सेवा सहकारी समिति कोटर में सूचना पटल पर वर्षों पुरानी जानकारी प्रदर्शित है। स्थानांतरित और मृत कर्मचारियों के नाम हटाए नहीं गए हैं। किसानों को सही जानकारी नहीं मिलने से पारदर्शिता और निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
शासन की योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लगाए गए सूचना पटल ही यदि वर्षों पुरानी जानकारी दिखाएं तो विभागीय मॉनिटरिंग पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ऐसा ही मामला सेवा सहकारी समिति कोटर में सामने आया है जहां समिति भवन में लगे सूचना पटल पर न केवल पर्दा डाला गया है, बल्कि उस पर दर्ज कर्मचारियों की जानकारी भी वर्षों से अपडेट नहीं की गई है। स्थिति यह है कि सूची में ऐसे कर्मचारियों के नाम आज भी दर्ज हैं जिनका लंबे समय पहले अन्य स्थानों पर स्थानांतरण हो चुका है। इतना ही नहीं, कुछ ऐसे कर्मचारियों के नाम भी सूचना पटल पर मौजूद हैं जिनका निधन हो चुका है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा सूचना पटल को अद्यतन कराने की आवश्यकता नहीं समझी गई।सूचना पटल किसी भी सहकारी संस्था का वह माध्यम होता है, जिसके जरिए किसानों को समिति की कार्यप्रणाली, जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों की जानकारी मिलती है। लेकिन कोटर समिति में यह व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। किसानों का कहना है कि जब समिति में किसी कार्य के लिए पहुंचते हैं तो उन्हें यह तक नहीं पता चलता कि वर्तमान में कौन कर्मचारी पदस्थ है और किससे संपर्क किया जाए।
निरीक्षण व्यवस्था पर भी उठे सवाल
सूचना पटल की यह स्थिति केवल एक बोर्ड की लापरवाही नहीं बल्कि पूरे निरीक्षण तंत्र की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। सहकारी समितियों का समय-समय पर निरीक्षण किए जाने और व्यवस्थाओं की समीक्षा के दावे किए जाते हैं, लेकिन यदि वर्षों से पुरानी जानकारी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित हो रही है तो यह स्पष्ट संकेत है कि निरीक्षण या तो हो नहीं रहे या फिर केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी निजी संस्था में ऐसी स्थिति होती तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई तय होती, लेकिन सरकारी तंत्र में जवाबदेही तय नहीं होने से लापरवाही लगातार बढ़ती जा रही है।
किसानों को नहीं मिल रही सही जानकारी
सूचना पटल का मुख्य उद्देश्य किसानों को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह उद्देश्य पूरा होता नहीं दिख रहा। किसानों का कहना है कि खाद वितरण, ऋण, समर्थन मूल्य खरीदी और अन्य योजनाओं से संबंधित जानकारी भी नियमित रूप से प्रदर्शित नहीं की जाती, जिससे उन्हें बार-बार कर्मचारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
पारदर्शिता के दावों पर प्रश्न
एक ओर सरकार सहकारी संस्थाओं में पारदर्शिता और सुशासन की बात करती है, वहीं दूसरी ओर कोटर समिति का सूचना पटल इन दावों की वास्तविक तस्वीर सामने रख रहा है। मृतक और स्थानांतरित कर्मचारियों के नामों का वर्षों तक बने रहना यह दशार्ता है कि रिकॉर्ड अद्यतन करने और व्यवस्थाओं की निगरानी को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।
क्या कहते हैं किसान
किसानों का कहना है कि यदि सूचना पटल ही सही जानकारी नहीं देगा तो पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी। उन्होंने मांग की है कि समिति के सूचना पटल को तत्काल अपडेट किया जाए, वर्तमान कर्मचारियों की सूची प्रदर्शित की जाए तथा इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। सवाल यह है कि जब किसानों के लिए बनाई गई सबसे बुनियादी सूचना व्यवस्था ही वर्षों से उपेक्षित है, तो सहकारी समितियों की अन्य व्यवस्थाओं की निगरानी किस स्तर पर हो रही होगी?


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