उज्जैन में युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने मानव अहंकार पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि दुनिया इंसान की मर्जी से नहीं, बल्कि प्रकृति के शाश्वत नियमों से चलती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में उज्जैन की पावन भूमि पर आयोजित ‘युवा धर्म संसद’ को संबोधित करते हुए मानव जीवन, अहंकार और प्रकृति के सनातन नियमों पर बेहद गहरे और दार्शनिक विचार साझा किए। अपने इस विशेष संबोधन के दौरान उन्होंने आधुनिक युग में इंसान के भीतर बढ़ते जा रहे श्रेष्ठता के भ्रम और नियंत्रण की लालसा पर तीखा प्रहार किया। मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में समझाया कि मनुष्य भले ही अपनी तकनीकी प्रगति और विकास के बल पर खुद को सर्वशक्तिमान समझने की भूल कर बैठे, लेकिन इस ब्रह्मांड का संचालन किसी इंसान की मर्जी से नहीं बल्कि प्रकृति के अटल और शाश्वत नियमों के अनुसार ही होता है।
अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए मोहन भागवत ने इंसानी फितरत पर बात करते हुए कहा कि मनुष्य अक्सर अपने अहंकार में इतना अंधा हो जाता है कि वह यह मान बैठता है कि इस पूरी दुनिया में केवल उसी की सत्ता चलती है। इंसान यह सोचने लगता है कि सृष्टि की हर एक छोटी-बड़ी चीज़ उसकी व्यक्तिगत इच्छा और सुविधा के अनुसार ही संचालित होनी चाहिए। हालांकि, वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह मुगालता या भ्रम इंसान के पतन का कारण बनता है, क्योंकि ब्रह्मांड की विशालता के आगे व्यक्तिगत अहंकार का कोई अस्तित्व नहीं है।
प्रकृति और मानव नियंत्रण के संबंध को समझाते हुए आरएसएस प्रमुख ने बहुत ही सरल और सटीक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अहंकार से ग्रस्त हो जाता है, तो वह यह भूल कर बैठता है कि प्राकृतिक नियम उसकी मर्जी के गुलाम नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर, सूर्य का अपने तय समय पर उदय होना और शाम को अस्त होना पूरी तरह से निश्चित है। कोई भी ताकतवर व्यक्ति या उसका अहंकार इसमें रत्ती भर भी बदलाव नहीं कर सकता। मोहन भागवत ने कहा कि आप इन नियमों को मानें या न मानें, सूर्य अपने तय विधान से ही चलेगा। ठीक इसी प्रकार धर्म और प्रकृति के सार्वभौमिक नियम भी इंसान के इनकार या स्वीकृति से बेअसर होकर निरंतर अपना काम करते रहते हैं।
समाज में धर्म को लेकर फैली पुरानी रूढ़ियों और गलतफहमियों पर बात करते हुए मोहन भागवत ने प्रसन्नता व्यक्त की कि आज का युवा वर्ग अहंकार और आधुनिक भटकाव से ऊपर उठकर धर्म के मूल स्वरूप पर विचार कर रहा है। उन्होंने समाज की इस आम और अहंकारी धारणा को सिरे से खारिज किया कि धर्म केवल बुजुर्गों या रिटायरमेंट के बाद का विषय है। लोग अक्सर यह गलती करते हैं कि श्रीमद्भागवत गीता और रामायण जैसे ग्रंथों को सिर्फ बुढ़ापे में पढ़ने की चीज मानते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि धर्म और इसके नैतिक नियम सृष्टि के आरंभ से लेकर अंत तक और जीवन के हर एक क्षण में प्रासंगिक व अनिवार्य हैं।
इस कार्यक्रम की सबसे खास बात यह रही कि मोहन भागवत ने किसी भी प्रकार के औपचारिक मंच या पद के अहंकार को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। उन्होंने शुरुआत में ही स्पष्ट कर दिया कि वे यहां कोई विद्वतापूर्ण या लंबा-चौड़ा भाषण देने नहीं आए हैं, बल्कि उपस्थित युवाओं, माताओं, बहनों और नागरिकों के साथ एक सहज और आत्मीय संवाद स्थापित करने आए हैं। उन्होंने मंच की औपचारिकता को छोड़कर बैठकर बात करने का निर्णय लिया, जो इस बात का जीवंत उदाहरण था कि वास्तविक ज्ञान और धर्म का आदान-प्रदान हमेशा अहंकारमुक्त होकर ही संभव हो सकता है।

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