राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास उसके सरसंघचालकों की प्रेरणादायक यात्राओं से जुड़ा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से लेकर डॉ. मोहन भागवत तक—छह युगदृष्टाओं ने संगठन, सेवा और राष्ट्रभक्ति की ज्योति को सतत जलाए रखा। इस लेख में जानिए कैसे हर सरसंघचालक ने समय की चुनौतियों में संघ को नई दिशा दी, और हिंदू संस्कृति को राष्ट्र की आत्मा के रूप में स्थापित किया।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
हिन्दू संस्कृति हिन्दुस्तान की जीवन-शक्ति है। इसलिए यह स्पष्ट है कि यदि हिन्दुस्तान की रक्षा करनी है, तो सबसे पहले हमें हिन्दू संस्कृति का पोषण करना चाहिए। यदि हिन्दुस्तान में ही हिन्दू संस्कृति नष्ट हो जाए, और हिन्दू समाज का अस्तित्व समाप्त हो जाए, तो केवल शेष भौगोलिक क्षेत्र को हिन्दुस्तान कहना शायद ही उपयुक्त होगा। केवल भौगोलिक टुकड़े राष्ट्र नहीं बनाते। पूरे समाज को इस तरह सतर्क और संगठित स्थिति में होना चाहिए कि कोई भी हमारे किसी भी सम्मान के बिंदु पर बुरी नजर डालने की हिम्मत न करे। यह याद रखना चाहिए कि शक्ति केवल संगठन के माध्यम से ही आती है। इसलिए प्रत्येक हिन्दू का यह कर्तव्य है कि वह हिन्दू समाज को मजबूत बनाने के लिए अपनी पूरी क्षमता लगाए। संघ यही सर्वोच्च कार्य कर रहा है। देश की वर्तमान स्थिति को तब तक बदला नहीं जा सकता जब तक लाखों युवा इसके लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित न करें। युवाओं के मन को उस उद्देश्य की ओर ढालना संघ का सर्वोच्च लक्ष्य है।
- डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार - संघ के संस्थापक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का इतिहास केवल एक संगठन की यात्रा नहीं, बल्कि भारत की सामाजिक-राजनीतिक धारा में एक निरंतर प्रवाह की कहानी है। इस प्रवाह को दिशा देने वाले रहे हैं संघ के सरसंघचालक- वे व्यक्ति जिन्होंने अलग-अलग कालखंडों में अपने दृष्टिकोण, कार्यशैली, सेवा भाव और नेतृत्व के बल पर संगठन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित संघ आज विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन माना जाता है, और इसका श्रेय उन सरसंघचालकों को जाता है जिन्होंने समय की चुनौतियों के अनुरूप संघ की दिशा तय की। आइए, संघ के छह प्रमुख सरसंघचालकों की कार्यशैली और योगदान पर दृष्टि डालें।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925-1940) : राष्ट्रनिर्माण का बीजारोपण
संघ के आद्य सरसंघचालक डॉ. हेडगेवार का जीवन राष्ट्रभक्ति की एक जीवंत गाथा है। 1 अप्रैल 1889 को जन्मे हेडगेवार ने बचपन से ही औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध स्वर बुलंद किए। जब स्कूल में ब्रिटिश महारानी की जयंती पर मिठाई बांटी गई, तो उन्होंने उसका बहिष्कार कर यह संकेत दिया कि उनका झुकाव विदेशी शासन के प्रति कभी नहीं होगा। लोकमान्य तिलक से प्रभावित होकर वे क्रांतिकारी गतिविधियों में जुड़े और कलकत्ता की अनुशीलन समिति में सक्रिय हुए। परंतु धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि भारत की आजादी केवल हथियारों से नहीं, बल्कि समाज के संगठन से संभव है। इसी सोच ने 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखवाई। संघ की स्थापना के साथ उन्होंने संगठन और अनुशासन को आधार बनाया। 1930 के जंगल-सत्याग्रह में स्वयं भाग लिया और जेल भी गए। 1934 में जब महात्मा गांधी ने संघ के शिविर का दौरा किया, तो हेडगेवार का दृष्टिकोण और भी प्रासंगिक प्रतीत हुआ। दुर्भाग्यवश 21 जून 1940 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन तब तक वे एक ऐसी परंपरा गढ़ चुके थे जो आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देती रही।
माधव सदाशिवराव गोलवलकर ‘श्रीगुरुजी’ (1940-1973) : विस्तार और दृढ़ता का युग
डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद 1940 में श्रीगुरुजी ने बागडोर संभाली। 33 वर्षों तक उनका कार्यकाल संघ के लिए सबसे लंबा और चुनौतीपूर्ण रहा। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्राध्यापक रहते हुए उनका झुकाव अध्यात्म और संगठन की ओर हुआ। स्वामी अखंडानंद से दीक्षा लेकर उन्होंने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित किया। सरसंघचालक बनने के साथ ही उन्हें स्वतंत्र भारत के जटिल दौर का सामना करना पड़ा।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा और श्रीगुरुजी को जेल भेजा गया। परंतु उनकी दृढ़ता और संगठन क्षमता ने संघ को इस संकट से बाहर निकाला। विभाजन की त्रासदी के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की सहायता में भी उनका योगदान अविस्मरणीय है।
श्रीगुरुजी ने संघ के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया- ग्राम समाज, शिक्षा, सेवा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को प्राथमिकता दी। 1952 का देशव्यापी गो-रक्षा आंदोलन, 1955 का गोवा मुक्ति अभियान और 1969 की धर्म संसद उनके नेतृत्व के कुछ ऐतिहासिक क्षण थे। 1973 में उनके निधन तक संघ एक सशक्त राष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थापित हो चुका था।
बालासाहब देवरस (1973-1994) : सामाजिक समरसता और आपातकाल का संघर्ष
1973 में श्रीगुरुजी के निधन के बाद मधुकर दत्तात्रय देवरस, जिन्हें बालासाहब देवरस कहा जाता है, तीसरे सरसंघचालक बने। बालासाहब का कार्यकाल सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का प्रतीक है। उनके नेतृत्व में संघ ने सेवा कार्यों को गति दी और समाज के वंचित तबकों तक पहुंचने का प्रयास किया। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका प्रसिद्ध कथन- "यदि अस्पृश्यता पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है" - संघ की विचारधारा में बड़ा मोड़ साबित हुआ। 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल घोषित किया, तब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया और हजारों कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। बालासाहब के नेतृत्व में संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए बड़ा आंदोलन खड़ा किया, जो अंतत: आपातकाल की समाप्ति और लोकतंत्र की पुनर्स्थापना में सहायक बना। उनके समय में 1992 का अयोध्या आंदोलन भी संघ के लिए ऐतिहासिक क्षण रहा। 1994 में उन्होंने स्वयं दायित्व छोड़कर अपने उत्तराधिकारी के रूप में प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह के नाम की घोषणा की।
प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ (1993-2000) : अकादमिक दृष्टि और अंतरराष्ट्रीय विस्तार
बालासाहब के बाद प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह, जिन्हें ‘रज्जू भैया’ कहा जाता है, चौथे सरसंघचालक बने। भौतिक शास्त्र के विद्वान रज्जू भैया ने संघ में एक वैज्ञानिक दृष्टि और अकादमिक गंभीरता का संचार किया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोकप्रिय प्राध्यापक रहते हुए उन्होंने 1966 में अपना पद त्यागकर पूर्णकालिक प्रचारक का जीवन चुना। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सक्रियता भी उल्लेखनीय थी। रज्जू भैया पहले सरसंघचालक थे जिन्होंने विदेश जाकर हिंदू स्वयंसेवक संघ के कार्यों का निरीक्षण किया। इंग्लैंड, मॉरीशस, केन्या और दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने प्रवासी भारतीय समाज को संघ के कार्य से जोड़ा। स्वास्थ्य कारणों से 2000 में उन्होंने पद छोड़ दिया और कुप्पहल्ली सी. सुदर्शन को अपना उत्तराधिकारी बनाया।
के. सी. सुदर्शन (2000-2009) : वैचारिक संवाद और तकनीकी दृष्टि
कुप्पहल्ली सीतारमय्या सुदर्शन का कार्यकाल वैचारिक संवाद और संगठन की गहराई को मजबूत करने वाला था। दूरसंचार इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि रखने वाले सुदर्शन जी ने प्रचारक जीवन चुना और धीरे-धीरे संगठन के शीर्ष तक पहुंचे। उन्होंने विभिन्न प्रांतों में कार्य करते हुए संघ के प्रशिक्षण तंत्र को मजबूत किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी संवाद की क्षमता। वे हिंदी के प्रति विशेष लगाव रखते थे और कई बार अखबारों में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर टिप्पणी भी कर देते थे। उनका कार्यकाल 2009 तक चला, जिसके बाद उन्होंने डॉ. मोहन भागवत को नया सरसंघचालक नियुक्त किया।
डॉ. मोहन भागवत (2009-अब तक) : संवाद और समसामयिक मुद्दों का नेतृत्व
11 सितंबर 1950 को चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में जन्मे डॉ. मोहन भागवत संघ के छठे सरसंघचालक हैं। पशु चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर के अध्ययन के दौरान आपातकाल लग गया, और देशहित में अपनी शिक्षा का बलिदान देते हुए वे आरएसएस के प्रचारक बन गए और संघ के विभिन्न पदों पर कार्य करते रहे। उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र से प्रेरित होकर समता-समरसता और बंधुत्व की भावना को सशक्त करने में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। 2009 में उन्होंने संगठन की बागडोर संभाली। डॉ. भागवत ने संघ को एक नई पहचान दी-संवाद और पारदर्शिता की। उन्होंने इस साल विज्ञान भवन में आयोजित ‘तीन दिवसीय संवाद’ में भाषा, आरक्षण, शिक्षा नीति, विदेश नीति, जनसंख्या असंतुलन और घुसपैठ जैसे जटिल विषयों पर खुलकर अपनी बात रखी। उनकी शैली अपेक्षाकृत आधुनिक मानी जाती है। वे संघ और समाज के बीच की खाई को कम करने के लिए प्रयासरत हैं। आज संघ का व्यापक विस्तार और समाज के विविध क्षेत्रों में उसकी सक्रियता, डॉ. भागवत की संवादपरक रणनीति का परिणाम है।


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