ईरान-अमेरिका युद्ध के 17वें दिन अमेरिकी विमानों ने चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र के पास सैन्य ठिकानों को बनाया निशाना। जानें भारत के लिए चाबहार पोर्ट का महत्व और हमले के प्रभाव

AI इमैज
नई दिल्ली/तेहरान। स्टार समाचार वेब
ईरान और अमेरिका के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब और अधिक आक्रामक मोड़ ले चुका है। युद्ध के 17वें दिन अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने ईरान के रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र (Chabahar Free Trade Zone) के पास स्थित सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। 'वॉयस ऑफ अमेरिका' की फारसी सेवा के अनुसार, यह हमला चाबहार बंदरगाह के निकट एक पहाड़ी पर स्थित सैन्य ठिकानों पर किया गया, जिससे पूरा इलाका जोरदार धमाकों से दहल उठा।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की यह कार्रवाई ईरान द्वारा 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' की नाकाबंदी करने और अमेरिकी ठिकानों पर किए गए हमलों का करारा जवाब है। ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित चाबहार ईरान के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ से उसे हिंद महासागर तक पहुँचने के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। अब इस क्षेत्र में युद्ध की आग पहुँचने से वैश्विक व्यापारिक समीकरण बिगड़ने की आशंका है।
चाबहार बंदरगाह केवल ईरान के लिए ही नहीं, बल्कि भारत की भू-राजनीतिक और आर्थिक रणनीति की रीढ़ है। भारत ने यहाँ एल्युमिनियम स्मेल्टर और यूरिया संयंत्र जैसे उद्योगों में अरबों डॉलर का निवेश किया है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को बाईपास कर अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूरोप तक सीधी पहुँच प्रदान करता है। साल 2024 में भारत ने ईरान के साथ 10 साल का अनुबंध किया था, जिसके तहत भारतीय कंपनी IPGL ने 370 मिलियन डॉलर के निवेश का वादा किया है। भारत का लक्ष्य 2030 तक अपनी अर्थव्यवस्था को 10 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचाना है, जिसके लिए चाबहार जैसे स्थिर और सुरक्षित व्यापारिक मार्ग अनिवार्य हैं।
चाबहार का अर्थ है 'चार झरने'। 1992 में स्थापित यह क्षेत्र विदेशी निवेशकों को 20 साल तक टैक्स छूट और मुद्रा विनिमय की स्वतंत्रता देता है। लेकिन वर्तमान युद्ध की स्थिति ने इन तमाम निवेशों और व्यापारिक संभावनाओं पर संकट के बादल मँडरा दिए हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता यह तनाव यदि जल्द नहीं थमा, तो भारत सहित कई एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति और निर्यात पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
भारत सरकार की संभावित प्रतिक्रिया और कूटनीतिक हलचल
चाबहार पर हमले के बाद नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद (NSC) के बीच उच्च स्तरीय बैठकें होने की संभावना है। भारत के लिए यह स्थिति अत्यंत जटिल है:
रणनीतिक संतुलन: भारत के अमेरिका और ईरान दोनों के साथ मजबूत संबंध हैं। भारत जहाँ एक ओर अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान पर निर्भर रहा है, वहीं चीन के प्रभाव को कम करने के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी महत्वपूर्ण है। भारत इस हमले की कड़ी निंदा करने के बजाय 'संयम' बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर सकता है।
परियोजना की सुरक्षा: चाबहार बंदरगाह (विशेष रूप से शाहिद बेहेश्टी टर्मिनल) का संचालन वर्तमान में भारत के पास है। यदि बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुँचता है, तो यह भारत के 'कनेक्टिविटी मास्टरप्लान' को बड़ा झटका होगा। भारत तेहरान और वाशिंगटन दोनों के साथ 'बैक-चैनल' डिप्लोमेसी का उपयोग कर बंदरगाह क्षेत्र को "नो-कॉम्बैट ज़ोन" (युद्ध मुक्त क्षेत्र) घोषित करने का दबाव बना सकता है।
चाबहार के पास बमबारी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में हड़कंप मच सकता है:
कच्चे तेल (Crude Oil) में उछाल: चूंकि यह क्षेत्र ओमान की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मुहाने पर है, युद्ध की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में $5-$10 प्रति बैरल तक की तत्काल वृद्धि देखी जा सकती है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह 'महंगाई का झटका' साबित होगा।
शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम: युद्ध क्षेत्र के पास होने के कारण इस रूट से गुजरने वाले जहाजों का 'वॉर रिस्क इंश्योरेंस' (War Risk Insurance) कई गुना बढ़ जाएगा। इससे लॉजिस्टिक लागत बढ़ेगी और अंततः आयातित सामान महंगा होगा।
INSTC प्रोजेक्ट पर संकट: चाबहार 'इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर' (INSTC) का मुख्य द्वार है। इस रूट के असुरक्षित होने से मध्य एशिया और रूस के साथ होने वाला व्यापार बाधित हो जाएगा।
भारत अब अपने निवेश को बचाने के लिए 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) की नीति अपना सकता है, लेकिन साथ ही अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए वैकल्पिक रूट (जैसे वाघा बॉर्डर के जरिए व्यापार की पुनः संभावना) पर भी विचार करना पड़ सकता है, हालांकि पाकिस्तान के साथ तनाव के कारण यह चुनौतीपूर्ण है।

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