राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कड़े अनुशासन से तपे और राजनीति में शुचिता, सत्यता और समन्वय को अपना आदर्श मानने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा ने स्टार समाचार से बातचीत की। अपने लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन के अनुभवों को साझा किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कड़े अनुशासन से तपे और राजनीति में शुचिता, सत्यता और समन्वय को अपना आदर्श मानने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता रघुनंदन शर्मा ने स्टार समाचार से बातचीत की। अपने लंबे राजनीतिक और सामाजिक जीवन के अनुभवों को साझा किया।
सवाल: राजनीति और संघ की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?
जवाब: किसान परिवार में जन्म और पिता से क्रांतिकारियों की कहानियाँ सुनकर राष्ट्रप्रेम जागा। गरीबी के कारण कम उम्र में संघर्ष सीखा। 11-12 वर्ष की आयु में के संपर्क में आया। वहाँ देशभक्ति का माहौल मिला और 14 साल की उम्र में कार्यवाह बन गया।
सवाल: आपने व्याख्याता की सरकारी नौकरी क्यों छोड़ दी?
जवाब: नौकरी के साथ मैं संघ का काम भी देखता था। तत्कालीन सरकार के एक मंत्री को मेरी सक्रियता खटकी। उन्होंने धमकी दी कि या तो संघ छोड़ो या बस्तर ट्रांसफर के लिए तैयार रहो। मैंने अगले ही दिन इस्तीफा दे दिया। मैं गुलाम बनकर नौकरी नहीं कर सकता था। राष्ट्र सेवा मेरा पहला संकल्प था।
सवाल: आपातकाल के दौरान आपकी क्या भूमिका थी?
जवाब: मेरे खिलाफ वारंट था, इसलिए संघ के आदेश पर मैं वेश बदलकर भूमिगत हो गया। मैंने अपना नाम 'रामनारायण नाई' रख लिया था। जेल गए मीसाबंदियों के परिवारों की आर्थिक व सामाजिक देखभाल की। जब 1977 में आपातकाल हटा, तभी घर लौटा।
सवाल: आपको पहली बार विधानसभा का टिकट कैसे मिला और फिर दोबारा चुनाव क्यों नहीं लड़ा?
जवाब: आपातकाल में संकट के समय मेरी कर्मठता देखकर संगठन ने मुझे अचानक टिकट दिया। मैं सबसे कम उम्र में सर्वाधिक मतों से जीता। चुनाव का कर्ज मैंने अपनी तनख्वाह से चुकाया। बाद में कुशाभाऊ ठाकरे जी ने काम से प्रभावित होकर मुझसे कहा कि अब चुनाव नहीं लड़ना है, संगठन का काम देखना है। मैंने सहर्ष स्वीकार किया।
सवाल : एक चर्चा यह भी है कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आपके कर्जदार हैं। यह क्या किस्सा है?
जवाब: शिवराज सिंह जी मेरे व्यक्तिगत कर्जदार नहीं हैं, लेकिन हाँ, वह मानस भवन के कर्जदार जरूर हैं। दरअसल, हमने एक कार्यक्रम में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में मानस भवन बुलाया था। तब मैंने उनसे मंच पर ही निवेदन किया था कि वे मानस भवन के आजीवन संरक्षक सदस्य बनें। उन्होंने सहर्ष माइक संभालते हुए सबके सामने घोषणा की थी कि वे संरक्षक सदस्य जरूर बनेंगे। इस सदस्यता के लिए ₹1,11,000 की राशि जमा करनी होती है। अब इस बात को ढाई साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वह राशि अभी तक उनकी जेब से बाहर नहीं आ पाई है। अब मुझे उनके किसी करीबी व्यक्ति को कहना पड़ेगा कि भाई, वह राशि निकलवा कर लाओ।
सवाल: आपकी छवि तीखा बोलने वाले नेता की कैसे बनी? शिवराज जी को 'घोषणावीर' कहने का क्या किस्सा है?
जवाब: यह मेरा स्वभाव दोष है। 1977 में मेरी ही पहल पर मीसाबंदियों को पेंशन मिलना शुरू हुई, पर मैंने खुद कभी लाभ नहीं लिया। शिवराज जी को मैंने 'घोषणावीर' (वीरता से घोषणा करने और पूरा करने वाला) कहा था, जिसे मीडिया ने उछाला। बाद में उन्होंने खुद सदन में इस बात को स्वीकार किया।
सवाल: मुफ्त योजनाएं और जातिगत जनगणना पर आपकी क्या राय है?
जवाब: मुफ्त पैसे बांटना कोई स्कीम नहीं, बल्कि वोटरों को प्रलोभन देना और खजाने की बर्बादी है। चाहे मेरी सरकार हो, गलत को गलत कहूंगा। सक्षमों को रेवड़ियां बांटने की जरूरत नहीं है। संघ और भाजपा में जातिवाद का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। सत्ता मिले या न मिले, जातिवाद का विरोध होना चाहिए।
सवाल: क्या स्पष्टवादिता के कारण आप अकेले पड़े? अब आपकी क्या व्यस्तता है?
जवाब: मैं कभी अकेला नहीं पड़ा। लोग अकेले में आकर मेरे सच की तारीफ करते हैं। 75 वर्ष की आयु के बाद मैंने स्वयं चुनावी राजनीति से दूरी बना ली। अब मैं तुलसी मानस भवन के माध्यम से साहित्य और संस्कृति की सेवा कर रहा हूँ। ट्रेनों की यात्रा के दौरान मैंने 16-17 किताबें लिखी हैं। मेरी कलम ईश्वर, देश और बलिदानियों के लिए चलेगी, किसी जीवित राजनेता की चापलूसी के लिए नहीं।
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