प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इंदौर नगर निगम के 103.42 करोड़ रुपये के कथित फर्जी बिल घोटाले में विशेष पीएमएलए अदालत में 32 आरोपियों के खिलाफ 20 हजार पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इंदौर नगर निगम के कथित 103.42 करोड़ रुपये के बहुचर्चित फर्जी बिल घोटाले में अपनी जांच को आगे बढ़ाते हुए एक बड़ी कार्रवाई की है। केंद्रीय जांच एजेंसी ने इंदौर की विशेष पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) अदालत में कुल 32 आरोपियों के खिलाफ लगभग 20 हजार पन्नों का विस्तृत अभियोजन शिकायत पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया है। यह शिकायत 24 जुलाई को धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत दर्ज की गई है। इस मामले का संज्ञान लेते हुए अदालत ने अगली सुनवाई के लिए सभी नामजद आरोपियों को आधिकारिक नोटिस और समन जारी कर दिए हैं।
ईडी की जांच रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े के दायरे में कई प्रमुख लोग आए हैं। आरोपियों की सूची में विभिन्न ठेकेदार, इंदौर नगर निगम (IMC) के वर्तमान और पूर्व अधिकारी, लोकल फंड ऑडिट (LFA) विभाग के अधिकारी, रेजिडेंट ऑडिट कार्यालय के कर्मचारी और अन्य निजी व्यक्ति शामिल हैं। एजेंसी की अब तक की जांच में यह स्पष्ट हुआ है कि इन सभी ने आपसी मिलीभगत के जरिए अपराध से अर्जित अवैध धन को छिपाने, उसके जटिल लेन-देन करने और उसे अलग-अलग माध्यमों से ठिकाने लगाने में अहम भूमिका निभाई थी।
इस पूरे मामले की शुरुआत एमजी रोड पुलिस थाने में दर्ज कराई गई कई एफआईआर के आधार पर हुई थी। ईडी की जांच में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि आरोपियों ने किस तरह कागजों पर पूरा खेल रचा। नगर निगम के खजाने से लगभग 103.42 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि जाली वर्क ऑर्डर, फर्जी बिल, कूटचित माप पुस्तिका (एमबी), नकली पूर्णता प्रमाण-पत्र और अन्य मनगढ़ंत दस्तावेजों के आधार पर निकाल ली गई। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन विकास कार्यों और प्रोजेक्ट्स के नाम पर यह भुगतान जारी किया गया था, जमीन पर वे कार्य या तो कभी हुए ही नहीं थे या फिर उन्हें पहले ही किसी अन्य योजना के तहत पूरा किया जा चुका था।
जांच में सामने आया है कि ठेकेदारों और निगम के भ्रष्ट अधिकारियों की सांठगांठ से निकाली गई इस विशाल राशि को पहले बड़े पैमाने पर नकद निकाला गया। इसके बाद इस काले धन को आपस में बांटा गया और विभिन्न फर्जी संस्थाओं व शेल कंपनियों के जरिए वैध कारोबारी लेन-देन का रूप देकर छुपाने की कोशिश की गई। इस अवैध धन का उपयोग करके बाद में कई चल और अचल संपत्तियां खरीदी गईं तथा आरोपियों ने इसे अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी पर खर्च किया।
एजेंसी ने वित्तीय फर्जी षणयंत्र के इस जाल को तोड़ने के लिए पिछले साल 5 और 6 अगस्त 2024 को एक साथ 20 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। इस दौरान 22.04 करोड़ रुपये की नकदी, विभिन्न बैंकों में जमा राशि, फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), डीमैट होल्डिंग और म्यूचुअल फंड्स जैसी कई संपत्तियों को फ्रीज और जब्त किया गया। इसके अतिरिक्त, ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत दो अलग-अलग आदेश जारी कर 37.14 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाली 52 अचल संपत्तियों को भी अस्थायी रूप से कुर्क किया है। इन कुर्क की गई संपत्तियों में मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में स्थित रिहायशी मकान, व्यावसायिक भवन, बड़े प्लॉट और उपजाऊ कृषि भूमि शामिल हैं। इस प्रकार इस मामले में अब तक कुल 59.18 करोड़ रुपये की संपत्तियों पर शिकंजा कसा जा चुका है।
इस हाई-प्रोफाइल मामले में ईडी ने कड़ा रुख अपनाते हुए घोटाले के कथित मास्टरमाइंड अभय सिंह राठौर के अलावा मोहम्मद जाकिर और राहुल बडेरा को पीएमएलए की धारा 19 के तहत गिरफ्तार किया है। केंद्रीय एजेंसी का कहना है कि इन तीनों आरोपियों की अपराध से अर्जित अकूत संपत्ति के अवैध लेन-देन और उसे सफेद बनाने (मनी लॉन्ड्रिंग) में केंद्रीय और निर्णायक भूमिका रही है। इस बहुचर्चित घोटाले के अन्य पहलुओं और कड़ियों को खंगालने के लिए एजेंसी की आगे की जांच अभी भी जारी है।

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