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जल गंगा और मंत्रियों की साख

प्रदेश में जल गंगा संवर्धन अभियान अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। एक महीने बाद तस्वीर साफ होगी कि पानी बचाने की इस मुहिम का असली सिकंदर कौन सा जिला बना। लाखों काम पूरे हो चुके हैं, लेकिन सरकारी गलियारों में चर्चा तालाबों और कुओं से ज्यादा रैंकिंग की है। पिछली बार कुछ कद्दावर मंत्रियों के जिले ऐसी फिसलन खा गए थे कि उनकी साख पर भी छींटे पड़े थे। अबकी बार खबर है कि बड़े-बड़े नेता खुद समीक्षा बैठक लेकर मैदान में उतर गए हैं। अफसर भी समझ गए हैं कि इस बार मामला सिर्फ जल संरक्षण का नहीं, बल्कि "प्रतिष्ठा संरक्षण" का भी है।
ऐसा नेता होना आसान नहीं है...

प्रदेश की राजनीति में कुछ नेता पद से नहीं, अपने कद से पहचाने जाते हैं। उनके दरवाज़े पर पहुंचना शिष्टाचार नहीं, राजनीतिक संस्कार माना जाता है। लेकिन लगता है सत्ताधारी संगठन के नए मुखिया इस पाठ को पढ़ने से चूक गए। ताजपोशी के बाद वे कई चौखट गए और एक चौखट पर जाना भूल गए, चौखट भी ऐसी जिस पर माथा टेकना कभी सत्ता और संगठन दोनों की परंपरा का हिस्सा हुआ करता था। पुराने संगठन प्रमुख हों या सत्ता के मुखिया, सब जानते थे कि राजनीति में कुछ दरवाज़े वोट से नहीं, विनम्रता से खुलते हैं। कहते हैं कि अमृत महोत्सव पार कर चुके नेताजी ने इस उपेक्षा को दिल से ज्यादा दिमाग में रखा। फिर उनके एक खास सिपाहसालार को ऐसी घुड़की दी कि सिपाह सालार दंग रह गए और तुरंत ही मुखिया महोदय को मानने की नाराजगी का बर्बटम ब्योरा दे दिया। मुखिया भी समझ गए कि गलती तो हो गई है और प्रायश्चित करने के लिए उनसे मिलने पहुंच गए। तब जाकर बर्फ पिघली और वरिष्ठ नेताजी की नाराजगी नम्र हुई।
जब एस-क्यूब ने चौंकाया..

मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हाल ही में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। इस कार्यक्रम में उनके स्कूल की एक सहपाठी, जो एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान की पदाधिकारी भी हैं, बतौर वक्ता मौजूद थीं, जब उनकी पुरानी सहपाठी ने माइक संभाला तो संबोधन के दौरान उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि आज यहां एस-क्यूब भी मौजूद हैं। बस फिर क्या था। हॉल में बैठे लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। कुछ लोग तो मंच पर ही ‘एस-क्यूब’ नाम के महाशय को तलाशने लगे।उधर अधिकारी महोदय के चेहरे पर भी हल्की असहज मुस्कान तैर गई। आखिर वर्षों पुराना राज जो सार्वजनिक होने वाला था। थोड़ी देर बाद सहपाठी ने खुद ही रहस्य से पर्दा उठा दिया। बताया कि स्कूल के दिनों में उनके नाम में तीन बार ‘एस’ आने के कारण दोस्तों ने उनका नाम एस-क्यूबञ(S³) रख दिया था। और वही नाम आज भी पुराने दोस्तों के बीच ज़िंदा है। कार्यक्रम खत्म होने के बाद चर्चा भाषणों की कम और "एस-क्यूब साहब" की ज्यादा होती रही। आखिर प्रशासनिक गलियारों के सख्त चेहरे के पीछे छिपा स्कूल का वह दोस्त उस दिन सबके सामने जो आ गया था।

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हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से
जिस समाज में भगवान के घर में चोरी करने वाला हाथ नहीं कांपता, वहां चिंता चोरी की राशि से अधिक उस संस्कार की होनी चाहिए, जिसकी मृत्यु चुपचाप हमारे सामने हो रही है।
जी हाँ, मेरी प्राथमिकता है कि योग बच्चों के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बने। मुझे खुशी है कि एनसीईआरटी ने इसे स्वीकार किया है।
हर रविवार साप्ताहिक कॉलम। सुुशील शर्मा की कलम से