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सरस्वती पूजा का वास्तविक प्रयोजन: लुप्त नदी से जीवंत विद्या तक की यात्रा

भारतीय संस्कृति में सरस्वती केवल एक पौराणिक कल्पना नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवनधारा रही हैं।

By: Ajay Tiwari

Jan 22, 20264:06 PM

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सरस्वती पूजा का वास्तविक प्रयोजन: लुप्त नदी से जीवंत विद्या तक की यात्रा

श्रीश देवपुजारी
भारतीय संस्कृति में सरस्वती केवल एक पौराणिक कल्पना नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जीवनधारा रही हैं। 1960-70 के दशक तक विद्यालयों में सरस्वती पूजा का अर्थ केवल ज्ञान की देवी की वंदना और गुड़-चने का प्रसाद पाने तक सीमित था। उस समय के छात्रों को यह बोध नहीं था कि 'ज्ञान' का वास्तविक अर्थ क्या है और जिस सरस्वती की हम पूजा करते हैं, उनका ऐतिहासिक और भौगोलिक अस्तित्व क्या था।

सरस्वती नदी: इतिहास और शोध की नई दिशा
लंबे समय तक इतिहास की पुस्तकों में हमें पढ़ाया गया कि भारतीय सभ्यता 'सिंधु घाटी सभ्यता' है, क्योंकि सरस्वती नदी के अस्तित्व को नकार दिया गया था। किंतु 1970  दशक में डॉ. वाकणकर और मोरोपंत पिंगले जी के नेतृत्व में 'सरस्वती शोध यात्रा' ने इस धारणा को बदल दिया। पद्मश्री दर्शनलाल जैन और श्रीमान कल्याण रमन जैसे शोधार्थियों के प्रयासों से आज विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि भारतीय सभ्यता वास्तव में सरस्वती नदी के तट पर विकसित हुई थी।

वैज्ञानिक प्रमाण और पुरातात्विक साक्ष्य
आज इसराे, आेएनजीसी, आइआईटी रुड़की और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया जैसे संस्थानों ने सैटेलाइट इमेज और ग्राउंड वाटर रिसर्च के माध्यम से सिद्ध कर दिया है कि सरस्वती नदी का अस्तित्व था। हरियाणा के राखीगढ़ी, कुणाल और भिराना जैसे पुरातात्विक स्थल इसी नदी के प्राचीन मार्ग (पैलियो-चैनल) पर स्थित हैं। ऋग्वेद में सरस्वती को "अम्बितमे, नदीतमे और देवीतमे" (सर्वश्रेष्ठ माता, सर्वश्रेष्ठ नदी, सर्वश्रेष्ठ देवी) कहकर सम्मानित किया गया है।

भौगोलिक विस्तार और ऐतिहासिक पतन
सरस्वती नदी हिमालय के बंदरपूंछ हिमनद से निकलकर आदिबद्री के मार्ग से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात होते हुए कच्छ के रण में समुद्र से मिलती थी। लगभग 1600 किलोमीटर लंबी और 3 से 12 किलोमीटर चौड़ी यह विशाल नदी भू-परिवर्तनों के कारण ईसा पूर्व 4000 वर्ष के आसपास सूख गई। महाभारत काल में बलराम जी ने इसी नदी के किनारे तीर्थ यात्रा की थी। इसके तट पर मार्कंडेय, वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे ऋषियों के आश्रम थे और यहीं वेदव्यास जी ने भागवत पुराण की रचना की थी।

'सा विद्या या विमुक्तये': शिक्षा और विद्या में अंतर
विष्णु पुराण में कहा गया है— "सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात् विद्या वही है जो मुक्ति दिलाए। आज की आधुनिक शिक्षा हमें 'नियुक्ति' (रोजगार) तो दिलाती है, लेकिन मुक्ति नहीं। भौतिक शास्त्र, रसायन और जीव विज्ञान जैसे विषय नश्वर जगत तक सीमित हैं। भारतीय परंपरा में दो प्रकार के शास्त्र विकसित हुए— भौतिक और अभौतिक। माधवाचार्य के 'सर्वदर्शन संग्रह' में वर्णित 16 दर्शनों में से 16 दर्शन हमें मोक्ष, समाधि और निर्वाण की ओर ले जाते हैं। यही वास्तविक 'विद्या' है।

वसंत पंचमी: संकल्प का पर्व
वसंत पंचमी केवल एक सामाजिक त्योहार नहीं, बल्कि आत्म-बोध का पर्व है। तेलंगाना के 'बासर' स्थित सरस्वती मंदिर में आज भी बच्चों का 'विद्यारम्भ संस्कार' इसी उद्देश्य से किया जाता है। सच्ची सरस्वती पूजा का अर्थ है— इन 15 शास्त्रों में से किसी एक को सीखना और उसके अनुसार आचरण करना।

भारतीय सभ्यता के मूल को समझने के लिए सरस्वती के प्रवाह को अपनी बुद्धि में पुनः जीवित करना आवश्यक है। इसके लिए संस्कृत भाषा और व्याकरण की नींव रखना पहला कदम है। आइए, इस वसंत पंचमी पर यह संकल्प लें कि हम संस्कृत सीखना आरंभ करेंगे और कम से कम एक भारतीय शास्त्र का अध्ययन कर माँ सरस्वती की सच्ची उपासना करेंगे।

लेखक: अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख,संस्कृत भारती हैं

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