सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच ने सबरीमाला केस में धार्मिक भेदभाव पर सुनवाई की। जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि मंदिरों में सभी का प्रवेश धर्म को मजबूत करता है। जानें सुनवाई के प्रमुख बिंदु।

नई दिल्ली। स्टार समाचार वेब
सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर और धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विवाद पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस छिड़ी। 9 जजों की संवैधानिक पीठ के समक्ष जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने मंदिरों के रीति-रिवाजों और सामाजिक एकता को लेकर गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथाओं के नाम पर भेदभाव न केवल समाज को बांटता है, बल्कि धर्म की मूल अवधारणा के भी खिलाफ है।
सुनवाई के तीसरे दिन जस्टिस नागरत्ना ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि मंदिरों में केवल विशेष समुदायों या क्षेत्रों के लोगों के प्रवेश की अनुमति दी जाए और बाहरी लोगों को रोका जाए, तो इससे सामाजिक विभाजन पैदा होगा। उन्होंने तर्क दिया कि चाहे वह गौड़ सारस्वत समुदाय हो या कांची और शृंगेरी जैसे प्रतिष्ठित मठ, श्रद्धालुओं का अलग-अलग धार्मिक स्थलों पर जाना धर्म को कमजोर नहीं बल्कि और अधिक शक्तिशाली बनाता है। समावेशिता ही धर्म की असली ताकत है।
पीठ ने अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का अंत) को संविधान का एक अत्यंत शक्तिशाली स्तंभ बताया। जजों ने कहा कि छुआछूत केवल कानून की नजर में अपराध नहीं है, बल्कि भारतीय संविधान स्वयं इसे एक गंभीर अपराध घोषित करता है। यह संवैधानिक गरिमा से जुड़ा मामला है, जिसे किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज की आड़ में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अदालत ने अनुच्छेद 26 (धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के अधिकार) और सरकार के सामाजिक सुधार की शक्तियों के बीच संतुलन पर भी चर्चा की। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार समाज सुधार के लिए कोई कानून लाती है, तो उसका प्रभाव धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों पर पड़ना स्वाभाविक है। यह कहना गलत होगा कि धार्मिक प्रथाएं सामाजिक सुधारों से पूरी तरह ऊपर हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी जोड़ा कि यह हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाएगा।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वैद्यनाथन ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए तर्क दिया कि धर्म से जुड़े संवेदनशील मसलों और विवादों में अदालतों को हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि धार्मिक आस्था और परंपराओं के मामले काफी जटिल होते हैं, जहाँ न्यायिक सक्रियता की सीमाएं होनी चाहिए।

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