पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मोहन भागवत को उज्जैन से अयोध्या तक की अपनी पदयात्रा में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। राम मंदिर चंदे में अनियमितताओं के आरोपों और 'चंदा चोरों' के खिलाफ उनकी इस यात्रा की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

मध्य प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। उन्होंने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को अपनी आगामी पदयात्रा में शामिल होने का सार्वजनिक आमंत्रण दिया है। यह यात्रा धर्मस्थलों में चंदे की पारदर्शिता और कथित वित्तीय अनियमितताओं के विरोध में आयोजित की जा रही है।
दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी है कि उनकी यह पदयात्रा 2 अक्टूबर 2026 को गांधी जयंती के अवसर पर उज्जैन के महाकाल मंदिर से शुरू होकर अयोध्या के राम मंदिर तक जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह यात्रा पूरी तरह से गैर-राजनीतिक होगी, जिसमें किसी भी राजनीतिक दल के झंडे या बैनर का उपयोग नहीं किया जाएगा। यात्रा के दौरान वे प्रतिदिन 10 से 15 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे और इस पूरी अवधि में वे सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाए रखेंगे।
दिग्विजय सिंह ने मोहन भागवत को संबोधित करते हुए कहा कि "धर्म की रक्षा और इसे चंदा चोरों से बचाने के लिए" आरएसएस (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) को आगे आना चाहिए। उन्होंने आरएसएस प्रमुख से व्यक्तिगत रूप से इस यात्रा में शामिल होने का आग्रह किया है। उनका कहना है कि इस यात्रा में वे सभी रामभक्त शामिल हो सकते हैं, जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए दान दिया था।
दिग्विजय सिंह ने राम मंदिर ट्रस्ट और उज्जैन तीर्थ क्षेत्र में चंदे की राशि के प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि श्रद्धालुओं की आस्था और उनके द्वारा दिए गए दान में वित्तीय अनियमितताएं हो रही हैं। उन्होंने स्वयं राम मंदिर निर्माण के लिए 1.11 लाख रुपये का चंदा दिया था। अब उन्होंने कानूनी सलाह लेने की बात कही है ताकि वे अपना चंदा वापस पा सकें। सिंह के अनुसार, यदि उन्हें दान की गई राशि वापस मिलती है, तो वे उसे 'रामालय ट्रस्ट' को सौंप देंगे।
अपनी इस मुहिम को और अधिक मुखर बनाते हुए दिग्विजय सिंह ने भोपाल स्थित अपने सरकारी आवास के बाहर एक पोस्टर लगवाया है। इस पोस्टर में स्पष्ट रूप से लिखा है—"चंदा चोरों और चढ़ावा चोरों का मेरे निवास पर प्रवेश निषेध है।" इस कदम ने राज्य की राजनीतिक सरगर्मी को और बढ़ा दिया है, जिससे भविष्य में इस मुद्दे पर बड़े विवाद के संकेत मिल रहे हैं।

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