केंद्र की मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहली बार ऐसा हुआ है जब सरकार सदन में अपनी पसंद का कोई विधेयक पारित कराने में विफल रही है।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
केंद्र की मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहली बार ऐसा हुआ है जब सरकार सदन में अपनी पसंद का कोई विधेयक पारित कराने में विफल रही है। महिला आरक्षण से जुड़ा 131वां संविधान संशोधन बिल लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाने के कारण गिर गया। विपक्ष के कड़े विरोध और आंकड़ों की बाजीगरी में सरकार मात खा गई।
इस ऐतिहासिक बिल पर सदन में कुल 21 घंटे तक तीखी बहस चली। वोटिंग से ठीक पहले गृह मंत्री अमित शाह ने एक घंटे का आक्रामक भाषण दिया। उन्होंने विपक्ष को सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा, "अगर ये बिल पास नहीं होते हैं, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी विपक्ष की होगी। देश की महिलाएं देख रही हैं कि उनकी प्रगति की राह में रोड़ा कौन बन रहा है।" हालांकि, शाह की इस अपील का विपक्षी खेमे पर असर नहीं हुआ।

लोकसभा में 543 सीटों को बढ़ाकर 850 करने के बड़े प्रावधान वाले इस बिल को पारित करने के लिए 'विशेष बहुमत' (उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई) अनिवार्य था। वोटिंग के वक्त सदन में 528 सांसद मौजूद थे।
वोटों का विवरण इस प्रकार रहा:
| श्रेणी | संख्या |
| कुल मौजूद सांसद | 528 |
| पक्ष में पड़े वोट | 298 |
| विपक्ष में पड़े वोट | 230 |
| जीत के लिए जरूरी आंकड़े (2/3) | 352 |
| जीत और हार का अंतर | 54 वोट |
सरकार को इस बिल को कानून बनाने के लिए 352 वोटों की दरकार थी, लेकिन वह केवल 298 तक ही पहुंच पाई। इस तरह 54 वोटों के अंतर से बिल गिर गया।
महिला आरक्षण बिल के साथ-साथ सरकार ने दो अन्य महत्वपूर्ण विधेयक भी पेश किए थे-
परिसीमन संशोधन संविधान बिल 2026
केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल 2026
दिलचस्प बात यह रही कि सरकार ने इन दोनों बिलों पर वोटिंग कराने से ही इनकार कर दिया। सरकार का तर्क था कि ये तीनों बिल एक-दूसरे से जुड़े (इंटर-लिंक्ड) हैं, इसलिए जब मुख्य बिल ही गिर गया, तो इन पर अलग से वोटिंग की आवश्यकता नहीं है।
विपक्ष ने सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने के प्रावधान पर आपत्ति जताई थी, जिसे वे 'अलोकतांत्रिक' बता रहे थे। अब इस हार के बाद आगामी चुनावों में 'महिला कार्ड' और 'परिसीमन' को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने की उम्मीद है। 12 सालों में यह पहली बार है जब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को विधायी मोर्चे पर ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ा है।
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