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जय जगत का जलवा

कांग्रेस में 'जय जगत' का जलवा न केवल बरकरार है, बल्कि लगातार बढ़ रहा है; अब तो यह दिल्ली से मध्य प्रदेश में भी आ धमका है। इसके शिकार पार्टी के बड़े-बड़े दिग्गज होने लगे हैं। इस बार मध्य प्रदेश के क्षत्रप भी 'जय जगत' की आग में झुलस गए। क्षत्रपों को इसकी कतई उम्मीद नहीं थी, क्योंकि उन्होंने रणनीति ही ऐसी बनाई थी कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। लेकिन हाय रे 'जय जगत'... उसने क्षत्रपों के अरमानों पर पानी फेर दिया। यहां तक तो ठीक था, पर अफसोस इस बात का है कि जाति और वर्ग के पैंतरे भी नहीं चले। आखिर में युवराज की कोटरी (मंडली) ने वर्धा आश्रम में बैठकर ऐसा चक्र चलाया कि उनकी कोर टीम की सदस्य को उम्मीदवारी भी मिल गई और उन्हें जिताने की जिम्मेदारी भी क्षत्रपों पर डाल दी गई। नतीजा यह है कि समर्थकों में जबरदस्त हलचल है और इस बात की तलाश भी कि क्षत्रपों को छठी का दूध याद दिलाने वाला यह 'जय जगत' समूह आखिर क्या है और कौन-कौन इसमें शामिल हैं।
एक टिकट से ही मार्गदर्शक मंडल दिखने लगा

राज्यसभा चुनाव में जहां कांग्रेस में 'जय जगत' का जलवा रहा, वहीं भाजपा में भी राज्यसभा के राजसी ठाठ पर लार टपकाए बैठे नेताओं को उम्मीदवार न बनाए जाने से ज्यादा इस बात की चिंता सता रही है कि कहीं वे 'घर बैठाने वाली पीढ़ी' में तो शामिल नहीं हो गए हैं। उन्हें दिल्ली के कोटे से मध्य प्रदेश के कोटे में थोपे गए नेताजी पर उतना मलाल नहीं है... जितना मलाल पार्टी के कर्मठ, समर्पित और दिव्यांग सिपाही को उच्च सदन का टिकट मिलने से है। इस एक टिकट से पार्टी के तपे-तपाए नेताओं को अंदर ही अंदर लगने लगा है कि उनकी राजनीतिक पारी की समाप्ति की अघोषित घोषणा की तरफ दिल्ली ने कदम बढ़ा दिए हैं और अगली पीढ़ी के लिए सत्ता की भागीदारी के द्वार खोल दिए हैं। प्रदेश में अपने पुत्रों को पार्टी में स्थापित करने के मोह से व्याकुल नेताओं को भी यह डर सता रहा है कि पुत्रों को तो स्थापित कर नहीं पाए, कहीं पार्टी उन्हें खुद भी घर न बैठा दे; क्योंकि इस उम्मीदवारी के बाद अगली पीढ़ी में भारी जोश दिखने लगा है।
प्रीतम क्यों हैं संगठन को प्यारे?

सत्ता और संगठन के गलियारों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर माननीय प्रीतम सत्ता और संगठन को इतने प्यारे क्यों हैं कि उनके हर गुनाह पर पार्टी उन्हें नसीहत (बल्कि समझाइश कहना ज्यादा सटीक होगा) देकर छोड़ देती है? जबकि इसी तरह की बयानबाजी यदि संगठन का कोई अदना सा पदाधिकारी कर दे, तो कारण बताओ नोटिस (शो-कॉज नोटिस) का जवाब आने से पहले ही उसके निलंबन और निष्कासन की कार्रवाई हो जाती है। वैसे भी प्रीतम को न तो पार्टी की नसीहत समझ आ रही है और न ही समझाइश, अन्यथा वे बार-बार वही गलती नहीं दोहराते। अंदर की खबर रखने वालों (सूत्रों) की मानें तो प्रीतम ने पहले भी संगठन को कुछ नहीं समझा और अब भी कुछ नहीं समझते। अब संगठन को ही सोचना होगा कि वह अपनी भद्द पिटने से रोकने के लिए क्या उपाय करे।
आंख और कान खुले रखो साहब!

साहब वैसे तो ईमानदार और बारीक नजर रखने वाले हैं, साथ ही पूरे अमले पर उनकी निगाहें भी चौकस रहती हैं, पर इस बार वे गच्चा खा गए। उनकी नाक के नीचे उनके स्टाफ के लोग भ्रष्टाचार की मलाई चाट रहे थे और उन्हें कानों-कान खबर नहीं थी। पर, जब मामला सुर्खियां बना तो उन्हें भी एक्शन में आना पड़ा। लेकिन तब तक रायता फैल चुका था, जिसे समेटने के लिए उन्होंने निलंबन और निष्कासन भी किया और बड़े ओहदेदारों का तबादला भी। हालांकि, इतने भर से कुछ नहीं होगा; साहब को बड़े अधिकारियों के तबादले से ज्यादा उनकी मूल विभाग में वापसी करानी चाहिए थी। एक बार पूरी तरह कीचड़ साफ करना जरूरी था, क्योंकि इस भ्रष्टाचाररोधी संस्था में भ्रष्टाचार की दीमक आज नहीं लगी है, बल्कि दशकों से यहां मलाई बांटी और खाई जा रही थी। इसी कारण यहां आने के लिए पूर्ववर्ती मुखिया के समय बोलियां लगती थीं। ऐसा भी नहीं है कि दशकों से लगी इस दीमक का असर तुरंत खत्म हो जाएगा। इसके लिए साहब को अपने आंख-कान खुले रखने होंगे और अपने खुफिया तंत्र (सूत्रों) को भी सजग रखना होगा।

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हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।
जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।
हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से