चित्रकूट के ऐतिहासिक मुखारबिंद मंदिर में पहली बार प्रभु कामतानाथ के नाम से बैंक खाता खोला गया। भक्त अब क्यूआर कोड स्कैन कर ऑनलाइन चढ़ोत्री भी कर सकेंगे। दान पेटी से निकली ₹1.05 लाख की राशि को बैंक में जमा कराया गया। संत निर्वाणी अखाड़े को प्रबंधन से हटाकर मंदिर की जिम्मेदारी अब प्रशासन के अधीन है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की तपोस्थली चित्रकूट स्थित प्राचीन मुखारबिंद मंदिर की दानपेटियों को प्रशासन ने गुरुवार को खोला और उससे मिली दान राशि को बैंक में जमा कराया। यह पहला मौका है कि जब प्रशासन ने प्रभु कामतानाथ के नाम पर बैंक खाता खुलवाया और खाते में दान की राशि भी जमा कराई। सूत्रों के अनुसार प्राचीन मुखारबिंद मंदिर में रखी तीन पेटियों में से एक दानपेटी खोली गई है जिसमें से निकली 1 लाख 5 हजार रुपए की राशि को बैंक में जमा कराया गया। प्रशासन ने प्राचीन मुखारबिंद में आॅनलाइन चढोत्री की भी व्यवस्था की है। इसके लिए बकायदे मंदिर परिसर में क्यू आर कोड लगाए गए हैं ताकि भीड़ होने पर प्रभु कामतानाथ के भक्त कोड स्केन कर आॅनलाइन चढोत्री चढ़ा सकें। अधिकारियों के अनुसार क्यू आर कोड के जरिए सात समुंदर पार रहने वाला भक्त भी आॅनलाइन चढोत्री चढ़ाकर अपनी भक्तिभावना का इजहार कर सकता है।
अखाड़ा को पृथक कर प्रशासन ने सम्हाली कमान
दान पेटियों को संत निर्वाणी अखाड़ा यज्ञ वेदी मंदिर के महंत सत्य प्रकाश द्वारा रखाया गया था, हालांकि बाद में संत निर्वाणी को प्राचीन मुखारबिंद की व्यवस्था से अलग कर दिया गया और प्रशासन ने इसकी व्यवस्थाओं को अपने अधीन कर लिया है।
गिनती में जुटा रहा अमला
गुरुवार की सुबह भी तहसीलदार कमलेश सिंह भदौरिया के नेतृत्व में प्रशासनिक अमले की टीम दान पेटी में रखी राशि की गणना में जुटी रही। माना जा रहा है कि अभी 2 और दान पेटियों से लाखों की राशि निकल सकती है।
हर मंदिर पर नजर की दरकार
कामतानाथ प्राचीन मुखारबिंद की कमान सम्हाल कर प्रशासन ने एक कदम भले बढाया हो लेकिन चित्रकूट में अभी भी 40 से अधिक ऐसे मंदिर हैं जिनको प्रशासनिक नजर का इंतजार है। गौरिहार मंदिर, प्राचीन सती अनुसुइया मंदिर, मलाहन मंदिर जैसे कई मंदिर हैं जो दुर्दशा के शिकार हैं। चित्रकूट के वासिंदों के अनुसार मुखारविंद का प्राचीन मंदिर तो बेहतर रखरखाव से चल रहा था लेकिन इस मंदिर की व्यवस्था देखने वाले संत निर्वाणी अखाड़ा को व्यवस्था से पृथक कर दिया गया। जबकि उन मंदिरों को यूं ही छोड़ दिया गया जिनको वास्तव में प्रशासनिक देखरेख की दरकार है। चित्रकूटवासियों का मानना है कि चूंकि मुखारबिंद मंदिर में चढ़ावा मोटा आता है इसीलिए प्रशासन ने उसमें रुचि दिखाई है जबकि शेष मंदिरों में चढोत्री बेहद कम है इसलिए उन्हें यूं ही छोड़ दिया गया है।


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