कांग्रेस के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे थे कि विधायकों की बाड़ा बंदी कर संख्या बल उनके पक्ष में है और भाजपा की तीसरी सीट की संभावना समाप्त है, लेकिन राजनीति में आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच की दूरी बहुत कम होती है..

राजनीति में हार-जीत सिर्फ़ जनाधार से तय नहीं होती, रणनीति, सतर्कता और कानूनी बारीकियों की समझ भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि जीती हुई बाज़ी हारने की कोई पाठशाला है, तो कांग्रेस उसके सबसे अनुभवी अध्यापकों में गिनी जा सकती है।
अभी कुछ ही समय पहले कांग्रेस के दो विधायकों की सदस्यता कानूनी कारणों से चली गई थी। उम्मीद थी कि पार्टी इस घटना से सबक लेगी, अपने उम्मीदवारों और दस्तावेज़ों की सूक्ष्म जांच करेगी और विरोधी दल को कोई अवसर नहीं देगी। लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दिया। कांग्रेस ने एक बार फिर वही गलती दोहरा दी, जिसका राजनीतिक और राज्यसभा में संख्यात्मक नुकसान उसे उठाना पड़ रहा है।
दूसरी ओर भाजपा की कार्यशैली बिल्कुल अलग है। वहां जीत की संभावना यदि शून्य दशमलव शून्य एक प्रतिशत भी हो, तो उसे अवसर में बदलने की कोशिश की जाती है। भाजपा शायद इसीलिए नामांकन की अंतिम तिथि बीतने तक शांत रही। उसे संभवतः यह आभास था कि मीनाक्षी नटराजन के नामांकन से जुड़े दस्तावेज़ों में ऐसी कमजोरी मौजूद है, जिसे बाद में मुद्दा बनाया जा सकता है। और जब अवसर मिला तो उसने उसे भुनाने में एक पल की भी देरी नहीं की।
कांग्रेस के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे थे कि विधायकों की बाड़ा बंदी कर संख्या बल उनके पक्ष में है और भाजपा की तीसरी सीट की संभावना समाप्त है, लेकिन राजनीति में आत्मविश्वास और अति-आत्मविश्वास के बीच की दूरी बहुत कम होती है। यही दूरी कांग्रेस को भारी पड़ती दिख रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतनी अनुभवी राजनीतिक जमात बार-बार एक जैसी भूल कैसे कर बैठती है? कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे दशकों का अनुभव रखने वाले नेता पार्टी में मौजूद हैं। इसके बावजूद यदि विरोधी दल बार-बार कांग्रेस की कमजोर नस पकड़ लेता है, तो यह केवल भाजपा की रणनीतिक सफलता नहीं बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक विफलता भी है।
इस संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता कि मीनाक्षी नटराजन से जुड़े मामले की जानकारी कांग्रेस के भीतर से ही किसी "विभीषण" ने बाहर पहुंचाई हो। जिस राज्य में यह प्रकरण चल रहा है, वहां न भाजपा की सरकार है और न ही उसका प्रत्यक्ष प्रशासनिक प्रभाव। ऐसे में किसी निजी इस्तगासे से जुड़े मामले की जानकारी समय रहते भाजपा तक पहुंच जाना उसकी मजबूत राजनीतिक सूचना-व्यवस्था और नेटवर्किंग क्षमता का प्रमाण माना जा सकता है।
कांग्रेस के रणनीतिकार यह तर्क दे रहे हैं कि मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुई, केवल निजी इस्तगासे पर नोटिस जारी हुआ है। इसी आधार पर वे चुनाव आयोग के निर्णयों पर भी सवाल उठा रहे हैं और भाजपा से मिलीभगत के आरोप लगा रहे हैं। इन दावों की सच्चाई और कानूनी मजबूती का फैसला अंततः अदालत करेगी। अभी तो भाजपा ने अवसर देखा और वार कर दिया, जबकि कांग्रेस अवसर होते हुए भी खुद को बचाने में असफल रही।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक लाभ महेश केवट को मिला है। कुछ समय पहले तक वे भाजपा से निष्कासित थे। फिर संगठन ने उन्हें वापस स्वीकार किया, बोर्ड का अध्यक्ष बनाया और अब परिस्थितियां ऐसी बनीं कि राज्यसभा की सीट भी उनके खाते में जाती दिखाई दे रही है।
मीनाक्षी नटराजन की व्यक्तिगत राजनीतिक स्वीकार्यता पर पार्टी में उठे सवालों पर तो मंथन करना ही होगा, साथ ही कांग्रेस को यह भी समझना होगा कि भाजपा से लड़ाई केवल भाषणों, आरोपों और प्रेस कॉन्फ्रेंसों से नहीं जीती जा सकती। उसके लिए वैसी ही पैनी रणनीति, वैसी ही कानूनी तैयारी और वैसी ही राजनीतिक चौकसी चाहिए, जैसी भाजपा लगातार प्रदर्शित करती है।
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपनी बार-बार दोहराई जाने वाली गलतियां हैं। जब तक पार्टी अपनी रणनीतिक कमजोरियों को दूर नहीं करेगी, तब तक विरोधी दल को हराने से पहले वह स्वयं अपनी जीत को हार में बदलती रहेगी। राजनीति में विरोधी से हारना समझ में आता है, लेकिन अपनी ही चूकों से हारना, यह कला कांग्रेस ने शायद अब तक नहीं छोड़ी है।
नैतृत्च का गलत आकलन कर बैठी कांग्रेस
इस पूरे घटनाक्रम ने एक और तथ्य को रेखांकित किया है। जब मध्य प्रदेश में भाजपा ने नेतृत्व परिवर्तन कर डॉ. मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया था, तब विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग यह मान रहा था कि वे प्रदेश की राजनीति के पुराने और अनुभवी दिग्गजों के मुकाबले अपेक्षाकृत कमजोर साबित होंगे। लेकिन दो वर्ष के भीतर उन्होंने न केवल प्रशासनिक मोर्चे पर बल्कि राजनीतिक रणनीति के स्तर पर भी स्वयं को स्थापित किया है। कांग्रेस को घेरने, उसकी कमजोरियों को पहचानने और अवसरों को राजनीतिक लाभ में बदलने की कला में वे अपने पूर्ववर्तियों की परंपरा को आगे बढ़ाते दिखाई दे रहे हैं। कई मामलों में उनकी आक्रामकता और राजनीतिक सतर्कता पहले से भी अधिक प्रभावी नजर आती है। राज्यसभा चुनाव के इस घटनाक्रम ने भी संकेत दिया है कि डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा कांग्रेस को कोई भी रणनीतिक गलती आसानी से माफ करने के मूड में नहीं है। कांग्रेस यदि अब भी भाजपा को केवल संगठन की ताकत से आंक रही है, तो वह एक बार फिर नेतृत्व और रणनीति दोनों का गलत आकलन कर रही है।

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