स्थानीय इतिहास के अनुसार गांधीजी 28 जनवरी 1931 को सतना आए थे। रेलवे क्षेत्र में पीपल के नीचे सभा का उल्लेख मिलता है, लेकिन आज उस ऐतिहासिक स्मृति की प्रमाणिक पहचान सुरक्षित नहीं है।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
आज गांधी जयंती है। एक बार फिर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आदर्शों को याद किया जाएगा। उनके बताए रास्ते पर चलने, सत्य-अहिंसा को जीवन में उतारने और सामाजिक समरसता का संकल्प लेने की बड़ी-बड़ी बातें होंगी। सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में आयोजन होंगे, गांधी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण होगा और बापू के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के संकल्प दोहराए जाएंगे। लेकिन इसी अवसर पर सतना के पास अपनी एक ऐसी ऐतिहासिक स्मृति को याद करने का मौका भी है, जिसे समय की धूल ने लगभग ढक दिया है। स्थानीय इतिहास के अनुसार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी 28 जनवरी 1931 को सतना आए थे और यहां एक जनसभा को संबोधित किया था।
गांधीजी के सतना आगमन का उल्लेख पूर्व विधानसभा अध्यक्ष शिवानंद द्वारा लिखित पुस्तक ‘सतना नगर : प्रारम्भ से सन 1950 तक’ तथा वरिष्ठ इतिहासकार स्वर्गीय चिंतामणि मिश्रा की पुस्तक ‘मेरी बस्ती मेरे लोग’ में मिलता है। स्थानीय ऐतिहासिक विवरण के अनुसार रेलवे क्षेत्र के समीप एक पीपल के पेड़ के नीचे गांधीजी ने लोगों को संबोधित किया था। सभा में उन्होंने सामाजिक भेदभाव और अस्पृश्यता के विरुद्ध जागरूकता का संदेश दिया तथा समाज के वंचित वर्ग के लिए सहयोग की अपील की थी। यानी सतना की धरती पर गांधी की उपस्थिति महज एक राजनीतिक पड़ाव नहीं थी, बल्कि उनके सामाजिक सरोकारों का भी महत्वपूर्ण प्रसंग थी।
बापू की स्मृति का वह पेड़ कहां है?
आज जब उस ऐतिहासिक घटना को करीब 95 वर्ष हो चुके हैं, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस स्थान पर कभी गांधीजी की आवाज गूंजी थी, उसकी स्मृति को सतना ने कितना सहेजकर रखा? स्टार समाचार ने जंयती की पूर्व संध्या पर जब रेलवे परिसर में बापू की उस यात्रा के साक्षी रहे पीपल के पेड़ की तलाश की तो प्रमाणिक तौर पर न तो प्रशासनिक नुमाइंदा और न ही जनप्रतिनिधि या संगठनों से जुड़े लोग, कोई यह बताने की स्थिति में नहीं मिला कि वह पेड़ कौन सा था। जिस पेड़ के नीचे बैठकर गांधीजी ने सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई थी, उसकी पहचान तक का सुरक्षित न रहना अपने आप में हमारी ऐतिहासिक स्मृति पर सवाल खड़ा करता है। गांधी जयंती और पुण्यतिथि पर उनकी याद में आयोजन होते रहे हैं। प्रतिमाओं पर पुष्प अर्पित किए जाते हैं, उनके विचारों को याद किया जाता है। लेकिन गांधीजी के सतना आगमन से जुड़ी स्मृतियों और संभावित धरोहरों को सहेजने की दिशा में गंभीर पहल दिखाई नहीं देती। यदि उस पीपल के पेड़ की प्रमाणिक पहचान सुरक्षित होती, उसके पास एक छोटा सा स्मृति-चिह्न होता और वहां गांधीजी के सतना आगमन का इतिहास अंकित होता तो यह स्थान नई पीढ़ी के लिए किताबों से कहीं अधिक जीवंत पाठशाला बन सकता था।
इतिहास सिर्फ किताबों में क्यों रहे?
गांधीजी का सतना आना इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि यह उस दौर की याद दिलाता है जब देश स्वतंत्रता आंदोलन के निर्णायक चरण में था। गांधी का संघर्ष केवल अंग्रेजी शासन से मुक्ति तक सीमित नहीं था। सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और असमानता के खिलाफ उनकी लड़ाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। सतना में दिया गया उनका संदेश इसी व्यापक सोच से जुड़ा हुआ था। आज जब नई पीढ़ी इतिहास को जानने के लिए पुस्तकों और डिजिटल माध्यमों का सहारा लेती है, तब उसके अपने शहर में मौजूद इतिहास की जीवित निशानियों का संरक्षण और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बापू के सतना आगमन का प्रमाण केवल किसी पुस्तक के पन्ने तक सीमित न रहे, बल्कि शहर की जमीन पर भी उसकी कोई पहचान दिखाई दे, यह जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, समाज और इतिहास के प्रति जागरूक संस्थाओं की भी है। गांधी जयंती पर इसलिए सतना के सामने एक संकल्प का अवसर है-प्रतिमा पर माल्यार्पण से आगे बढ़कर उस ऐतिहासिक स्थल की तलाश हो, उपलब्ध दस्तावेजों और बुजुर्गों की स्मृतियों के आधार पर उसकी प्रमाणिक पहचान की जाए और यदि वह स्थान चिन्हित हो सके तो वहां स्मृति-चिह्न स्थापित किया जाए।
आज सात बंदियों को मिलेगी आजादी
महात्मा गांधी जयंती का दिन केंद्रीय जेल सतना में बंद सात दण्डित बंदियों के लिए नई शुरूआत लेकर आएगा। 2 अक्टूबर को आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे सात बंदियों को राज्य शासन द्वारा घोषित परिहार का लाभ मिलने के बाद जेल से रिहा किया जाएगा। जेल मुख्यालय के आदेश के तहत इनकी रिहाई की प्रक्रिया पूरी की जा रही है। रिहा होने वालों में मैहर जिले का 1 पुरुष बंदी, छतरपुर जिले का 1 पुरुष बंदी तथा पन्ना जिले के 4 पुरुष बंदी और 1 महिला बंदिनी शामिल हैं। इनमें चार बंदी ऐसे हैं, जो खुली जेल सतना में रहकर अपनी सजा भुगत रहे थे। दरअसल, परिहार का आशय शासन के निर्धारित नियमों के अनुसार पात्र बंदियों की सजा में नियमानुसार छूट दिए जाने से है। महात्मा गांधी जयंती के अवसर पर होने वाली यह रिहाई इन बंदियों के लिए लंबे कारावास के बाद सामान्य जीवन में लौटने का अवसर होगी। जेल प्रशासन द्वारा सभी संबंधित बंदियों की रिहाई से जुड़ी आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जा रही है।

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