सतना जिले के अंतिम छोर पर बसे पाथर कछार गांव में मां काली का दिव्य दरबार नवरात्रि में भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। घने जंगलों और वादियों के बीच स्थित विशाल प्रतिमा चमत्कारिक मानी जाती है। यहां लाल गुड़हल, नारियल और चुनरी चढ़ाने से मन्नत पूरी होने की मान्यता है। ऐतिहासिक रूप से पथरीगढ़ स्टेट से जुड़ा यह स्थान आज भी आस्था, संस्कृति और पर्यटन की संभावनाओं का प्रतीक है।

हाइलाइट्स
मझगवां, स्टार समाचार वेब
इन दिनों नवरात्रि पर्व की धूम है, चहुओर मां के जयकारे के लग रहे हैं। धार्मिकोत्सव के इस माहौल से जिले के अंतिम छोर पर बसा पाथर कछार गांव भी भक्ति में डूबा हुआ है जहां इन दिनों मां काली का भव्य और दिव्य दरबार भक्तों की आस्था और चमत्कारों का अद्भुत केंद्र बना हुआ है। बरौंधा घाटी के नीचे, घने जंगलों और मनोरम वादियों के बीच स्थित मां काली की विशाल प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए मुरादें पूरी करने वाली मानी जाती है। नवरात्रि में भक्तों की अपार भीड़ उमड़ने से इन दिनों यह मंदिर भक्तों से गुलजार है, जहां देवी भागवत पाठ, भंडारे और चढ़ावे की परंपरा आज भी निरंतर जारी है। ग्रामीणों का विश्वास है कि यदि कोई भक्त सोमवार या गुरुवार को लाल गुड़हल, नारियल, पान और लाल चुनरी चढ़ाकर मां से अरदास करता है, तो उसकी मनोकामना शीघ्र पूरी होती है। यहां की महिमा का प्रमाण न केवल लगातार चलने वाले भंडारे और चढ़ावे में झलकता है, बल्कि भक्तों के अनुभव भी इसे पुष्ट करते हैं। कई श्रद्धालुओं ने बताया कि मां काली के दरबार में मन्नत मांगने के कुछ ही समय बाद उनकी समस्याएं दूर हो गईं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस प्रतिमा से जुड़ी एक प्राचीन कथा भी प्रचलित है। कहा जाता है कि यह देवी पथरीगढ़ स्टेट के शासक ज्वाला सिंह की इष्ट थीं। जनश्रुति के अनुसार युद्धों के दौरान स्वयं मां काली उनकी ओर से लड़ती थीं। मां की इस कृपा से ज्वाला सिंह ने आल्हा-उदल जैसे महान योद्धाओं को भी पराजित किया था। आज भी ग्रामीण मानते हैं कि यह स्थान उस दिव्य शक्ति और आस्था का प्रतीक है।
चुनौतियां और संभावनाएं
परिवहन और सड़क सुविधाओं की कमी से सामान्य दिनों में यहां कम लोग पहुंच पाते हैं, जबकि नवरात्रि में भारी भीड़ उमड़ती है। मां काली की यह प्रतिमा जिले में मैहर की मां शारदा व राम गिरि शिवानी शक्तिपीठ की फूलमती माता मंदिर के बाद सबसे प्रमुख धार्मिक धरोहर मानी जाती है। प्राकृतिक सुंदरता और आस्था के सम्मिश्रण से यह स्थान न केवल भक्तों की श्रद्धा का केंद्र है, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी संरक्षित किए जाने योग्य है। सतना मुख्यालय से लगभग 100 किलोमीटर दूर होने और जंगली इलाके में बसे होने के कारण यहां पहुंचना चुनौतीपूर्ण है।स्थानीय लोगों के साथ यहां पहुंचने वाले भक्तों का मानना है कि यदि इस स्थान का विकास किया जाए, तो यह जिले का एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल बन सकता है।

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