इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक अब तक 23 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि कई मरीज अब भी वेंटिलेटर और आईसीयू में जीवन और मौत की जंग लड़ रहे हैं।
By: Ajay Tiwari
Jan 12, 20261:19 PM
इंदौर। स्टार समाचार वेब
इंदौर में दूषित पानी के कारण मौतों को आंकड़ा बढ़ा है। सोमवार को इस त्रासदी में एक और जान जाने के साथ ही कुल मृतकों की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। ताजा मामला 64 वर्षीय भगवानदास पिता तुकाराम भरणे का है, जो पिछले 10 दिनों से गंभीर स्थिति में अस्पताल में भर्ती थे।
भगवानदास को पहले एक निजी अस्पताल और फिर गंभीर हालत में बॉम्बे हॉस्पिटल रेफर किया गया था। अस्पताल के जनरल मैनेजर राहुल पाराशर ने बताया कि मरीज को भर्ती करते समय ही कार्डियक अरेस्ट आया था, जिसके बाद उन्हें सीपीआर देकर वेंटिलेटर पर रखा गया। संक्रमण इतना फैल चुका था कि उन्हें गैंग्रीन और मल्टी ऑर्गन फेल्योर जैसी गंभीर समस्याओं ने घेर लिया था।
दावों के बीच उलझी कमला बाई की मौत
हाल ही में हुई एक अन्य मौत कमला बाई (59) की है, जिसकी पहचान और कारण को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। 7 जनवरी को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद उन्हें एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। परिजनों का आरोप है कि भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी थी। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड में इसे दूषित पानी से हुई मौत के रूप में दर्ज नहीं किया गया है। इसके पीछे का कारण आधार कार्ड पर दर्ज पुराना पता बताया जा रहा है। वहीं, एमवाय अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अशोक यादव का तर्क है कि कमला बाई पहले से ही किडनी की बीमारी से जूझ रही थीं, इसलिए इसे मेडिको-लीगल केस मानकर पोस्टमॉर्टम नहीं कराया गया।
अस्पतालों की स्थिति: ICU में बढ़ते मरीज
क्षेत्र में दहशत का माहौल इस कदर है कि लोग अब नगर निगम की जलापूर्ति पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। भागीरथपुरा के निवासी आरओ, बोरिंग या बोतलबंद पानी का उपयोग करने को मजबूर हैं।
सियासी हलचल और जमीनी हकीकत
इस संकट की शुरुआत 29 दिसंबर को हुई थी, जब पहली बार बड़ी संख्या में लोग बीमार होकर अस्पताल पहुंचे थे। स्थिति बिगड़ते देख कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और अन्य जनप्रतिनिधियों ने अस्पतालों का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया था। हालांकि, तमाम सरकारी दावों और दौरों के बावजूद मौतों का सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है। आज भी कई परिवारों के सदस्य अलग-अलग निजी और सरकारी अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं।
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