जब किस्मत और मेहनत साथ हो तो फिर बिगड़े हुए काम भी बन जाते हैं। कुछ ऐसा ही भारत की डिस्कस थ्रोअर महिला खिलाड़ी सीमा कालीरमन के साथ हुआ है। सीमा ने ग्लास्गो में खेले जा रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। सीमा ने 58.65 मीटर का अपना बेस्ट थ्रो फेंका और मेडल जीता।

पीएचडी होल्डर सीमा ने रोमांचक मुकाबले में पदक किया अपने नाम
कमबैक स्टोरी युवाओं खासकर महिला एथलीटों के लिए प्रेरणा बनेगी
बेटे के जन्म के सिर्फ 11 माह बाद दोबारा प्रोफेशनल स्पोर्ट्स में वापसी
ग्लासगो। स्टार समाचार वेब
जब किस्मत और मेहनत साथ हो तो फिर बिगड़े हुए काम भी बन जाते हैं। कुछ ऐसा ही भारत की डिस्कस थ्रोअर महिला खिलाड़ी सीमा कालीरमन के साथ हुआ है। सीमा ने ग्लास्गो में खेले जा रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। सीमा ने 58.65 मीटर का अपना बेस्ट थ्रो फेंका और मेडल जीता। पढ़ाई, परिवार और खेल- तीनों जिम्मेदारियों को निभाते हुए उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती। सीमा कालीरामना की यह कमबैक स्टोरी हजारों युवा खिलाड़ियों, खासकर महिला एथलीटों के लिए प्रेरणा बनेगी। दरअसल, भारत की सीमा कालीरामना ने सिर्फ पदक नहीं हासिल किया, बल्कि अपनी जिंदगी के सबसे कठिन दौर को भी जीत लिया। हरियाणा की इस 27 वर्षीय एथलीट ने मातृत्व के बाद शानदार वापसी करते हुए देश के लिए ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। खास बात यह रही कि सीमा ने अपने बेटे रुद्र के जन्म के सिर्फ 11 महीने बाद दोबारा प्रोफेशनल स्पोर्ट्स में वापसी की थी।
तीसरे राउंड में किया 58.65 मीटर का थ्रो
यह मेडल उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था। तीसरे राउंड में किया गया 58.65 मीटर का थ्रो आखिर तक उनके लिए पदक सुनिश्चित करने वाला साबित हुआ। इसके बाद वह लगातार तीन प्रयासों में फाउल कर बैठीं, लेकिन उनके चेहरे पर खुशी तब आई जब आखिरी प्रतिद्वंद्वी भी उनसे आगे नहीं निकल सकी।
तीसरे प्रयास में हासिल कर ली दूरी
फाइनल की शुरुआत सीमा कालीरामना के लिए अच्छी नहीं रह। पहले ही प्रयास में उनका थ्रो फाउल हो गया। दूसरे राउंड में उन्होंने 57.32 मीटर का थ्रो किया और फिर तीसरे प्रयास में 58.65 मीटर की दूरी हासिल कर ली। यही वह थ्रो था जिसने उन्हें पदक की दौड़ में मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया। इसके बाद चौथे, पांचवें और छठे प्रयास में वह कोई वैध थ्रो नहीं कर सकीं।
सीमा का ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो गया
ऐसे में उनकी नजरें बाकी खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर टिकी थीं। कैमरून की मोनी नोरा आतिम आखिरी खिलाड़ी थीं, जो सीमा कालीरामना को पदक की रेस से बाहर कर सकती थीं। उन्हें ब्रॉन्ज जीतने के लिए 58.65 मीटर से आगे थ्रो करना था, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकीं। जैसे ही उनका अंतिम प्रयास खत्म हुआ, सीमा का ब्रॉन्ज मेडल पक्का हो गया।
खेल के साथ-साथ पढ़ाई में भी आगे
सीमा कालीरामना की यह सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि यह आसान परिस्थितियों में नहीं आई। वह सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय एथलीट नहीं हैं, बल्कि भिवानी स्थित चौधरी बंसीलाल विवि से फिजिकल एजुकेशन में पीएचडी भी कर रही हैं। मातृत्व के बाद उन्होंने अपने शरीर को दोबारा प्रतिस्पर्धी स्तर पर लाने के लिए लंबा संघर्ष किया। फिटनेस, ताकत और तकनीक हासिल करने में कई महीने लगे।
पति ने निभाई कोच की भूमिका
सीमा के पति रविंद्र उर्फ मोनू कालीरामना खुद नेशनल लेवल के डिस्कस थ्रोअर रह चुके हैं और इस पूरे सफर में उनके कोच भी रहे। मां बनने के बाद वापसी करने वाली सीमा कालीरामना ने 2025 के नेशनल गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर संकेत दे दिया था कि वह फिर से अपनी सर्वश्रेष्ठ लय में लौट रही हैं। इसके बाद उन्होंने उसी आत्मविश्वास को कॉमनवेल्थ गेम्स में बरकरार रखा और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए पदक जीत लिया।
निधि रानी मेडल से चूकीं
भारत की दूसरी डिस्कस थ्रोअर निधि रानी भी पूरे मुकाबले में पदक की दावेदार रहीं। उन्होंने 57.10 मीटर का सर्वश्रेष्ठ थ्रो किया, लेकिन आखिर में चौथे स्थान पर रहीं और मामूली अंतर से मेडल से चूक गईं। जमैका की सामंथा हॉल ने 61.66 मीटर के साथ गोल्ड मेडल जीता, जबकि कनाडा की जूलिया टंक्स ने 60.67 मीटर का थ्रो कर सिल्वर अपने नाम किया।
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