मप्र में जेन जी और जेन अल्फा का टाइम आ गया है या नहीं और राजनीतिक दल इस नई चुनौती से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं, इसी पर स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट—

अरविंद मिश्र
बॉलीवुड में एक फिल्म आई थी "गली बॉय'... इस फिल्म में युवा का गाया एक गीत था 'अपना टाइम आएगा'... जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद से ऐसा महसूस किया अथवा कराया जा रहा है कि अपना टाइम आ गया। मप्र में जेन जी और जेन अल्फा का टाइम आ गया है या नहीं और राजनीतिक दल इस नई चुनौती से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं, इसी पर स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट—
मध्यप्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव भले ही अभी करीब दो साल दूर हो, लेकिन चुनावी जमीन पर उसकी आहट सुनाई देने लगी है। जंतर-मंतर के आंदोलनों और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद देश की राजनीति में जिस तरह छात्र, युवा और शिक्षा से जुड़े मुद्दे अचानक बड़े राजनीतिक हथियार बनकर उभरे हैं, उसने विपक्ष को एक नई रणनीति दिखाई है। मध्यप्रदेश में भी इसी रणनीति की संभावनाएं तलाशने की कोशिश दिखाई दे रही है, जहां बड़े आंदोलन के बजाय छोटे-छोटे मुद्दों को लगातार उठाकर सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाने की जमीन तैयार की जा रही है।
इस पूरी कवायद में एक दिलचस्प नाम तेजी से चर्चा में है— ‘जेन जी’ और उसके साथ उभरता हुआ ‘जेन अल्फा’। यहां ‘जेन जी’ को केवल किसी एक संगठन या आंदोलन के नाम के तौर पर देखने के बजाय उस युवा लामबंदी के प्रतीक के रूप में देखना होगा, जिसे पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग मुद्दों पर सड़कों पर उतरते हुए देखा गया है। खास बात यह है कि इन आंदोलनों के पीछे प्रत्यक्ष रूप से कोई बड़ा राजनीतिक दल दिखाई नहीं देता, लेकिन उनके मुद्दे और उनकी राजनीतिक उपयोगिता ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को इस वर्ग की ओर देखने के लिए मजबूर कर दिया है।
छोटे आंदोलन, बड़ा राजनीतिक संदेश
वैसे मध्यप्रदेश में पिछले 4 वर्षों के दौरान स्कूली छात्र-छात्राओं ने अलग-अलग स्थानों पर स्कूल और सरकारी हॉस्टल की समस्याओं को लेकर आंदोलन किए हैं। इसमें अधिकारियों का घेराव करने के साथ कुछ स्थानों पर बच्चियों और छात्राओं ने तड़के पैदल मार्च कर प्रशासन तक अपनी आवाज पहुंचाई। लेकिन उस समय किसी ने भी छात्र-छात्राओं के आंदोलन को जेन जी और जेन अल्फा के रूप में नहीं देखा, परंतु जंतर-मंतर के आंदोलन की सफलता के बाद प्रदेश में ऐसे आंदोलनों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इसको मीडिया में व्यापक स्थान मिलने से यह समस्या निवारण का लोकप्रिय माध्यम बन गया है।
राजनीतिक दल हाशिये पर
राजनीति में किसी बड़े आंदोलन का प्रभाव तभी पैदा होता है जब उसके पीछे लगातार छोटे-छोटे मुद्दों की श्रृंखला तैयार हो। यही रणनीति अब मध्यप्रदेश में दिखाई दे रही है। एक जगह शिक्षा का सवाल, दूसरी जगह रोजगार, कहीं परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया, कहीं फीस, कहीं छात्रावास, कहीं प्रशासनिक निर्णय और कहीं युवाओं की स्थानीय समस्याएं। हर मुद्दा अपने आप में छोटा हो सकता है, लेकिन जब ऐसे दर्जनों मुद्दे एक ही छात्र समूह को जोड़ने लगें तो वह धीरे-धीरे राजनीतिक ताकत में बदल सकता है। और यही सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेत है।
‘जेन जी’ क्यों महत्वपूर्ण
मध्यप्रदेश में युवा (18 से 29 वर्ष आयु) मतदाताओं की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है। यह संख्या केवल एक चुनावी आंकड़ा नहीं है। यह प्रदेश की राजनीति की दिशा बदलने की क्षमता रखने वाला सामाजिक समूह है। युवा मतदाता परंपरागत राजनीतिक निष्ठाओं से अपेक्षाकृत कम बंधा हुआ है। वह सरकार के विकास कार्यों को भी देखता है, लेकिन साथ ही रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता, शिक्षा की गुणवत्ता, फीस, भर्ती प्रक्रिया, अवसर और प्रशासनिक संवेदनशीलता को भी उतनी ही गंभीरता से लेता है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि युवा किस पार्टी के साथ जाएगा। सवाल यह है कि युवा किस मुद्दे के साथ खड़ा होगा। वैसे भी यदि किसी संगठन या समूह को यह क्षमता हासिल हो जाए कि वह युवाओं की स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक विमर्श में बदल सके, तो वह चुनाव में किसी दल का प्रत्यक्ष विकल्प न होते हुए भी चुनावी परिणाम को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि ‘जेन जी’ आज राजनीतिक दलों के निशाने पर हैं। लेकिन यह निशाना विरोध का नहीं, रिझाने का है।
कांग्रेस को दिख रहा है खोया
जनाधार वापस पाने का रास्ता
कांग्रेस के सामने मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने जनाधार को स्थायी राजनीतिक समर्थन में बदलने की है। चुनावी पराजय के बाद कांग्रेस को लगातार ऐसे सामाजिक और युवा समूहों की तलाश रहती है जो सरकार के खिलाफ असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदल सकें। ऐसे में ‘जेन जी’ कांग्रेस के लिए एक संभावित हथियार दिखाई दे सकते हैं। कांग्रेस यदि सीधे राजनीतिक झंडे के नीचे युवाओं को खड़ा करती है तो सरकार उसे तत्काल विपक्षी राजनीति के रूप में देख सकती है। लेकिन यदि वही मुद्दे सामाजिक आंदोलन के रूप में सामने आते हैं, तो उनका प्रभाव कहीं व्यापक हो सकता है। यानी रणनीति यह हो सकती है कि मुद्दा सामाजिक रहे, आंदोलन युवा चेहरा लेकर चले और राजनीतिक लाभ अंततः विपक्ष को मिले। हालांकि यह तभी संभव होगा जब आंदोलनकारी समूह अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखे। यदि वह सीधे किसी राजनीतिक दल का विस्तार दिखाई देने लगा, तो उसकी स्वीकार्यता सीमित हो सकती है।
भाजपा भी सक्रिय
दूसरी ओर भाजपा इस संभावित समीकरण को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है। सत्ताधारी दल के लिए चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष क्या कर रहा है। असली चुनौती यह है कि विपक्ष किन सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है। यदि किसी ऐसे समूह का प्रभाव तेजी से बढ़ता है, जिसकी पहुंच कॉलेजों, युवाओं, विद्यार्थियों और छोटे शहरों तक हो, तो स्वाभाविक रूप से भाजपा भी उससे संवाद और समन्वय की संभावनाएं तलाशेगी। इसलिए ‘जेन जी’ को लेकर राजनीति में एक असामान्य स्थिति बन सकती है। एक ही समय में सत्ता और विपक्ष, दोनों की नजर उस पर हो। कांग्रेस उसे सरकार विरोधी आंदोलन की संभावित ताकत के रूप में देखे और भाजपा उसे अपने पाले में रखने की कोशिश करे। यहीं से ‘जेन जी’ की राजनीतिक अहमियत बढ़ती है।
असली लड़ाई मुद्दों की होगी
आने वाले समय में यदि ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ अलग-अलग क्षेत्रों में जिन मुद्दों को उठाते हैं, उनकी दिशा देखें तो मोटे तौर पर चार बड़े क्षेत्र दिखाई दे सकते हैं, जिनमें शिक्षा, रोजगार, परीक्षा-भर्ती व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही शामिल हैं।
पहला मुद्दा : शिक्षा सबसे बड़ा क्षेत्र हो सकता है। निजी शिक्षा संस्थानों की फीस, छात्र सुविधाएं, छात्रवृत्ति, परीक्षा परिणाम, विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली और विद्यार्थियों की शिकायतें ऐसे मुद्दे हैं जिन पर तत्काल प्रतिक्रिया पैदा होती है।
दूसरा मुद्दा : रोजगार है। सरकारी भर्तियों में देरी, परीक्षा प्रक्रिया, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्तियों से जुड़े सवाल युवाओं को सीधे प्रभावित करते हैं।
तीसरा मुद्दा: प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता है। देशभर में पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं और परीक्षा प्रणाली को लेकर युवाओं की संवेदनशीलता पहले से कहीं ज्यादा है। मध्यप्रदेश भी इससे अलग नहीं है।
चौथा मुद्दा: प्रशासनिक जवाबदेही है। जब युवा किसी समस्या को लेकर सीधे कलेक्टर, कमिश्नर या विभागीय अधिकारियों के कार्यालय तक पहुंचते हैं और अधिकारियों को मौके पर जवाब देना पड़ता है, तो आंदोलन का प्रभाव तत्काल दिखाई देता है।
यही छोटे-छोटे प्रशासनिक टकराव भविष्य में बड़े राजनीतिक विमर्श का आधार बन सकते हैं।
खतरा आंदोलन नहीं, उसकी श्रृंखला
किसी एक आंदोलन से सरकार को बहुत बड़ा राजनीतिक नुकसान नहीं होता, लेकिन यदि प्रदेश के अलग-अलग जिलों में लगातार छोटे आंदोलन होने लगें, हर आंदोलन में स्थानीय युवाओं की भागीदारी बढ़े, सोशल मीडिया पर उनका प्रसार हो और हर आंदोलन के बाद प्रशासन को किसी न किसी स्तर पर निर्णय या कार्रवाई करनी पड़े, तो धीरे-धीरे यह संदेश बनने लगता है कि सरकार दबाव में प्रतिक्रिया दे रही है। राजनीतिक रूप से यही सबसे खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि चुनाव में सरकार के खिलाफ असंतोष हमेशा किसी एक बड़े मुद्दे से नहीं बनता। कई बार छोटे-छोटे असंतोष मिलकर बड़ी राजनीतिक धारणा बना देते हैं। आज जिस मुद्दे का असर एक जिले तक सीमित है, वही कल संभागीय मुद्दा बन सकता है; फिर प्रदेशव्यापी मुद्दा।
बच्चियों का पैदल मार्च महत्वपूर्ण संकेत
किसी आंदोलन में छात्राओं और बच्चियों की भागीदारी राजनीतिक रूप से विशेष प्रभाव पैदा करती है। जब सुबह-सुबह छात्राएं पैदल मार्च करते हुए कलेक्टर कार्यालय पहुंचती हैं, तो वह केवल प्रशासनिक शिकायत नहीं रह जाती। वह दृश्यात्मक राजनीतिक संदेश बन जाता है। मीडिया और सोशल मीडिया ऐसे दृश्यों को तेजी से प्रसारित करते हैं। इससे आंदोलन का वास्तविक आकार कई गुना बड़ा दिखाई दे सकता है। यही कारण है कि आने वाले दिनों में सरकार को केवल भीड़ की संख्या नहीं देखनी चाहिए। उसे यह भी देखना होगा कि कौन से चेहरे सामने आ रहे हैं, कौन से मुद्दे बार-बार दोहराए जा रहे हैं और कौन से आंदोलन अलग-अलग जिलों में एक जैसी भाषा और रणनीति अपना रहे हैं।
युवा तय करेंगे किसकी नैया डूबेगी
मध्यप्रदेश की अगली विधानसभा चुनावी लड़ाई केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं होगी। उसके समानांतर एक तीसरी लड़ाई भी चलेगी— सरकार बनाम असंतोष। यदि भाजपा सरकार अपने विकास कार्यों, रोजगार, शिक्षा, निवेश और प्रशासनिक सुधारों को युवाओं तक प्रभावी ढंग से पहुंचा पाती है, तो छोटे आंदोलन बड़े राजनीतिक संकट में बदलने से पहले ही नियंत्रित किए जा सकते हैं। लेकिन यदि सरकार ने यह मान लिया कि हर आंदोलन के पीछे विपक्ष है और इसलिए उसे केवल राजनीतिक विरोध समझकर खारिज किया जा सकता है, तो यही रणनीति उल्टा असर डाल सकती है। क्योंकि युवा मतदाता को राजनीतिक बयान से ज्यादा अपनी समस्या का समाधान चाहिए।
दो साल का समय सरकार के
लिए अवसर और चेतावनी
अगले विधानसभा चुनाव में अभी लगभग दो वर्ष हैं। यही समय सरकार के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। यदि आज किसी जिले में दस छात्र अपनी समस्या लेकर कलेक्टर के पास पहुंच रहे हैं तो उसे महज दस लोगों का आंदोलन मानना राजनीतिक भूल होगी। सरकार को यह देखना होगा कि उस समस्या की जड़ क्या है, कितने युवा उससे प्रभावित हैं और क्या वह समस्या प्रदेश के दूसरे हिस्सों में भी मौजूद है। क्योंकि आंदोलन का आकार आज छोटा हो सकता है, लेकिन उसका राजनीतिक विस्तार कल बहुत बड़ा हो सकता है। ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ इसी बदलती राजनीति के संकेतक के रूप में देखे जा सकते हैं। वे अभी किसी राजनीतिक दल का विकल्प नहीं हैं, लेकिन यदि अलग-अलग मुद्दों पर युवाओं को लामबंद करने की उनकी क्षमता बढ़ती है, तो वे चुनावी राजनीति के लिए प्रभावशाली मध्यस्थ शक्ति जरूर बन सकते हैं। और शायद यही वजह है कि सत्ता और विपक्ष दोनों की निगाहें अब उन पर टिकने लगी हैं। मध्यप्रदेश सरकार के लिए संदेश सीधा है— अभी समय है चौकन्ना होने का। आंदोलनों को दबाने का नहीं, उन्हें समझने का। मांगों को खारिज करने का नहीं, उनकी जड़ तक पहुंचने का। युवाओं को राजनीतिक भीड़ मानने का नहीं, उन्हें नीति-निर्माण का सहभागी बनाने का। क्योंकि अगले चुनाव में सवाल केवल यह नहीं होगा कि कौन-सी पार्टी कितनी सीटें जीतती है। सवाल यह होगा कि डेढ़ करोड़ युवा मतदाताओं का गुस्सा, भरोसा और उम्मीद, किस तरफ जाती है। और जिस दिन यह तय हो गया, उसी दिन तय होगा कि मध्यप्रदेश में किसकी नैया किनारे लगेगी और किसकी डूबेगी।
जनरेशन
| साइलेंट जनरेशन | 1928 – 1945 | 81 से 98 वर्ष |
| बेबी बूमर्स | 1946 – 1964 | 62 से 80 वर्ष |
| जेनरेशन एक्स | 1965 – 1980 | 46 से 61 वर्ष |
| मिलेनियल्स / जेन वाई | 1981 – 1996 | 30 से 45 वर्ष |
| जेनरेशन जेड | 1997 – 2012 | 14 से 29 वर्ष |
| जेनरेशन अल्फा | 2013 – 2024 | 2 से 13 वर्ष |
| जेनरेशन बीटा | 2025 के बाद | 0 से 1 वर्ष (नवजात) |
2023 में जेन जी भाजपा के साथ
मध्यप्रदेश की राजनीति में ‘जेन जी’ की मौजूदा सक्रियता को समझने के लिए 2023 के विधानसभा चुनाव को भी पीछे मुड़कर देखना होगा। भाजपा ने उस चुनाव में 230 में से 163 सीटें जीतकर दो-तिहाई से भी ज्यादा बहुमत हासिल किया था और उसका वोट शेयर करीब 48.55 प्रतिशत रहा था। उस चुनाव में भाजपा को मिले व्यापक सामाजिक समर्थन में जेन/युवा समाज की भूमिका को भी राजनीतिक हलकों में महत्वपूर्ण माना गया। यही वजह है कि आज ‘जेन जी’ को लेकर राजनीति का नजरिया केवल सामाजिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं है। सवाल यह है कि जिस सामाजिक ताकत ने पिछले चुनाव में भाजपा की जीत को मजबूती दी, वह अगले चुनाव में किस दिशा में जाएगी?
और अब.....
2023 में ‘जेन जी’ भाजपा के साथ दिखाई दिए, लेकिन अब चुनावी गणित बदल रहा है। अगला विधानसभा चुनाव करीब दो वर्ष दूर है और विपक्ष इस बात को समझ चुका है कि किसी भी बड़े सामाजिक समूह को सीधे अपने राजनीतिक झंडे के नीचे लाने के बजाय उसके मुद्दों के साथ खड़ा होना ज्यादा प्रभावी रणनीति हो सकती है। यही कारण है कि ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ की छोटी-छोटी गतिविधियां अब राजनीतिक दृष्टि से बड़ी दिखाई देने लगी हैं। यदि शिक्षा, रोजगार, व्यापार, प्रशासनिक निर्णय, युवा हित और सामाजिक सम्मान जैसे मुद्दों को लगातार उठाया जाता है और इन मुद्दों पर युवाओं तथा समाज की भागीदारी बढ़ती है, तो यह केवल स्थानीय आंदोलन नहीं रहेगा। धीरे-धीरे यह चुनावी विमर्श का हिस्सा बन सकता है।
भाजपा के लिए चुनौती इसलिए भी बड़ी है कि 2023 में जिस सामाजिक समर्थन ने उसे मजबूती दी, उसे 2028 तक बनाए रखना केवल राजनीतिक अपील से संभव नहीं होगा। उसे यह देखना होगा कि जिन युवाओं और सामाजिक समूहों ने उसके साथ खड़े होकर सत्ता में वापसी कराई, उनकी नई पीढ़ी आज किन मुद्दों को लेकर बेचैन है।
कांग्रेस के लिए यही अवसर है। उसे लगता है कि यदि वह ‘जेन जी’ को केवल किसी समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, युवा और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों से जुड़े प्रभावशाली सामाजिक नेटवर्क के रूप में देखे, तो वह भाजपा के मजबूत सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है।
भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा यह नहीं कि कोई एक आंदोलन उसके खिलाफ खड़ा हो जाए। खतरा यह है कि जिन मुद्दों पर आज छोटे-छोटे आंदोलन हो रहे हैं, वे कल एक साझा असंतोष में बदल जाएं। यदि ऐसा हुआ तो 2023 की सामाजिक गोलबंदी का समीकरण 2028 में उसी रूप में दोहराया जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए सरकार को अभी से यह समझना होगा कि ‘जेन जी’ को केवल आंदोलनकारी चेहरे के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। उनके पीछे खड़े सामाजिक मनोविज्ञान, युवाओं की आकांक्षाओं और बदलते मुद्दों को पढ़ना ज्यादा जरूरी है।
मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सनवर पटेल ने अपने छात्र जीवन (एबीवीपी) से लेकर राजनीति के सफर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ पुराने संघर्षों और वक्फ बोर्ड की नई रणनीतियों पर खुलकर बात की।
मप्र में जेन जी और जेन अल्फा का टाइम आ गया है या नहीं और राजनीतिक दल इस नई चुनौती से निपटने के लिए क्या कर रहे हैं, इसी पर स्टार समाचार की विशेष रिपोर्ट—
प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में संगठन ने जिन नेताओं पर सबसे अधिक भरोसा किया गया, वे अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके। पढ़िए विश्लेषण
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कम मतदान भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के लिए चुनौती बनेगा या कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम के लिए अवसर? यदि पिछले तीन उपचुनावों का रिकॉर्ड देखा जाए तो तस्वीर काफी दिलचस्प दिखाई देती है।
जानिए कैसे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सिर्फ तीन दिनों में समान नागरिक संहिता (UCC) पर ऐतिहासिक कदम उठाकर अपनी तेज और प्रभावी कार्यशैली का परिचय दिया है।
आज कानून की किताबों में "संजय नगाइच बनाम एमपी स्टेट' के नाम से लैंडमार्क जजमेंट है।
क्या अनुराग जैन की तरह दिल्ली में पदस्थ मप्र कैडर के अधिकारी यहां आएंगे या यहां पदस्थ अधिकारियों में से ही किसी की किस्मत चमकेगी। इसी पर स्टार समाचार की खास रिपोर्ट....
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से खास बातचीत
सरकारी दफ्तरों के अंदर की हलचल, तबादलों में पारदर्शिता, और प्रशासनिक गलियारों के दिलचस्प किस्से। जानिए कैसे बदल रही है काम करने की संस्कृति और क्या है अधिकारियों के 'जुगाड़' का सच।
मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव ने अब बेहद दिलचस्प राजनीतिक मोड़ ले लिया है। भाजपा ने इस बार बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाते हुए अपने वरिष्ठ नेता और पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर दोबारा दांव लगाने के बजाय नए चेहरे आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा है। इस फैसले ने न केवल दतिया बल्कि पूरे प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

जबलपुर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सरकारी कर्मचारियों को मिलेगा 100% वेतन और एरियर्स

जैतवारा से लेकर बारामाफी तक आक्रोश

खरमास 2025-2026: कब से कब तक रहेगा, जानें शुभ कार्यों की मनाही का कारण

ऑपरेशन सिंदूर...मुझे एक तस्वीर दिखा दो...जिसमें भारत का एक गिलास भी नहीं टूटा हो

लागू होंगे नए अवकाश नियम: CCL में वेतन कटौती, EL को 'अधिकार' नहीं मानेगा MP वित्त विभाग

MP College Admission 2026: ई-प्रवेश दूसरे चरण की अलॉटमेंट लिस्ट जारी, 13 जून तक जमा करें फीस

सुरक्षित और नेचुरल तरीके से बाल करना है काले तो अपनाएं ये उपाय

बची हुई चाय को दोबारा गर्म करके पीने क्या होगा, जानें इसके बारे में?

अगर 40 की उम्र कर ली है पार और रहना चाहते हैं तंदरुस्त तो अपनाएं ये आदतें

ठंडा पानी पीने और मीठा खाने पर दांतों में होती है झनझनाहट तो हो जाएं सावधान, नहीं तो हो सकती है बड़ी समस्या

ठंड में बढ़ जाती है डिहाइड्रेशन की समस्या, जानें क्या है कारण ?

तनाव से चाहिए है छुटकारा तो इन चीजों से करें तौबा, अपनाएं ये सलाह