साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर उठती बहस केवल एक लेखक या कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदी साहित्य में सम्मान की कसौटियों, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और समय पर मूल्यांकन जैसे व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है।

चयन प्रक्रिया और उपेक्षित उत्कृष्ट कृतियों पर आवश्यक पुनर्विचार
साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर उठती बहस केवल एक लेखक या कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदी साहित्य में सम्मान की कसौटियों, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और समय पर मूल्यांकन जैसे व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है।
कमलाकर सिंह
इन दिनों ममता कालिया को उनके संस्मरणात्मक लेखन ‘जीते जी इलाहाबाद’ पर मिले साहित्य अकादमी पुरस्कार की चर्चा व्यापक रूप से हो रही है। अखबारों, सोशल मीडिया विशेषकर फ़ेसबुक, पर इसको लेकर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी—“आखिर मिल ही गया ममता कालिया को साहित्य अकादेमी पुरस्कार”—ने इस बहस को और तीखा बना दिया। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि किसी लेखक को पुरस्कार मिलने पर इस तरह की प्रतिक्रिया क्यों उत्पन्न होती है। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें यह पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था। कुछ लोगों ने तो उनकी समग्र रचनात्मकता को ही औसत बताया । इन बातों पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करता, परंतु बड़ा प्रश्न यह है कि इस पुरस्कार का आधार लेखक होता है या कृति?
हिंदी साहित्य में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ महत्त्वपूर्ण रचनाकारों को समय रहते सम्मान नहीं मिला। रमेश चंद्र शाह और रमेश कुंतल मेघ के संदर्भ में यह बात कही जाती रही है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे महान रचनाकार को उनके जीवनकाल में यह सम्मान नहीं मिला, और धर्मवीर भारती जैसे महत्वपूर्ण साहित्यकार भी इससे वंचित रह गए। यह स्थिति पुरस्कार-प्रक्रिया के मानदंडों पर पुनर्विचार की माँग करती है। हिंदी जैसी विशाल भाषा, जिसके करोड़ो पाठक हैं, उसमें यदि पुरस्कारों की संख्या और संरचना सीमित रहेगी तो अनेक योग्य रचनाकार अनदेखे रह जाएँगे। ऐसे में विभिन्न विधाओं के लिए पृथक पुरस्कारों की व्यवस्था एक सार्थक विकल्प हो सकता है। यह भी देखा गया है कि कई महत्त्वपूर्ण कृतियाँ समय पर सम्मान से वंचित रह जाती हैं, जबकि कभी-कभी कम प्रभावी रचनाएँ भी पुरस्कृत हो जाती हैं। इसलिए आवश्यक है कि साहित्य अकादमी अपनी चयन-प्रक्रिया और ज्यूरी संरचना को अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी बनाए, ताकि हाशिए पर छूटते हुए लेखकों को भी समान अवसर मिल सके। यह पुरस्कार केवल सम्मान का प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और बौद्धिक प्रवाह को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
इसी संदर्भ में आनंद कुमार सिंह की काव्यकृति ‘अथर्वा मैं वही वन हूँ’ विशेष ध्यान आकर्षित करती है जो साहित्य अकादमी की विचारणीय सूची में शीर्ष पर थी। वर्ष 2021 में प्रकाशित यह कृति अल्प समय में ही हिंदी-जगत में व्यापक विमर्श का केंद्र बन गयी। अशोक वाजपेयी जी ने 28 नवंबर 2021 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली में कृति के लोकार्पण समारोह में, जहाँ मैं उपस्थित था, कहा था-“ कविता में भाषा का एक काम यह है कि वो वहाँ ले जाए जहाँ पहले कविता कभी न गयी हो, न भाषा कभी गयी हो। मेरे हिसाब से इस पुस्तक की एक प्रशस्ति ये हो सकती है कि इसने भाषा और कविता दोनों को वहाँ ले जाने की कोशिश की है जहाँ कम से कम पिछले पचास वर्षों में हिंदी कविता नहीं गयी है।”
अनेक विश्वविद्यालयों में इस पर शोध हो रहे हैं तथा आलोचनात्मक ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं। किसी काव्यकृति के प्रकाशन के कुछ वर्षों के भीतर इस प्रकार की बौद्धिक सक्रियता कम ही देखने को मिलती है। यह कृति समकालीन हिंदी साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। ऐसे समय में जब गंभीर साहित्य के लिए पाठकीय आधार सिकुड़ता प्रतीत होता है, यह कृति एक नयी संभावना का संकेत देती है।
आनंद कुमार सिंह की यह कृति उनकी छब्बीस वर्षों की साधना का परिणाम है, जो अपने समय की आलोचना करते हुए भारतीय ज्ञान-परंपरा का काव्यात्मक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है। उनकी अन्य कृतियाँ—‘सौंदर्य जल में नर्मदा’ और ‘विवेकानंद’—भी इस सृजनात्मक ऊँचाई की पुष्टि करती हैं। ‘अथर्वा मैं वही वन हूँ मुक्त छंद में महाकाव्य की रचना को संभव बनाती है और हिंदी के लिए एक गौरवग्रंथ के रूप में उपस्थित है।
साहित्य किसी भी सभ्यता की आत्मा होता है। आज जब समाज तीव्र गति से तकनीक-निर्भर होता जा रहा है, साहित्य की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वर्ष 2025 का साहित्य अकादमी पुरस्कार ममता कालिया को मिला, यह स्वागतयोग्य है; किन्तु अब कृति पर गंभीरता से विचार होना चाहिए, जो अपने समय को अभिव्यक्त करने के साथ-साथ साहित्य को नयी दिशा देने की क्षमता रखती है।
लेखक पूर्व कुलपति, भोपाल हैं

जबलपुर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा 100% वेतन और एरियर्स

खरमास 2025-2026: कब से कब तक रहेगा, जानें शुभ कार्यों की मनाही का कारण

जैतवारा से लेकर बारामाफी तक आक्रोश

ऑपरेशन सिंदूर...मुझे एक तस्वीर दिखा दो...जिसमें भारत का एक गिलास भी नहीं टूटा हो

लागू होंगे नए अवकाश नियम: CCL में वेतन कटौती, EL को 'अधिकार' नहीं मानेगा MP वित्त विभाग

आहत जनता को राहत...निचले स्तर पर आई थोक महंगाई

सुरक्षित और नेचुरल तरीके से बाल करना है काले तो अपनाएं ये उपाय

बची हुई चाय को दोबारा गर्म करके पीने क्या होगा, जानें इसके बारे में?

अगर 40 की उम्र कर ली है पार और रहना चाहते हैं तंदरुस्त तो अपनाएं ये आदतें

ठंडा पानी पीने और मीठा खाने पर दांतों में होती है झनझनाहट तो हो जाएं सावधान, नहीं तो हो सकती है बड़ी समस्या

ठंड में बढ़ जाती है डिहाइड्रेशन की समस्या, जानें क्या है कारण ?

तनाव से चाहिए है छुटकारा तो इन चीजों से करें तौबा, अपनाएं ये सलाह
इतिहास में कुछ संस्थाएँ ऐसी रही हैं, जिन्होंने सीमाओं, राजनीति, धर्म और राष्ट्रीयताओं से ऊपर उठकर मानवता की सेवा को अपना मूल धर्म बनाया है। विश्व रेडक्रास दिवस पर विशेष
जानिए क्यों मनाया जाता है विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई)। लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस का महत्व, पत्रकारों के सामने आने वाली चुनौतियां और डिजिटल युग में पत्रकारिता की नैतिकता पर विशेष आलेख।
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर विशेष आलेख। जानें भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग, पंचशील सिद्धांत और आज के अशांत समय में बुद्ध के विचारों की प्रासंगिकता।
क्या नए श्रम कानून भारतीय मजदूरों को सशक्त बना रहे हैं या असुरक्षित? पढ़ें 1 मई मजदूर दिवस पर विशेष विश्लेषण—मजदूरी, गिग इकोनॉमी और श्रमिकों के अधिकारों की जमीनी हकीकत।
28 अप्रैल को मनाए जाने वाले 'विश्व कार्यस्थल सुरक्षा दिवस' पर विशेष आलेख। जानें कार्यस्थल पर सुरक्षा के मौलिक अधिकार, मानसिक स्वास्थ्य और सुरक्षा नियमों का महत्व
वर्ल्ड बुक डे (World Book Day) हर साल 23 अप्रैल को क्यों मनाया जाता है? जानें इसके पीछे का इतिहास, यूनेस्को की भूमिका और दुनिया की सबसे बड़ी किताब के बारे में रोचक तथ्य।
महावीर जयंती पर विशेष आलेख: जानें भगवान महावीर के जीवन, तपस्या और अहिंसा-अपरिग्रह के सिद्धांतों के बारे में। कैसे उनके विचार आज के आधुनिक युग की समस्याओं का समाधान हैं।
साहित्य अकादमी पुरस्कार को लेकर उठती बहस केवल एक लेखक या कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हिंदी साहित्य में सम्मान की कसौटियों, चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और समय पर मूल्यांकन जैसे व्यापक प्रश्नों को सामने लाती है।
23 मार्च "विश्व मौसम विज्ञान दिवस" पर विशेष आलेख। विस्तार से जानें कैसे मानवीय स्वार्थ प्रकृति का विनाश कर रहे हैं और बदलता मौसम क्यों पूरी जीवसृष्टि के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।