सतना के पोड़ी पतौरा-धवारी मार्ग की जर्जर हालत से पचास से अधिक गांवों के हजारों ग्रामीण परेशान हैं। बरसात में गड्ढों और कीचड़ के कारण दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं, जबकि सड़क निर्माण की मांग वर्षों से अधूरी है।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
विकास के दावों और करोड़ों रुपये की सड़क योजनाओं के बीच सतना जिले का पोड़ी पतौरा-धवारी मार्ग आज भी बदहाली की ऐसी तस्वीर है, जो व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। दशकों से जर्जर यह सड़क अब सड़क कम और मौत का रास्ता ज्यादा दिखाई देती है। बरसात शुरू होते ही हालात इतने भयावह हो जाते हैं कि घर से निकलने वाला हर व्यक्ति सकुशल लौट आए, इसकी कोई गारंटी नहीं। सड़क पर जगह-जगह बने विशाल गड्ढे बारिश के पानी से भर चुके हैं। पानी के नीचे छिपे ये गड्ढे किसी जाल से कम नहीं हैं। अनजान वाहन चालक जैसे ही इनमें उतरते हैं, वाहन असंतुलित होकर पलट जाता है या फंस जाता है। रोजाना दोपहिया वाहन चालक गिरकर घायल हो रहे हैं। कई बार बुजुर्ग, महिलाएं और स्कूली बच्चे भी दुर्घटनाओं का शिकार हो चुके हैं। इसके बावजूद जिम्मेदार विभाग की चुप्पी नहीं टूट रही।
सबसे अधिक परेशानी उन ग्रामीणों को हो रही है, जिनकी रोजी-रोटी, इलाज, पढ़ाई और रोजगार का रास्ता इसी सड़क से होकर गुजरता है। सुबह स्कूल जाने वाले बच्चे, खेतों की ओर निकलने वाले किसान, शहर में मजदूरी करने वाले श्रमिक और इलाज के लिए अस्पताल जाने वाले मरीज, सभी इस बदहाल सड़क की पीड़ा रोज झेलते हैं। पांच किलोमीटर का छोटा-सा सफर तय करने में एक घंटे तक का समय लग जाता है। कई बार वाहन बीच रास्ते में ही खराब हो जाते हैं और लोगों को कीचड़ में पैदल चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
पचास से अधिक गांव हैं प्रभावित
यह मार्ग उचेहरा और परसमनिया पहाड़ी क्षेत्र के पचास से अधिक गांवों की जीवनरेखा है। हजारों ग्रामीण प्रतिदिन इसी रास्ते से सतना शहर पहुंचते हैं। छात्रों की पढ़ाई, किसानों की उपज, व्यापारियों का कारोबार और मरीजों की जिंदगी इसी सड़क पर निर्भर है। लेकिन वर्षों से उपेक्षा का शिकार यह मार्ग अब ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुका है।
शिकायतें होती रहीं आश्वासन मिलते रहे
इस सड़क को लेकर ग्रामीण वर्षों से आवाज उठा रहे हैं। बीते कुछ माह पहले समाजसेवियों ने कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस को ज्ञापन सौंपकर सड़क निर्माण की मांग की थी। इससे पहले भी कई बार ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने संबंधित विभाग का ध्यान आकर्षित कराया, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही मिला। न सड़क बनी और न ही स्थायी मरम्मत हुई।
घोषणाएं कागजों तक सीमित
बीते वर्ष जिला पंचायत सदस्य एवं निर्माण समिति के अध्यक्ष ज्ञानेंद्र सिंह 'ज्ञानू' ने सड़क का निर्माण जल्द शुरू कराने का आश्वासन दिया था। कुछ स्थानों पर गड्ढों में मिट्टी और गिट्टी डालकर औपचारिक मरम्मत जरूर की गई, लेकिन पहली ही बारिश में वह भी बह गई। आज सड़क पहले से अधिक खतरनाक हो चुकी है।
बड़े हादसे का इंतजार
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रशासन और संबंधित विभाग किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है। जब रोज लोग घायल हो रहे हैं, वाहन क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और हजारों ग्रामीण परेशान हैं, तब भी जिम्मेदारों की संवेदनाएं क्यों नहीं जाग रहीं। करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं के बीच यह सड़क आज भी सरकारी उदासीनता की गवाही दे रही है।
क्या कहते हैं लोग
इस सड़क को जब से देखा है जर्जर हालत में ही है। हमारे क्षेत्र से कई जनप्रतिनिधि हुए लेकिन सड़क को लेकर उनकी उदासीनता ही दिखी है। अब चुनाव के पहले हमे भाषण, घोषणाएं और आश्वासन नहीं, बल्कि मजबूत और सुरक्षित सड़क चाहिए।
शिवम सिंह, ग्रामीण
करीब आधा सैकड़ा गांवों की जीवनरेखा बनी सड़क बदहाल है। बरसात आते ही इस मार्ग पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ गया है। इस पर कुछ अन्य साथियों के साथ सतना कलेक्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा था पर अब तक किसी ने ध्यान नहीं दिया है। ऐसा लगता है कि चक्काजाम आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
राजेश शुक्ला, ग्रामीण
इस मार्ग की बदहाल स्थिति का सबसे अधिक असर परिवहन पर भी पड़ रहा है। बड़े-बड़े गड्ढों और जर्जर रास्ते के कारण बसों का रखरखाव और मरम्मत खर्च कई गुना बढ़ गया है। आए दिन सस्पेंशन, टायर, चैंबर और अन्य पुर्जे खराब हो रहे हैं, जिससे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। कई बार बसें रास्ते में ही खराब हो जाती हैं। लोगों की परेशानी को देखते हुए मजबूरी में किसी तरह बसों का संचालन जारी रखे हुए हैं।
सुरेश पाण्डेय, बस संचालक
यह सड़क हमारे लिए रोज की परीक्षा बन गई है। गड्ढों और कीचड़ के कारण समय पर दूध नहीं पहुंच पाता, कई बार दूध छलककर खराब हो जाता है। सड़क की बदहाली से रोज कमाई से ज्यादा नुकसान हो रहा है, फिर भी मजबूरी में इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है।
रोहित तिवारी, शिंपू, दुग्ध व्यवसायी नंदहा


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