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आंगनबाड़ी केंद्रों में योजनाओं का बंदरबांट

सिंगरौली जिले के शहरी और ग्रामीण आंगनबाड़ी केंद्रों में भारी अनियमितता और भ्रष्टाचार का आरोप सामने आया है। कार्यकर्ताओं पर सुपरवाइजर के कमीशन दबाव, बंदरबांट और योजनाओं के कागजी संचालन से नौनिहालों और महिलाओं तक योजनाओं का लाभ नहीं पहुँच पा रहा।

By: Yogesh Patel

Jun 19, 202512:14 PM

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आंगनबाड़ी केंद्रों में योजनाओं का बंदरबांट

सिंगरौली, स्टार समाचार वेब

जिले के शहरी एवं ग्रामीण केंद्रों के आंगनबाड़ी केंद्रों में चरम सीमा पर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। यूं कहें तो शासन की योजना सिर्फ कमाई का जरिया बन गया है और शिकायतों पर अमल डालने की बजाए अधिकारी भी कतराते नजर आ रहे है। आंगनबाड़ी केंद्रों में अनियमितता का खेल खेला जा रहा है। ज्ञात हो कि जिला मुख्यालय में स्थित शहरी आंगनबाड़ी केंद्रों के हाल इस कदर पंगु बने हुए है कि कोई इनका ख्याल रखने वाला नहीं है। वैसे तो कागजों में दिखाने के  लिए सुबह से ही केंद्र खोले जा रहे है, लेकिन वास्तविकता देखी जाय तो आंगनबाड़ी केंद्र एकाध घण्टे खोलकर कोरमपूर्ति की जा रही है। जब शहरी क्षेत्र का हाल इस कदर बना हुआ है तो जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के आंगनबाड़ी केंद्रों की बात करना ही अजीब पहेली लग रही है। आरोप है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से लेकर, सहायिका, सुपरवाइजर तथा परियोजना अधिकारी के साथ मुख्यालय में बैठे अधिकारी, कर्मचारी एक गुत्थे में बधे हुए है। चर्चा है कि आंगनबाड़ी केंद्र किस मकसद से खोले गए है और इसका उद्देश्य क्या है। जो भी हो लेकिन शासन के नियमों को दरकिनार कर बंदरबांट का खेल जारी है। कभी भी जांच नहीं की जा रही है। ऐसे में नौनिहालों को लाभ नहीं मिल पा रहा है।

कार्यकर्ताओं पर सुपरवाइजर का धौंस

आरोप है कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित आंगनबाड़ी केंद्रों के कार्यकतार्ओं से सुपरवाइजर ही अपना धौंस जमाती रहती है। यहां तक कि कमीशन का दबाव भी बनाया  जाता है। नाम न छापने की शर्त पर एक सहायिका ने बताया कि हर सप्ताह सुपरवाइजर का आना निश्चित रहता है। सिर्फ धौंस जमाकर कुछ न कुछ मांग रहती है, जब कभी-कभार नहीं मिलता तो शिकायत की धमकी दी जाती है।

योजनाओं का नही मिल रहा लाभ

महिला एवं बाल विकास विभाग में दर्जनभर महत्वाकांक्षी योजनाएं संचालित है। चाहे महिलाओं के लिए हो या फिर नौनिहालों के लिए इसके लिए लाखों-करोड़ों रूपए योजनाओं के तहत सरकार खर्च कर रही है। फिर भी योजनाएं कागजी रूप धारण कर जमीनी स्तर  को भूल गयी है।

निजी कार्य पर दिलचस्पी 

बात की जाय तो महिला बाल विकास विभाग  अधिकारी की तो सिर्फ अपने निजी कार्य पर ज्यादा  ही दिलचस्पी रख  है। अगर उनसे जिले में स्थापित केंद्रों की शिकायत की जाय तो आश्वासन भी देना उचित नहीं समझते। इसी के चलते कर्मचारी भी  बेलगाम हो गये है और इनके द्वारा छूट भी शायद प्रदान की गयी है। जबकि जिम्मेदारी अधिकारी को केन्द्रो का भ्रमण कर जायजा लेना चाहिए कि केन्द्रो में सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ महिलाओं और नौनिहालों को मिल रहा है या नही। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार अधिकारी भी अपने दायित्वों का निर्वहन सही ढंग से नही कर पा रहे हैं।

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