उर्दू अदब के बेताज बादशाह डॉ. बशीर बद्र ने शायरी को मुश्किल लफ़्ज़ों से आज़ाद कर 'आम-फ़हम' ज़ुबान दी। जानिए मुशायरों की जान बशीर बद्र साहब का यह हसीन सफर।

स्टार समाचार वेब.
उर्दू अदब की महफिल में जब भी कोई ऐसा नाम ढूँढा जाएगा, जिसने शायरी को किताबी संजीदगी से निकालकर आम इंसान की धड़कन बना दिया, तो ज़हन में सबसे पहला नाम डॉ. बशीर बद्र का आएगा। बशीर बद्र सिर्फ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू गज़ल का वह हसीन दौर थे, जिन्होंने मुशायरों को एक नई रूह और गज़ल को एक नया मिजाज़ दिया। उन्होंने शायरी को भारी-भरकम और मुश्किल उर्दू शब्दों के जाल से आज़ाद कराया और उसे 'आम-फ़हम' वाली ज़ुबान की मखमली चादर ओढ़ा दी। शायरी के उस्ताद बशीर बद्र का एक बेहद मशहूर शेर उनकी पूरी शख्सियत को बयां कर देता है - "जी बहुत चाहता है सच बोलें, क्या करें हौसला नहीं होता।"
सादगी में छुपा गहरा समंदर
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी खूबी उनकी सादगी है। उन्होंने महबूब की जुल्फों और रुखसार के रिवायती बयानों से आगे बढ़कर आधुनिक इंसान के अकेलेपन, उसकी मजबूरियों, उसकी हिजरत और रोज़मर्रा के सुलगते सवालों को अपनी गज़लों का मौज़ू (विषय) बनाया। उनकी सादगी के पीछे एक गहरा समंदर छिपा होता है। जब वे कहते हैं—"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो"—तो वे आधुनिक समाज के खोखलेपन पर इतनी नजाकत से चोट करते हैं कि सुनने वाला दंग रह जाता है।
उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत की आंच भी है और वक्त की कड़वाहट भी। वे जिंदगी के फलसफे को कुछ इस अंदाज में पेश करते हैं.. "दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।"
मुशायरों के सुल्तान और जदीदियत (आधुनिकता) के मसीहा
अस्सी और नब्बे के दशक में बशीर बद्र मुशायरों की जान हुआ करते थे। उनकी मद्धम, तरन्नुम से भरी आवाज और पढ़ने का मखमली अंदाज सीधे सुनने वालों के दिल में उतर जाता था। उन्होंने गज़ल को नया लहजा दिया। जहाँ पारंपरिक शायरी में सिर्फ "गुल' और "बुलबुल' की बातें होती थीं, वहीं बशीर साहब की शायरी में "कांच के घर', "सड़कें', "रेलगाड़ी' और "दफ्तर के बाबू' की तन्हाई भी नजर आई। उन्होंने ज़माने के बदलते दौर को बेहद करीब से देखा और उसे लफ़्ज़ों में पिरो दिया।
दर्द का सफर और मेरठ का दंगा
बशीर बद्र की जिंदगी सिर्फ शोहरत का सफर नहीं थी, इसमें गहरा दर्द भी शामिल था। साल 1987 के मेरठ दंगों में उनका हंसता-खेलता आशियाना, उनकी सालों की मेहनत से लिखी गईं अनमोल पांडुलिपियाँ और यादें सब कुछ जलकर खाक हो गया। इस हादसे ने उनके दिल पर गहरा जख्म दिया, जिसके बाद वे भोपाल आकर बस गए। लेकिन एक सच्चे फनकार की तरह उन्होंने इस दर्द को भी नफरत में बदलने नहीं दिया, बल्कि उसे अपनी शायरी का हिस्सा बना लिया- उन्होंने लिखा.. "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।"
अदब का अमिट सरमाया
डॉ. बशीर बद्र को उनकी बेमिसाल साहित्यिक सेवाओं के लिए भारत सरकार द्वारा 'पद्म श्री' और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। "इकाई', "इमेज', "आमद', "आहट' और "क्लोज अप' जैसी उनकी कृतियाँ उर्दू अदब का बेशकीमती सरमाया (खजाना) हैं। आज भी जब दुनिया में कहीं प्यार, जुदाई या इंसानी रिश्तों की बात होती है, तो बशीर बद्र के शेर किसी मरहम की तरह काम आते हैं। चमक-दमक की इस दुनिया में बशीर बद्र का वजूद हमेशा उस चिराग की तरह रोशन रहेगा, जो आंधियों में भी अपनी धीमी मगर मुकम्मल रोशनी से इंसानी दिलों को गर्माहट देता है। उनकी ही ज़ुबान में कहें तो "उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।'
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