पटना हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया है, जिसमें सलवार उतारने और सीने को दबाने की कोशिश को रेप की कोशिश नहीं माना गया था। जानें इस मामले से जुड़ी पूरी जानकारी।

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के फैसले पर लिया स्वतः संज्ञान
सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट के एक विवादित फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए स्वतः संज्ञान लिया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली 3 जजों की बेंच ने इस मामले के तथ्यों की गहराई से समीक्षा करने की बात कही है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के फैसले में कुछ टिप्पणियां बेहद आपत्तिजनक हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि कानूनी प्रक्रिया के तहत आरोपी का पक्ष सुने बिना सीधे फैसला रद्द नहीं किया जा सकता, इसलिए बिहार के एडवोकेट जनरल को स्थानीय पुलिस की मदद से आरोपी तक नोटिस पहुंचाने का निर्देश दिया गया है।
यह पूरा मामला साल 2008 का है, जो बिहार के बांका जिले से जुड़ा हुआ है। पीड़िता अपने पिता के साथ एक स्टूडियो में फोटो खिंचवाने के लिए गई थी। आरोपी फोटोग्राफर ने पीड़िता के पिता को बाहर इंतजार करने के लिए कहकर अंदर का दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद आरोपी ने महिला की सलवार उतारने की कोशिश की और उसका सीने को दबाकर गंभीर छेड़छाड़ की। पीड़िता के शोर मचाने और बाहर से पिता द्वारा दरवाजा खटखटाने पर आरोपी मौके से फरार हो गया था।
पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने 9 जुलाई को आए अपने फैसले में आरोपी की अपील मंजूर करते हुए उसे आईपीसी की धारा 376 (रेप के प्रयास) के आरोप से बरी कर दिया था। हाईकोर्ट का तर्क था कि इन हरकतों से महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने यानी छेड़छाड़ (आईपीसी की धारा 354) का अपराध तो बनता है, लेकिन इसे रेप की कोशिश साबित नहीं किया जा सकता। अदालत के अनुसार, रेप के प्रयास को साबित करने के लिए ऐसी स्पष्ट शारीरिक गतिविधि होनी चाहिए जो सीधे तौर पर बलात्कार की मंशा को दर्शाती हो।
यह गंभीर मामला वरिष्ठ वकीलों शोभा गुप्ता और एच.एस. फुल्का द्वारा सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में लाया गया। वकीलों ने अदालत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया कि इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक ऐसे ही फैसले को खारिज किया था। उस मामले में हाईकोर्ट ने नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ने और पायजामे की डोरी तोड़ने को रेप की कोशिश नहीं माना था। तब सुप्रीम कोर्ट ने देश भर की सभी अदालतों को कड़े निर्देश दिए थे कि यौन अपराधों के मामलों की सुनवाई करते समय विशेष संवेदनशीलता और गंभीरता बरती जाए।
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