गलत हैं वे लोग जो कहते हैं कि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी काम नहीं करते। वे लापरवाह और कामचोर होते हैं। ऐसा कहने वाले और मानने वाले दरअसल, उनकी मेधा शक्ति और नवाचार करने वाले उर्वरा मस्तिष्क की क्षमता को बेहद कम करके आंक रहे हैं। ...

प्रमोद शर्मा
गलत हैं वे लोग जो कहते हैं कि सरकारी अधिकारी-कर्मचारी काम नहीं करते। वे लापरवाह और कामचोर होते हैं। ऐसा कहने वाले और मानने वाले दरअसल, उनकी मेधा शक्ति और नवाचार करने वाले उर्वरा मस्तिष्क की क्षमता को बेहद कम करके आंक रहे हैं। मेरी दृष्टि में सरकारी मुलाजिमों के बराबर हुनरमंद, अक्लमंद और कर्मठ कोई व्यक्ति होता ही नहीं है। उनके द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले ‘असरकारी‘ कार्यों की न केवल प्रशंसा होनी चाहिए, अपितु इसके लिए उन्हें पुरस्कृत भी किया जाना चाहिए।
हाल ही में एक खबर यह आई कि सरकार ने अस्पतालों में डाक्टरों की समय पर उपस्थिति के लिए सार्थकएप लांच किया। इसके जरिए ही हाजिरी लगाने का कार्य शुरू किया गया। सरकार को उम्मीद थी कि अब कोई डाक्टर बिना जानकारी के अस्पताल से गायब नहीं हो सकेगा। सरकार की इस मंशा के विपरीत उर्वराशील मस्तिष्क के धनी कुछ धन्वंतरि अवतारों ने नवाचार करते हुए इसका तोड़ निकाल लिया। उन्होंने दो मोबाइल लिए। एक स्थायी रूप से अस्पताल में ही तैनात कार दिया और दूसरा अपने पास रखा। अपने पास के मोबाइल से वे फोटो खींच कर ड्यूटी पर उनके एवज में तैनात मोबाइल पर डालते और वहां से निश्चित समय पर वह मोबाइल उसे सार्थक एप पर अपलोड करके अपनी ड्यूटी को ‘सार्थक‘ कर देता। चूंकि मोबाइल अस्पताल में ही है तो लोकेशन का झंझट ही नहीं रहा।
हालांकि कुछ विघ्नसंतोषी लोगों और नवाचार के विरोधी रूढ़िवादी तत्वों को यह हुनर रास नहीं आया और उन्होंने इसे सार्वजनिक कर दिया। वास्तव में ऐसे लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस विचार के भी प्रबल विरोधी ही कहे जाएंगे, जिसमें वे नित प्रति लोगों से नवाचार करने, अपने स्टार्टअप आरंभ करने और अपनी क्षमता और दक्षता का अधिकाधिक उपयोग करने की अपील करते रहते हैं।
वैसे, हमारे समाज और सिस्टम में ऐसे नवाचारी लोगों की कमी नहीं है। बस, उन्हें समुचित अवसर, महत्व, अवसर और सम्मान नहीं दिया जा रहा है। ऐसे हुनरमंद मुलाजिम अन्य सरकारी महकमों में भी पाए जाते हैं। समय-समय पर उनके हुनर सरकार और समाज के सामने आते भी रहते हैं, लेकिन उनको बढ़ावा देने की बजाय सरकार उन्हें उपेक्षित ही करती रही है।
शिक्षा विभाग में ऐसे हुनरमंद और बहुपयोगी दिमाग रखने वाले गुरूजनों की कमी नहीं है। पूर्व में ऐसे नवाचारी शिक्षकोें के बारे में पता चला था, उन्होंने स्वयं विद्यालय जाने के बजाय अपने ‘मजूर‘ रख लिए थे। वास्तव में उनका यह कार्य बहुआयामी ही था। कम बुद्धि के लोग इसे समझ नहीं पाए, यह बात अलहदा है। इस एक स्टार्टअप के माध्यम से वे सरकार की मदद ही कर रहे थे। भले ही उनका कार्य सेतु निर्माण में गिलहरी के समतुल्य था तो भी उन्होंने समाज की बेरोजगारी को दूर करने में अपना अतुलनीय योगदान किया। दूसरे, शहर से गांव के स्कूल तक जाने में जो पेट्रोल खर्च होता वह बचा, इससे देश की तेल की खपत कम हुई। तीसरे, वाहन से होने वाले वायु प्रदूषण पर भी अंकुश लगा ही होगा। इससे उन्होंने ओजोन परत के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाई और पाने पर्यावरण प्रेमी होने का प्रमाण प्रस्तुत किया। उनके बिना स्कूल भी आत्मनिर्भर बनने की दिशा में चल पड़े थे। एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने सरकार को यह दृष्टि भी प्रदान की कि जिस कार्य के लिए सरकार उनपर हज्जारों रुपए फूंक रही है, वही कार्य वे हजारक रुपल्ली में भी करा सकते हैं। यदि सरकार उनके इस नवाचार को स्वीकार कर लेती तो सरकारी बजट पर भी भार कम होता। उल्टे उनकी योजना पर विचार किए बिना ही आव देखा न ताव सरकार ने उनके खिलाफ कार्रवाई कर दी थी। यह तो सरासर अन्याय ही कहा जाएगा।
अस्पतालो में हाल ही में हुए नवाचार के बारे में मेरा सरकार के लिए सुझाव है कि अभी भी देर नहीं हुई है। वह इस पर गंभीरता से विचार करे और नवाचार से होने वाले फायदों का आंकलन करने के लिए हो सके तो एक कमेटी बना दे। इसके कई प्रकार के लाभ सामने आ सकते हैं। पहला तो यही होगा कि सरकारी अस्पतालों में मरीज ही आना कम हो जाएंगे। इससे विभाग को आंकड़ों की बाजीगरी करने की झंझट से मुक्ति मिलेगी और सरकारी आंकड़ों में स्वतः ही मरीजों की संख्या कम हो जाएगी। इससे सरकार आसानी से सूबे को स्वस्थ सूबों की पांत में खड़ा कर अपनी पीठ थपथपा सकेगी।
मेरा एक सुझाव ऐसे नवाचारी मुलाजिमों के लिए यह है कि वे अपना एक मजबूत संगठन बनाएं। यदि सरकार ऐसे मुलाजिमों पर कार्रवाई करने की हिमाकत करे तो सड़कों पर उतरें और ईंट से ईंट बजा दें। सरकार को बताया जाए कि भला, कोई भी व्यक्ति नवाचार कर विकास की नवीन राह बनाने के कार्य को कैसे बाधित कर सकता है? हमें देश को विकास के शिखर पर ले जाना। इसके लिए ऐसे युगांतरकारी और नवीन प्रयास करने ही पड़ेंगे। यह कार्य अस्पताल जैसी भीड़भाड़, मरीजों की चीख-पुकार और उत्साहहीनता के वातावरण में तो हो नहीं सकता। इसके लिए एक हवादार बंगला, बंगले के बाहर लॉन, लॉन में लगे रंग-बिरंगे फूल, उन फूलों पर मंडराती तितलियों के बीच अपनी सहधर्मिणी के साथ चाय की चुस्कियां लेते हुए ही हो सकता है। जिन भी धन्वंतरि वंशजों ने सार्थकएप का उपयोग सार्थक रूप से करके देश के विकास में सार्थक पहल करने की प्रक्रिया का श्रीगणेश किया है, वे पुरस्कार के भागी होने चाहिए, न कि नोटिस के। तनिक विचार करा, सरकार!

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