सतना के चनपुरवा में एसडीएम कोर्ट के यथास्थिति आदेश के बावजूद सड़क निर्माण जारी रहने का आरोप लगा है। किसान ने फसल नुकसान और विवादित जमीन पर गिट्टी बिछाने की शिकायत कर प्रशासन से जवाब मांगा।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
अदालत से स्टे मिलने के बाद किसान को लगा कि उसकी जमीन बच जाएगी लेकिन अगली रात खेत में मशीनें पहुंचीं और देखते ही देखते गिट्टी बिछने लगी। चनपुरवा के किसान की यह कहानी अब सिर्फ जमीन विवाद नहीं बल्कि न्यायालय के आदेश और सरकारी अमले की जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन गई है।
‘‘अगर सड़क बनानी ही है तो मेरी छाती पर बना दीजिए लेकिन मेरी खेती मत उजाड़िए।’’ यह शब्द चनपुरवा गांव के किसान चंदीदीन नामदेव के हैं। उनके मुताबिक महीनों से जिस जमीन को बचाने के लिए वे सरकारी दफ्तरों और अदालत के चक्कर लगा रहे थे उसी जमीन पर एसडीएम कोर्ट के यथास्थिति (स्टे) आदेश के बावजूद सड़क निर्माण का काम जारी है। किसान का आरोप है कि रात के अंधेरे में खेत में पहले मिट्टी डाली गई और फिर गिट्टी बिछा दी गई।
1.12 किमी लंबी सड़क
मामला चनपुरवा मुख्य मार्ग से अहरीटोला तक 1.12 किलोमीटर लंबी सड़क का है जिसका निर्माण करीब 1.02 करोड़ रुपए की लागत से लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) करा रहा है। सड़क निर्माण का ठेका मेसर्स शिवोम इंफ्रा को मिला है। परियोजना की जद में नौ आराजियां आ रही हैं जिनमें कुछ शासकीय और कुछ निजी भूमि शामिल है। विवाद आराजी क्रमांक 149/1 और 149/2 को लेकर है, जो निजी स्वामित्व में दर्ज हैं।
फिर एसडीएम कोर्ट पहुंचे किसान
भूमि स्वामी चंदीदीन नामदेव, संतोष नामदेव और सावित्री नामदेव ने सड़क निर्माण का विरोध करते हुए कानूनी प्रक्रिया अपनाई। मामला एसडीएम न्यायालय पहुंचा, जहां सुनवाई के दौरान एसडीएम ने स्वयं मौके का निरीक्षण किया। इसके बाद दोनों पक्षों को सुनने तक यथास्थिति बनाए रखने का आदेश जारी किया। बाद में प्रतिवादी पक्ष के उपस्थित नहीं होने पर यह आदेश आगे भी प्रभावी रखा गया। किसानों का कहना है कि उन्हें लगा था कि अब विवादित जमीन पर कोई काम नहीं होगा, लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद निर्माण एजेंसी नहीं रुकी।
स्टे के बाद भी गिट्टी
किसान चंदीदीन का आरोप है कि रात के समय जेसीबी और ट्रैक्टर लेकर निर्माण कार्य शुरू किया गया। पहले खड़ी फसल को नुकसान पहुंचाया गया, फिर सड़क के लिए गिट्टी डाल दी गई। उनका कहना है कि विरोध करने पर भी किसी ने उनकी बात नहीं सुनी। चंदीदीन कहते हैं बगल में दूसरी जमीन भी है, लेकिन सड़क निकालने की जल्दबाजी सिर्फ मेरी जमीन पर क्यों है? क्या कोर्ट का आदेश सिर्फ कागज पर रहने के लिए था?
उठे सवाल, जवाब का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि भूमि विवाद और न्यायालयीन प्रक्रिया पहले से लंबित थी। इसके बावजूद न केवल सड़क का कार्यादेश जारी हुआ, बल्कि स्टे आदेश के बाद भी निर्माण जारी रहने के आरोप हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित विभाग ने न्यायालय के आदेश का पालन किया? यह मामला अब सिर्फ सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह है कि यदि न्यायालय ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था, तो विवादित जमीन पर निर्माण कैसे हुआ? यदि किसान के आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? और यदि आदेश का पालन हुआ है, तो फिर खेत में गिट्टी कैसे पहुंची? अब पूरे मामले में प्रशासन और लोक निर्माण विभाग की ओर से आधिकारिक जवाब का इंतजार है।


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