जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के 30वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण किया। पदभार संभालते ही उन्होंने पक्षकारों की पीड़ा, वकीलों के अधिकारों और न्याय प्रणाली पर दिए बेबाक विचार।

जबलपुर। स्टार समाचार वेब
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक नए और महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत हुई है, जहाँ जस्टिस अल्पेश यशवंत कोगजे ने राज्य के 30वें मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के रूप में आधिकारिक तौर पर पदभार ग्रहण कर लिया है। पदभार संभालने के बाद अपने पहले ही संबोधन में उन्होंने न्याय प्रणाली, पक्षकारों की पीड़ा, साथी न्यायाधीशों की भूमिका और वकीलों के अधिकारों पर बेहद बेबाक और विचारोत्तेजक टिप्पणियां कीं।
मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे ने अपने संबोधन में न्याय व्यवस्था के केंद्र में मौजूद 'पक्षकार' (Litigant) की अहमियत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अदालतों में अक्सर रोजाना सैकड़ों मामलों की सुनवाई के दौरान हर केस केवल एक फाइल या नंबर बनकर रह जाता है, लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हर नंबर के पीछे एक इंसान और उसकी पूरी जिंदगी की कहानी जुड़ी होती है। कोई अपनी आजादी के लिए लड़ रहा होता है, तो कोई जमीन, संपत्ति या वर्षों से अटकी पेंशन के लिए न्याय की उम्मीद लगाए बैठा होता है।
सीजेआई ने स्पष्ट किया कि मामलों का त्वरित निपटारा जरूरी है, लेकिन यह न्याय और निष्पक्षता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। उन्होंने तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देते हुए यह भी चेतावनी दी कि तकनीक इतनी संवेदनहीन न हो जाए कि न्याय प्रक्रिया मानवीय संवेदनाओं से दूर हो जाए, क्योंकि आखिरकार न्याय इंसानों द्वारा इंसानों को ही दिया जाना है।
न्यायालय और साथी जजों की कार्यशैली पर बात करते हुए जस्टिस कोगजे ने कहा कि वे खुद को अपने किसी भी साथी न्यायाधीश से ऊपर नहीं मानते। न्यायालय एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, और वे अपने सभी सहयोगियों के अनुभव व सहयोग की अपेक्षा रखते हैं।
उन्होंने खुले तौर पर कहा कि वे रचनात्मक आलोचना का भी स्वागत करेंगे, क्योंकि जब किसी संस्था में ईमानदारी से असहमति जताने की जगह होती है, तो वह संस्था अंदर से और अधिक मजबूत बनती है। उनका मुख्य प्रयास ऐसा कार्य वातावरण तैयार करना होगा, जहाँ हर न्यायाधीश पूरी स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मविश्वास के साथ काम कर सके।
वकीलों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही एक जज के पास कानून का ज्ञान और अनुभव हो, लेकिन एक अच्छा वकील अदालत के सामने मामले का वह पहलू रख सकता है जो शायद जज की नजर से छूट गया हो। यही भारतीय न्याय व्यवस्था की असली खूबसूरती है।
उन्होंने वकीलों को भरोसा दिलाया कि वे उनकी स्वतंत्र और निडर पैरवी के अधिकार का पूरा सम्मान करते हैं। एक वकील को बिना किसी डर के सम्मान के साथ यह कहने की आजादी होनी चाहिए कि "माई लॉर्ड, मेरा मानना है कि यह फैसला सही नहीं है।" साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जजों में इतनी परिपक्वता होनी चाहिए कि वे इसे व्यक्तिगत रूप से न लें और वकीलों को भी यह समझना चाहिए कि जज की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियां होती हैं।
अपने संबोधन के अंत में, मुख्य न्यायाधीश ने मध्य प्रदेश की समृद्ध न्यायिक और कानूनी परंपराओं का सम्मान करने की बात कही। उन्होंने कहा कि यह केवल कोई औपचारिक शिष्टाचार नहीं है, बल्कि उनका दृढ़ विश्वास है कि हर हाई कोर्ट की अपनी अनूठी कार्यशैली, सोच, बार और संस्थागत विरासत होती है। वे पूरी निष्ठा के साथ मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इन महान परंपराओं को गहराई से समझने और खुद को उसके अनुरूप ढालने का प्रयास करेंगे।

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