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साहब का दिल विभाग में नहीं लगता

बड़े साहब भी कमाल के निकले। जिस कुर्सी पर बैठने के लिए अफसर लोग एड़ी-चोटी का जोर लगा देते हैं, वही कुर्सी इन्हें काटने दौड़ रही है। जिम्मेदारी ऐसी कि लोग उसे “सिस्टम का हार्ट” कहते हैं, लेकिन साहब का दिल उसमें धड़क ही नहीं रहा।सुना है कि उन्होंने सीधे मुखिया के दरबार में हाजिरी लगाकर फरियाद कर दी साहब, हमसे ये भारी-भरकम काम नहीं हो पाएगा, हमें तो हमारा पुराना वाला ही दे दीजिए। अब ये पुराना वाला विभाग भी कोई मामूली नहीं, बल्कि मुखिया के दिल के बेहद करीब माना जाता है। वही विभाग, जहां इन दिनों सरकार बड़े-बड़े सपनों की ईंटें जोड़ रही है और हर दिन कोई न कोई “मास्टरस्ट्रोक” निकल रहा है।
मुख्यालय भोपाल में, रिमोट मालवा से

सत्तारूढ़ दल के संगठन में इन दिनों “ वाई फाई भारत” का नया नमूना दिख रहा है। एक खास मोर्चा है, जिसका मुख्यालय तो बड़े ठाठ से भोपाल में पार्टी ऑफिस में दर्ज है, लेकिन उसके असली ‘मुख्यालय की लोकेशन गूगल मैप पर मालवा बता रहा है। मोर्चा के सारे पदाधिकारी भोपाल में तैनात हैं, पर मोर्चा मुखिया साहब की मौजूदगी मालवा में इतनी पक्की है कि फैसले भी वहीं की हवा खाकर बनते हैं। भोपाल वाला मुख्यालय तो बस नेमप्लेट और चाय-पानी तक सीमित नजर आ रहा है। सबसे दिलचस्प बात मुख्यालय में किसी को इसकी खास चिंता भी नहीं है। जैसे सबने मान लिया हो कि जब काम मालवा से ही होना है, तो भोपाल में बैठकर क्यों सिर खपाना। अब देखना ये है कि ये ‘मालवा मॉडल’ संगठन की नई परंपरा बनता है या फिर कभी भोपाल को भी याद किया जाएगा कि भाई, मुख्यालय आखिर यहीं है।
साहब का ‘नपना’ अब सिर्फ टाइम की बात!

ग्वालियर-चंबल की गलियों से उड़ती-उड़ती खबर राजधानी तक पहुंच गई है। यहां के एक बड़े बाबू के कारनामों की फाइलें इतनी मोटी हो चुकी हैं कि चौथी-पांचवीं मंजिल तक ढेर लग चुका है। शिकायतों का वजन ऐसा कि लिफ्ट भी सोच में पड़ जाए! बाबू साहब के कामकाज के किस्सों से अंदरखाने मान लिया गया है कि “नपना” तो तय है। बस इंतज़ार है उस दिन का, जब टेप निकलकर माप लिया जाएगा और उन्हें छोटा करके भोपाल की राह दिखाई जाएगी। हालांकि, इसमें दीवार एक बड़े नेता बन सकते हैं। ये बड़े बाबू एक बड़े नेताजी के खास बताए जाते हैं। अब यह दीवार उनका ‘सेफ्टी नेट’ बनेगी या फिर यही मामला और हाई-प्रोफाइल बनाकर तेज कार्रवाई करवा देगा। इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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कभी बागी और बंदूकों के लिए कुख्यात चंबल का बीहड़ आज एक नए और अधिक खूंखार 'रेत माफिया' की गिरफ्त में है। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य की कोख उजाड़कर फल-फूल रहा यह अवैध धंधा अब महज चोरी नहीं, बल्कि एक संगठित खूनी खेल बन चुका है।
साक्षात्कार ... राजनीति अक्सर उन रास्तों से होकर गुजरती है जिसकी कल्पना व्यक्ति ने स्वयं नहीं की होती। कुछ ऐसा ही सफर पृथ्वीपुर विधायक नितेंद्र सिंह राठौर का रहा।
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बुंदेलखंड के एक छोटे से गांव से लेकर दिल्ली और फिर मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत मध्यप्रदेश विधानसभा में 10 वर्ष तक प्रमुख सचिव रहे अवधेश प्रताप सिंह की जीवन यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है।
मध्यप्रदेश में 2023 में 230 निर्वाचित विधायकों में से 90 के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं। इसमें 34 विधायक गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं, जो 230 सदस्यीय सदन का लगभग 39 प्रतिशत है
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र का विवाद राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में गरमाया हुआ है, जिसमें कई वर्तमान-पूर्व सांसद, विधायक और आईएएस-आईपीएस अफसर कानूनी शिकंजे में फंसे नजर आ रहे हैं।
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ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति में अपनी गहरी पैठ रखने वाले रामनिवास रावत ने हाल ही में कांग्रेस का दशकों पुराना साथ छोड़ भाजपा का दामन थामकर सियासी गलियारों में हलचल मचा दी थी।
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