सतना जिले की उचेहरा तहसील के धनिया गांव के पास सात धाराओं के बीच खुले आसमान में विराजमान हैं भूतेश्वर महादेव। सावन के तीसरे सोमवार को यहां भक्तमंडल द्वारा 16 श्रृंगार किया जाता है। मान्यता है कि रात्रि में भूत-प्रेत महादेव की आराधना करते हैं, जिससे इनका नाम 'भूतेश्वर' पड़ा। बारिश में जलमग्न होकर भी शिवलिंग की महिमा कम नहीं होती।

हाइलाइट्स
उचेहरा, स्टार समाचार वेब
आस्था और विश्वास यह ऐसे शब्द हैं जो किसी के ऊपर लादे और थोपे नहीं जा सकते। जहां जिसकी श्रद्धा होगी और विश्वास होगा, वह वहां पर नतमस्तक हो जाएगा। बातें कुछ भी हो, चर्चा कुछ भी हो, कोई कुछ भी कहे लेकिन सच्चाई का पलड़ा हमेशा भारी रहता है, जो यहां पर इस समय में भी स्पष्ट रूप से देखने को मिल रहा है। ऐसी ही आस्था का केन्द्र है उचेहरा तहसील अंतर्गत परसमनिया जाने वाले मार्ग में स्थित धनिया गांव के आगे सात धाराओं के बीच में विराजे भूतेश्वर महादेव। गौरतलब है कि यहां पर लोगों की अपार श्रद्धा और विश्वास देखने को मिलता है। पूरे पहाड़ी अंचल से बरसात में सात धाराओं के माध्यम से पानी बहता हुआ नजर आता है और इन धाराओं के बीच में है विशाल शिवलिंग, जिनके ऊपर आज तक कोई भी छत का सहारा भी नहीं बनवा सका, और खुले आसमान में ही भूतेश्वर महादेव विराजमान है।
कैसे पड़ा नाम भूतेश्वर
कहते हैं हर किसी नाम के पीछे कोई न कोई कहानी अवश्य रहती है। ऐसी ही एक कहानी भूतेश्वर महादेव के लिए भी जानी जाती है। बताते हैं कि भूतेश्वर महादेव में रात के समय अदृश्य शक्तियां तरह-तरह के ढोल-नगाड़े बजाकर नृत्य करते हैं, जिनकी आवाज सड़क तक सुनाई देती है। कहते हैं कि यहां रात में भूतों का बसेरा रहता है और भूत ही इन महादेव की पूजा करते हैं। जिसके चलते इन महादेव का नाम भूतेश्वर महादेव पड़ गया।
सावन में होता है भव्य श्रृंगार
बताया गया है कि इस समय सावन का महीना चल रहा है। 28 जुलाई को सावन का तीसरा सोमवार है, इस दिन भूतेश्वर महादेव का भक्त मंडल के द्वारा 16 श्रृंगार किया जाएगा, जिसकी छटा अद्भुत रहती है। बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि जो भी भूतेश्वर महादेव में अपनी भावना लेकर आता है, उसका परिणाम उसकी भावना के अनुसार मिलता है। यहां पर दूर-दूर से श्रद्धालु भक्त आते हैं और अपनी मन्नत पूरी करते हुए नजर आते हैं ।
देखते बनता है नजारा
कहते हैं कि चारों तरफ से घने जंगल के बीच में बैठे भूतेश्वर महादेव बरसात में जल मग्न हो जाते हैं और कई दिनों तक दर्शन नहीं देते, फिर भी श्रद्धालु नदी में ही अपना फल प्रसाद अर्पण करते हुए नजर आते हैं।


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