सतना में कृषि उपज मंडी समिति और नगर निगम के बीच संपत्तिकर को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। नगर निगम ने 1997 से 2026 तक का 36.55 लाख रुपये कर बकाया बताते हुए नोटिस जारी किया है, जबकि मंडी समिति ने इसे अवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मंडी अधिनियम का हवाला दिया है।

हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
कृषि उपज मंडी समिति सतना और नगर निगम के बीच संपत्तिकर को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। नगर निगम ने मंडी समिति को नोटिस जारी कर 1997 से मार्च 2026 तक का कुल 36 लाख 55 हजार 972 रुपये संपत्तिकर एवं अन्य कर बकाया दर्शाया है और इसे 15 दिन के भीतर जमा करने का निर्देश दिया है। नोटिस मिलने के बाद मंडी समिति ने इस वसूली को अवैधानिक व अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए भुगतान से साफ इंकार कर दिया है। नगर निगम के राजस्व अधिकारी की ओर से 12 नवंबर 2025 को भेजे गए नोटिस में बताया गया कि वार्ड क्रमांक 13 में स्थित ए-ग्रेड मंडी परिसर पर 29 वर्षों से संपत्तिकर और संबद्ध कर लंबित हैं और निर्धारित समय सीमा में न भरने पर नगर निगम अधिनियम 1956 के तहत कार्रवाई की चेतावनी भी दे दी गई है। फिलहाल यह मामला कानूनी व्याख्या बनाम अधिकार-सीमा के पेंच में उलझा है। यदि निगम पीछे नहीं हटता, तो विवाद उच्च स्तर पर जाएगा, जिसका असर प्रदेश की अन्य मंडियों पर भी पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
मंडी समिति ने 18 दिसंबर को अपने लिखित जवाब में कहा है कि मप्र कृषि उपज मंडी अधिनियम 1972 की धारा 9 (3) के मुताबिक मंडी प्रांगण के प्रयोजन हेतु प्रयुक्त भूमि नगर निगम सीमा में सम्मिलित नहीं मानी जाती, इसलिए उस पर संपत्तिकर लागू नहीं होता। समिति ने सर्वोच्च न्यायालय के 14 अक्टूबर 2008 के आदेश (सिविल अपील 1921/2006) का हवाला देते हुए कहा कि अदालत ने पहले भी नगर निगम द्वारा मंडियों पर संपत्तिकर लगाने की मांग खारिज की थी।
47.12 एकड़ भूमि मंडी क्षेत्र घोषित
राज्य शासन की अधिसूचनाओं के अनुसार 47.12 एकड़ क्षेत्र (35.12 एकड़-1977, 12 एकड़-2008) को आधिकारिक तौर पर मंडी प्रांगण के रूप में घोषित किया गया है और सभी निर्माण कार्य उसी सीमा में स्थित हैं। मंडी समिति के सहायक संचालक एवं सचिव करूणेश तिवारी ने निगम से आग्रह किया है कि मंडी को संपत्तिकर व अन्य लगान से छूट प्रदान की जाए। इसका प्रतिवेदन भोपाल स्थित कृषि विपणन बोर्ड, नगर निगम आयुक्त तथा रीवा क्षेत्रीय कार्यालय को भी भेजा गया है।
आंख मूंद बैठे राजस्व अधिकारी?
मंडी को भेजे गए संपत्तिकर के नोटिस को लेकर नगर निगम के राजस्व महकमे पर सवाल उठ रहे हैं। सवाल ये कि क्या राजस्व महकमा हाईकोर्ट के आदेश को नहीं मानता? क्या 26 साल तक नगर निगम का राजस्व महकमा सो रहा था? या फिर जब भी मन करता है तब कागज के घोडेÞ दौड़ा देता है। ऐसा इसलिए भी कहा जा रहा है कि मंडी को संपत्तिकर से छूट मिली हुई इसके बाद भी नगर निगम के राजस्व महकमे को इसकी जानकारी नहीं है या फिर अनभिज्ञ है? हो कुछ भी लेकिन सरकारी गलियारों में इसका माखौल उड़ाया जा रहा है?

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