रीवा स्कूल शिक्षा विभाग में 23 वर्ष पहले लेखापालों को नियम विरुद्ध अन्वेषक पद पर पदोन्नति देने का मामला हाईकोर्ट में खारिज हो गया। कर्मचारियों को मूल पद पर लौटना होगा, हालांकि वेतन वसूली से राहत मिली है।

हाइलाइट्स
रीवा, स्टार समाचार वेब
स्कूल शिक्षा विभाग का एक नया मामला सामने आया है। 23 साल पहले पांच लेखापाल को तत्कालीन डीईओ ने नियम विरुद्ध अन्वेषक पद पर प्रमोट किया था। मामले में शासन ने सभी को डिमोट कर दिया था। आदेश को चार लोगों ने हाईकोर्ट में चैलेंज किया था। हाईकोर्ट ने भी मामला खारिज कर दिया है। 17 साल बाद फैसला आया है। कर्मचारियों को हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली। अब उन्हें डिमोट किए गए पदों पर वापस लौटना होगा।
आपको बता दें कि रीवा का स्कूल शिक्षा विभाग किसी ने किसी मामले में विवादों में ही बना रहता है। यह नियम विरुद्ध काम करने वालों की होड़ सी मची है। ऐसा नहीं है कि यहां हाल ही में ऐसी प्रथा चल पड़ी हो। यह सिलसिला काफी पुराना है। अब नया मामला लेखापाल से गलत तरीके से अन्वेषक के पद पर पदोन्नति का सामने आया है। वर्ष 2003 में पांच लेखापाल को अन्वेषक पद पर पदोन्नति दी गई थी। पदोन्नति आदेश जारी करने के 6 साल बाद विस में मामला उठा। जांच कराई गई। जाचं में पदोन्नति गलत पाई गई। आयुक्त लोक शिक्षण ने आदेश जारी किया और जेडी ने पदोन्नति निरस्त कर दी। फिर मामला हाईकोर्ट पहुंचा। अब 17 साल बाद फैसला आया है। कोर्ट ने पदोन्नति नियम विरुद्ध मानी। पॉवर का दुरुपयोग माना है। हाईकोर्ट से याचिका निरस्त होने के बाद कोर्ट के शरण में पहुंचे कर्मचारियों को अब वापस मूल पद लौटना होगा।
कोर्ट ने वेतन वसूली से दी राहत लेकिन माना पदोन्नति नियम विरुद्ध हुई
शासन के फैसले के खिलाफ द्रोणाचार्य पाण्डेय, रामा प्रसन्न द्विवेदी, हरिहर पटेल और महमूदन खान हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। डब्लूपी 5399/2009 में पदोन्नति निरस्त करने को चैलेंज किया था। यह प्रकरण हाईकोर्ट में 17 साल से चल रहा था। हालांकि 27 अप्रैल 2026 को हाईकोर्ट ने इसमें अंतिम फैसला देते हुए प्रकरण को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को अन्वेषक के पद पर पदोन्नत किया गया था। लेखापाल से अन्वेषक के पद पर पदोन्नति के लिए कोई पदोन्नति प्रक्रिया नहीं थी। पदोन्नति नियमों का अभाव में पदोन्नति की गई । इस मामले में पदोन्नति करने में केवल शक्ति का अनियमित उपयोग हुआ था और नियम के अभाव में पदोन्नति नहीं की गई थी। इसी को देखे हुए उक्त निर्णय का कोई लाभ याचिकाकर्ताओं को नहीं दिया जा सकता है। हालांकि यह स्पष्ट किया जाता है कि याचिककर्ताओं से उस अवधि के दौरान वेतन और अन्य परिणामी लाभों की कोई वसूली नहीं की जाएगी, जिस दौरान याचिकाकर्ता पदोन्न्नत पद पर काम किए हैं।
पांच लेखापाल पहले किए गए थे प्रमोट फिर डिमोट
14 अगस्त 2003 को तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी ने पांच लेखापाल को प्रमोट किया था। इन्हें पदोन्नति आदेश जारी करते हुए नियम विरुद्ध तरीके से अन्वेषक बनाया गया था। इनमें श्रीमती महमूदन खान, हरिहर प्रसाद पटेल, फतेमोहम्मद खान, द्रोणाचार्य पाण्डेय और रामाप्रसन्नधर द्विवेदी शामिल थे। यह मामला विधानसभा पहुंचा। जमकर हंगामा मचा। इसके बाद नियम विरुद्ध दी गई पदोन्नति को निरस्त करने आयुक्त लोक शिक्षण मप्र भोपाल ने जेडी रीवा को आदेश जारी किया। जेडी ने 14 मई 2009 को सभी पांच पदोन्नति किए गए कर्मचारियों को आदेश जारी कर लेखापाल पर वापस डिमोट कर दिया गया था। इसके खिलाफ चार कर्मचारी हाईकोर्ट चले गए थे। तब से प्रकरण चल रहा था।
इस गलत पदोन्नति पर तत्कालीन डीईओ पर गिरी थी गाज
वर्ष 2003 में लेखापाल से अन्वेषक पद पर की गई पदोन्नति का मामला काफी तूल पकड़ा था। विधानसभा में मामला पहुचां था। इसके बाद इसकी जांच के लिए कमेटी गठित की गई। कमेटी ने जांच करने के बाद रिपोर्ट आयुक्त लोक शिक्षण को सौपी थी। जांच में पदोन्नति नियम विरुद्ध पाई गई थी। सूत्रों की मानें तो इस मामले में गलत पदोन्नति करने वाले तत्कालीन डीईओ करीब 6 सालों तक निलंबित भी रहे। इसके अलावा वेतनवृद्धि भी असंचयी प्रभाव से रोकी गई थी।

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