मध्यप्रदेश नेतृत्व चाहता है कि राज्य की सीटों पर स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता मिले। इससे कई पुराने और समर्पित कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गए हैं।

भोपाल। अरविंद मिश्र
मध्य प्रदेश में 19 जून को खाली हो रहीं राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव होने जा रहा है। इनमें दो सीटें भाजपा के पास हैं, जिन पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन सांसद हैं। वहीं एक सीट कांग्रेस के पास है, जिस पर अभी दिग्विजय सिंह सांसद हैं। दिग्विजय सिंह पहले ही राज्यसभा जाने से इंकार कर चुके हैं, जिसके बाद कांग्रेस में इस सीट के लिए कई दावेदार सामने आ गए हैं। हालांकि ये फैसला दिग्विजय सिंह का है, इस पर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का कोई बयान सामने नहीं आया है। वहीं संभावना यह भी है कि अंतिम समय पर दिग्विजय सिंह ही मैदान में नजर आएं। सीटों के समीकरण बदलने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के नेता सक्रिय हो गए हैं। टिकट की दावेदारी को लेकर अंदरूनी कलह और खेमेबंदी भी शुरू कर दी है। कांग्रेस के भीतर एक अनार 100 बीमार जैसे हालात हैं।
दरअसल, देश के दूसरे राज्यों में राज्यसभा सीट को लेकर क्रॉस वोटिंग की घटना ने मध्य प्रदेश की सियासत में हलचल बढ़ा दी है। मध्यप्रदेश में तीन में से दो सीटों पर भाजपा की स्थिति मजबूत मानी जा रही है, जबकि तीसरी सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। यह सीट अभी कांग्रेस के पास है, लेकिन पार्टी के सामने इसे बरकरार रखना चुनौतीपूर्ण लगने लगा है। हाल ही में बिहार, हरियाणा और ओडिशा में राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायकों की क्रॉस वोटिंग की घटनाओं ने मध्यप्रदेश कांग्रेस की चिंता बढ़ा दी है। बिहार में मतदान के दौरान कांग्रेस के तीन विधायक गायब हो गए, जबकि हरियाणा और ओडिशा में कुछ विधायकों ने विरोधी खेमे के उम्मीदवारों के पक्ष में वोट कर दिया। इन घटनाओं से कांग्रेस नेतृत्व अलर्ट हो गया है। खासकर मध्यप्रदेश में होने वाले चुनाव को लेकर काफी सतर्कता का दावा किया जा रहा है। इसी बीच पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर दावा किया है कि यदि 5-6 विधायक भी इधर-उधर हो गए तो कांग्रेस की सीट खतरे में पड़ सकती है। इससे कांग्रेस को सेंधमारी का डर ज्यादा सताने लगा है।
2022 में 19 विधायकों ने की थी क्रॉस वोटिंग
वर्ष 2022 में राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए की ओर से द्रोपदी मुर्मू और यूपीए की ओर से यशवंत सिन्हा उम्मीदवार थे। मध्यप्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 47 सीटें आदिवासी समाज के लिए आरक्षित हैं। उस वक्त कांग्रेस, सपा, बसपा, निर्दलीयों को मिलाकर और विपक्ष के पास 100 विधायक थे। जबकि, यूपीए उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को मात्र वोट 79 ही मिले थे। भाजपा प्रत्याशी द्रोपदी मुर्मू को 146 वोट मिले थे। उस वक्त 19 विधायकों ने क्रॉस वोट किया था। विपक्ष के कई आदिवासी विधायकों ने मुर्मू को आदिवासी चेहरा होने के कारण वोट दिया था। राष्ट्रपति चुनाव में हो चुकी क्रॉस वोटिंग के बाद मध्यप्रदेश में एक सीट पर खतरा बढ़ा हुआ है।
मध्यप्रदेश का चुनावी गणित
मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सदस्य हैं। लेकिन विजयपुर विधायक का मतदान अधिकार छिन जाने के बाद अब प्रभावी संख्या 229 रह गई है। अभी तीन राज्य सभा सीटें खाली होने वाली हैं। एक सीट जीतने के लिए 58 वोट जरूरी है। भाजपा के पास अभी 164 विधायक हैं। इस गणित पर भाजपा दो सीटें आसानी से जीत सकती है।
कांग्रेस में कम हो गए दो विधायक
कांग्रेस के पास 65 विधायक हैं, लेकिन सभी की स्थिति स्पष्ट नहीं है। सागर जिले की बीना सीट से विधायक निर्मला सप्रे के खिलाफ दलबदल का केस लंबित है। विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता को लेकर कानूनी विवाद चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने शर्त के साथ राहत दी है, लेकिन वे राज्यसभा मतदान में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। इन परिस्थितियों में कांग्रेस के पास प्रभावी वोटों की संख्या घट घटकर 63 हो गई है, जिससे चुनावी गणित बिगड़ना तय है।
तीसरी सीट पर टिकी नजर
तीसरी सीट को लेकर मुकाबला दिलचस्प होने की संभावना है। अगर भाजपा तीसरी सीट जीतना चाहती है, तो उसे कम से कम 8 विधायकों की क्रॉस वोटिंग या अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ेगी। वहीं, कांग्रेस को आशंका है कि यदि क्रॉस वोटिंग होती है या भाजपा अतिरिक्त उम्मीदवार उतारती है, तो उसका गणित बिगड़ सकता है।
पिछले चुनाव पर एक नजर
गौरतलब है कि 2020 में हुए राज्यसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सुमेर सिंह सोलंकी निर्वाचित हुए थे। सिंधिया के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उपचुनाव में जॉर्ज कुरियन को राज्यसभा भेजा गया था। अब एक बार फिर तीन सीटों पर चुनाव होना है, जिसने प्रदेश की राजनीति को गरमा दिया है।
कांग्रेस में दावेदारों की फौज
दिग्विजय सिंह के इंकार के बाद कांग्रेस के भीतर इस सीट के लिए कई नेताओं ने दावा ठोक दिया है। इनमें प्रमुख रूप से पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन, पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल, पूर्व सांसद सज्जन सिंह वर्मा और दलित वर्ग के नेता प्रदीप अहिरवार शामिल हैं। वहीं कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने पार्टी आलाकमान को पत्र लिखकर मांग की है कि इस बार राज्यसभा का सांसद दलित वर्ग से होना चाहिए।
पटवारी का राज्यसभा जाने से इंकार
सियासी धमासान के बीच कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दो टूक शब्दों में कहा- मैं राज्यसभा नहीं जा रहा हूं। उन्होंने कहा- कांग्रेस के अध्यक्ष का पद जिम्मेदारी का होता है। काम के लिए 24 घंटे भी कम पड़ते हैं। मेरे अलावा कोई भी साथी राज्यसभा जाएगा। भाजपा को चिंतित होने की जरूरत नहीं है। दिग्विजय सिंह के सवाल पर पटवारी ने कहा- वो राज्यसभा के उम्मीदवार हो सकते हैं। ये पार्टी निर्णय करेगी।
राज्यसभा चुनाव बनेगा शक्ति परीक्षण
भाजपा-कांग्रेस सार्वजनिक रूप से संयम दिखा रहे हैं। लेकिन अंदरखाने जोरदार खींचतान चल रही है। भाजपा में दावेदारों की लंबी सूची है तो कांग्रेस में एक सीट के लिए कई वरिष्ठ नेता सक्रिय हैं। राज्यसभा के नाम तय करना इस बार दोनों दलों के लिए आसान नहीं होगा। तीन सीटें खाली होने जा रही हैं। भाजपा की दो और कांग्रेस की एक सीट दांव पर। भाजपा में एक सीट पर सस्पेंस, दूसरी पर पुनर्नियुक्ति की संभावना। कांग्रेस में नए चेहरे की तलाश शुरू। मध्यप्रदेश की ये तीन सीटें केवल औपचारिक चुनाव नहीं होंगी। यह चुनाव बताएगा कि भाजपा संगठन में किसे तरजीह देती है और कांग्रेस दिग्विजय के बाद किसे नया चेहरा बनाती है। 2028 की सियासत की असली पटकथा यहीं से लिखी जाएगी।
भाजपा में भी दावेदार सक्रिय
भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि दोनों सीटों पर किसे भेजा जाए। जॉर्ज कुरियन को दोबारा मौका मिल सकता है। क्योंकि वो केंद्रीय मंत्री हैं। जहां तक सुमेर सिंह सोलंकी का सवाल है वे प्रदेश भाजपा के महामंत्री हैं। कुछ समय पूर्व ही उन्हें हेमंत खंडेलवाल ने अपनी नई टीम में शामिल किया है। इसलिए उनकी जगह नया चेहरा लाया जा सकता है। हालांकि पार्टी के भीतर अन्य नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं। संभावित दावेदारों में पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, लाल सिंह आर्य रामकृष्ण कुसमारिया जैसे नाम सामने आ रहे हैं। पहले जयभान सिंह पवैया का भी रेस में नाम था लेकिन वित्त आयोग का अध्यक्ष बनने से उनका पत्ता कटा गया।
भाजपा का सामाजिक संतुलन पर फोकस
मध्यप्रदेश नेतृत्व चाहता है कि राज्य की सीटों पर स्थानीय चेहरों को प्राथमिकता मिले। इससे कई पुराने और समर्पित कार्यकर्ता भी सक्रिय हो गए हैं। भाजपा में चर्चा भी है कि इस बार युवा चेहरे को मौका दिया जा सकता है। कुछ हलकों में यह भी चर्चा है कि पार्टी सामाजिक संतुलन साधने के लिए साधु-संत या अप्रत्याशित चेहरे पर दांव खेल सकती है। यही वजह है कि अंदरूनी लॉबिंग तेज हो गई है।
मुकाबला त्रिकोणीय होने के संकेत
इधर, मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव में भारत आदिवासी पार्टी (बाप) के विधायक कमलेश्वर डोडियार भी अब अपनी पार्टी का उम्मीदवार उतारने जा रहे हैं। रतलाम जिले की सैलाना सीट से बाप के विधायक कमलेश्वर डोडियार ने कहा- मैं मप्र में भारत आदिवासी पार्टी का अकेला विधायक हूं। हमारी पार्टी की ओर से राज्यसभा का एक उम्मीदवार होगा। अभी तक बाप के एकमात्र विधायक का वोट निर्णायक माना जा रहा था, लेकिन पार्टी द्वारा अपना उम्मीदवार उतारने के ऐलान से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं। अगर बाप अन्य दलों के विधायकों को अपने पक्ष में करने में सफल होती है, तो मुकाबला और ज्यादा रोचक हो जाएगा। भाजपा जहां दो सीटों पर मजबूत दिख रही है। वहीं तीसरी सीट पर कांग्रेस और बाप के कारण मुकाबला त्रिकोणीय होने के संकेत हैं।
इनका कहना है

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