राहुल गांधी ने भोपाल में 'संगठन सृजन अभियान' शुरू कर 2028 विधानसभा चुनावों का ब्लूप्रिंट पेश किया। जानें कैसे जीतू पटवारी के साथ उनकी जुगलबंदी, मोदी पर तीखा हमला और 'गुजरात मॉडल' की रणनीति कांग्रेस को मध्य प्रदेश में फिर से मजबूत करेगी। क्या कांग्रेस का 23 साल का वनवास होगा खत्म?

मध्य प्रदेश की सियासी बिसात पर कांग्रेस के 'युवराज' राहुल गांधी ने भोपाल में 'संगठन सृजन अभियान' की शुरूआत की। राहुल ने न केवल पार्टी को 2028 के विधानसभा चुनावों के लिए तैयार करने का ब्लूप्रिंट पेश किया, बल्कि मध्य प्रदेश में ढाई दशक से सत्ता से दूर कांग्रेस की खोई जमीन वापस पाने का संकल्प भी दोहराया. यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि उस 'करो या मरो' की स्थिति में कांग्रेस की एक बड़ी छलांग की कोशिश माना जा सकता, जिसके बाद या तो पासा पलटेगा, या फिर कांग्रेस का इंतजार और लंबा हो जाएगा.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने जिस गर्मजोशी से राहुल गांधी का स्वागत किया, और जिस तरह दोनों नेता एक साथ मंच पर दिखे, वह किसी सांकेतिक संदेश से कम नहीं था. पटवारी का राहुल के जातिगत जनगणना पर दिए गए बयान को 'भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण दिन' बताना, और यह दावा करना कि राहुल ने मोदी को भी अपनी बात मानने पर मजबूर किया, यह दर्शाता है कि कांग्रेस अब अपनी रणनीति में अधिक मुखर और आक्रामक होने जा रही है. यह जुगलबंदी पार्टी कार्यकर्ताओं में एक नई ऊर्जा का संचार कर सकती है, और यह दिखा सकती है कि प्रदेश नेतृत्व दिल्ली से मिले निर्देशों पर पूरी तरह खरा उतरने को तैयार है.
राहुल गांधी का प्रधानमंत्री मोदी पर 'संविधान माथे पर लगाने' को मजबूर करने का बयान, और भाजपा पर 'संविधान विरोधी' होने का आरोप, कांग्रेस की नई चुनावी रणनीति का स्पष्ट संकेत देता है. 2024 के लोकसभा चुनावों में 'संविधान बचाओ' के नारे की सफलता को देखते हुए, कांग्रेस अब इसे 2028 में मध्य प्रदेश में भी भुनाने की कोशिश करेगी. 'ऑपरेशन सिंदूर' और 'सीजफायर' पर मोदी को घेरना यह भी दिखाता है कि राहुल अब राष्ट्रीय मुद्दों को भी क्षेत्रीय राजनीति से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं. यह हमला भाजपा को रक्षात्मक मुद्रा में ला सकता है, खासकर तब जब भाजपा अपने राष्ट्रीय एजेंडे को लेकर आत्मविश्वास से भरी हुई है.
राहुल का यह दौरा सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं था. प्रदेश कार्यकारिणी, ऑब्जर्वर्स और जिला अध्यक्षों के साथ गहन मंथन ने यह साफ कर दिया कि कांग्रेस अब सिर्फ दिल्ली के निर्देशों पर चलने वाली पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने पर ध्यान देगी. 'भितरघातियों' को बाहर का रास्ता दिखाने का ऐलान, संगठन में नई ऊर्जा भरने का प्रयास है, जो अतीत में कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण रहा है. गुजरात मॉडल की तर्ज पर मध्य प्रदेश में पार्टी को नई दिशा में ले जाने की बात, यह दर्शाती है कि कांग्रेस अब दूसरे राज्यों के सफल मॉडलों से सीखने को तैयार है. हालांकि, क्या गुजरात मॉडल मध्य प्रदेश में फिट बैठेगा, यह देखना दिलचस्प होगा, क्योंकि दोनों राज्यों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां काफी अलग हैं.
क्या यह 'टर्निंग पॉइंट' है?
2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार और 2024 के लोकसभा चुनावों में सभी 29 सीटों पर भाजपा की जीत ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया है. ऐसे में राहुल गांधी का यह दौरा 'करो या मरो' की स्थिति में संजीवनी का काम कर सकता है. संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने, कार्यकर्ताओं में जोश भरने, और सामाजिक न्याय व संविधान की रक्षा जैसे मुद्दों को उठाकर भाजपा को घेरने की यह रणनीति, कांग्रेस के लिए 2028 में सत्ता के दरवाजे खोल सकती है.
क्या सिर्फ एक दौरे और एक ब्लूप्रिंट से 23 साल का वनवास खत्म हो पाएगा? क्या जीतू पटवारी और राहुल की जुगलबंदी भाजपा के अभेद्य गढ़ को भेद पाएगी? या फिर भाजपा का 'विजय रथ' यूं ही चलता रहेगा, और कांग्रेस को एक और चुनाव के लिए इंतजार करना पड़ेगा? इन सवालों का जवाब आने वाले चार सालों में मध्य प्रदेश की सियासी फिजा ही देगी. फिलहाल, राहुल गांधी ने जो चिंगारी सुलगाई है, वह कितनी बड़ी आग में बदल पाती है, यह समय ही बताएगा.

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