रीवा में एयरपोर्ट और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर के बीच जिवला का शताब्दी पुराना स्कूल सड़क के अभाव में संकट में है। 36 बच्चे बारिश में स्कूल नहीं पहुंच पाते, शिक्षक भी परेशान हैं।

मुख्य बातें:
रीवा, स्टार समाचार वेब
रीवा में सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जा रहा। एयरपोर्ट तक खुल गया। हवाई जहाज उड़ रही है लेकिन मूल भूत सुविधाओं के लिए अब भी रीवा की जनता मोहताज है। स्कूलें हैं लेकिन चलने के लिए सड़क नहीं है। करोड़ों रुपए एयरपोर्ट की जमीन खरीदने में सरकार लगा दिए लेकिन स्कूलों के लिए सड़क नहीं बनवा पाए। छात्र स्कूल नहीं पहुंच पा रहे। उनके पास स्कूल पहुंचने के लिए रास्ता नहीं है। प्रशासन से गुहार लगाते हैं लेकिन उनकी आवाज आवेदन के पन्नों के साथ ही दब कर रह जाती है।
ऐसी ही एक सबसे पुरानी स्कूल है। इसकी उम्र करीब 100 साल से ऊपर है। यह स्कूल भी सड़क नहीं होने के कारण बंद होने की कगार पर पहुंच रही है। छात्र हैं लेकिन सड़क न होने से पढ़ने नहीं पहुंच पाते। बारिश में बच्चो को रास्ता बंद हो जाता है। चारों तरफ खेत हैं। खेतों से पहुंचना मुश्किल है। कोई भी इस स्कूल के शिक्षक और छात्रों की समस्या समझने और निराकरण करने को तैयार नहीं है। रीवा में हवाई जहाज चढ़ना आसान है लेकिन स्कूल तक पहुंचना मुश्किल है। सरकारी स्कूलें ऐसी जगहों पर खुली हैं, जहां आने जाने का रास्ता ही नहीं है। हर दिन सड़क की समस्या लेकर कलेक्टर के पास स्कूलों के बच्चे पहुंचे हैं। सड़क की समस्या अधिकतर गांव की स्कूलों मे ही देखने को मिलती है। अधिकांश ऐसी स्कूल हैं, जहां सड़क तो हैं लेकिन कीचड़ के कारण आने जाने में दिक्कत होती है लेकिन रीवा शहर में ही एक ऐसी स्कूल है, जहां जाने के लिए कोई सड़क या फिर रास्ता ही नहीं है। स्कूल तो खुला है लेकिन चारों तरफ दूसरों की जमीन और खेत है। यहां पहुंचना मतलब स्वर्ग पाने जैसा है। बारिश में तो स्कूल पूरी तरह से बंद ही हो जाता है। यहां छात्र क्या शिक्षक तक नहीं पहुंच पाते। इस समस्या का आज तक निदान नहीं हो पाया है। धीरे धीरे इसी वजह से छात्र संख्या कम होती जा रही है।
100 साल पुराना है स्कूल
यह स्कूल शासकीय प्राथमिक शाला जिवला है। मार्तण्ड स्कूल क्रमांक 2 संकुल में आता है। यह स्कूल करीब 100 साल पुराना बताया जाता है। यह महाराजा मार्तण्ड सिंह जूदेव के समय का स्कूल हैं। इस स्कूल से पढ़कर कई छात्र बड़े बड़े पदों पर पहुंचे लेकिन इस स्कूल की हालत पहले से बेहतर हो गई है। स्कूल का कायाकल्प हो गया। पहले कच्ची स्कूल थी अब जीर्णोद्धार के बाद पक्की हो गई। यहां किसी तरह की कोई कमी नहीं है सिर्फ आने जाने का रास्ता नहीं है।
स्कूल में 36 बच्चे हैं रजिस्टर्ड
ऐसा नहीं है कि यहां छात्र संख्या कम है। यहां पहली से पांचवी तक कुल 36 छात्र रजिस्टर्ड हैं। इनमें से 18 लड़के और 18 लड़कियां हैं। इसमें हर वर्ग के बच्चे शामिल हैं। इन बच्चों में पढ़ाई की ललक तो है लेकिन स्कूल पहुंचना ही पहाड़ चढ़ने जैसा कठिन है। स्कूल पहुंचने के लिए इन्हें कई बाधाएं पार करनी पड़ती है। स्कूल के लिए रास्ता नहीं है। स्कूल तक पहुंचने केपहले इन्हें तालाब के मेड़ से गुजरना पड़ता है। फिर नाला पार करना पड़ता है। तब जाकर खेतों की पगड़ंडियों तक पहुंचते हैं। फिर कटीले तारों को पार करते हुए स्कूल पहुंचते हैं।
स्कूल बनवा दी लेकिन रास्ता नहीं मिला
यहां की जमीनें कीमती हैं। कोई भी स्कूल तक रास्ते के लिए जगह देने को तैयार नहीं है। करोड़ों रुपए एकड़ जमीन है। इस लिए सड़क नहीं बन पा रही। सरपंच ने स्कूल में काफी काम कराया। यहां सब कुछ मौजूद है लेकिन रास्ता नही ंहै। ग्राम पंचायत के सरपंच ने स्कूल परिसर में पेवर लगवा दिए और भी कई काम हुए लेकिन रास्ता का समाधान नहीं हो पाया। स्कूल खत्म होते ही सरकारी स्कूल की जमीन भी खत्म हो जाती है।
मिन्नतें करके पहुंचते हैं शिक्षक स्कूल
स्कूल के पड़ोस में शिव कुमार द्विवेदी का घर मौजूद हैं। उनके घर के चारों तरफ खेत है। इनके घर के ठीक पीछे ही स्कूल है। मुख्य मार्ग से स्कूल तक पहुंचना इसके घर से होकर सबसे आसान पड़ता है। इसके बाद भी घर के पीछे खेत की मेड़ से कीचड़ से होकर जाना ही पड़ता है। शिक्षक हाथ पैर जोड़कर किसी तरह स्कूल पहुंच जाते हैं लेकिन छात्रों को यहां से आने जाने की मनाही है। स्कूल में एक महिला शिक्षक भी पदस्थ हैं। वह दिव्यांग हैं। छात्रों के साथ वह भी स्कूल तक नहीं पहुंच पाती। बारिश में यह परेशानी सिर्फ छात्र ही नहीं शिक्षकों को भी झेलनी पड़ती है। बच्चों को पढ़ता हुआ सब देखना चाहते हैं लेकिन सड़क के लिए जमीन कोई नहीं देना चाहता।
कई मर्तबा कर चुके हैं पत्राचार
स्कूल तक सड़क की मांग को लेकर कई बार स्कूल के हेडमास्टर शिक्षा विभाग के अधिकारियों को पत्राचार कर चुके हैं। अधिकारियों को स्कूल की समस्याओं से भी अवगत करा चुके हैं लेकिन अब तक सड़क का कोई भी निराकरण नहीं हो पाया। इसके कारण लगातार स्कूल के छात्र कम होते जा रहे हैं। सड़क नहीं होने से अभिभावक भी बच्चों को स्कूल भेजने से कतराने लगे हैं।

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