवार को एक अनूठी और प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया गया। श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी के तत्वावधान में आयोजित 'नगर पूजा' ने पूरे शहर को भक्ति और उल्लास के रंग में सरोबोर कर दिया। इस धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत विश्व प्रसिद्ध 24 खंबा माता मंदिर से हुई, जहाँ माता महामाया और महालया देवी की विशेष आरती और पूजन किया गया। परंपरा के अनुसार, यहाँ देवी को मदिरा (मदिरा की धार) का भोग लगाया गया, जो अवंतिका नगरी की प्राचीन तांत्रिक और लोक परंपराओं का हिस्सा माना जाता है।
इस भव्य आयोजन की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत अरविंद पुरी महाराज स्वयं सम्मिलित हुए। उनके साथ महामंडलेश्वर प्रेमानंद महाराज और शैलेषानंद जी महाराज सहित विभिन्न अखाड़ों के शीर्ष संत-महंतों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। अखाड़ा परिषद के प्रबंधक डॉ. राहुल कटारिया ने बताया कि यह नगर पूजा उज्जैन की संस्कृति का अभिन्न अंग है, जिसे सदियों से निभाया जा रहा है। यहाँ तक कि कोरोना काल जैसी कठिन परिस्थितियों में भी इस परंपरा की निरंतरता को टूटने नहीं दिया गया था, जो भक्तों की अटूट आस्था को दर्शाता है।
नगर पूजा यात्रा की सबसे खास बात इसकी विशालता और कठिन मार्ग है। लगभग 28 किलोमीटर लंबे इस यात्रा मार्ग पर कोटवार अपने हाथों में मिट्टी की हांडी लेकर चले, जिसमें से लगातार मदिरा की धार जमीन पर गिरती रही। यह माना जाता है कि यह अनुष्ठान शहर की सुख-शांति और सुरक्षा के लिए किया जाता है। यात्रा के दौरान रास्ते में पड़ने वाले सभी प्रमुख देवी और भैरव मंदिरों में विशेष पूजन किया गया, जहाँ देवताओं को ध्वज अर्पित किए गए और चोला चढ़ाया गया। बैंड-बाजों की मधुर धुन और "जय माता दी" के उद्घोष से पूरा वातावरण गुंजायमान रहा।
लंबी पदयात्रा और नगर भ्रमण के पश्चात यह यात्रा बड़नगर रोड स्थित श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी पहुंची। यहाँ पूरी श्रद्धा के साथ कन्या पूजन का आयोजन किया गया, जिसमें नन्ही कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया गया और उन्हें उपहार भेंट किए गए। इसके बाद एक विशाल भंडारे का आयोजन हुआ, जिसमें न केवल अखाड़ों के संत और महात्मा शामिल हुए, बल्कि प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि और हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण किया।