हर साल 15 जून को जब विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस आता है, तो यह सिर्फ एक तारीख नहीं होती, बल्कि यह हमारे अंतर्मन को झकझोरने वाला एक आईना होता है।

जीवन के संध्या काल में... बागवान जब अपना पूरा जीवन अपने परिवार और बच्चों के लिए समर्पित करता है, तब उसका सहारा बनने वाले उससे मुंह मोड़ लेते हैं। हर साल 15 जून को जब विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस आता है, तो यह सिर्फ एक तारीख नहीं होती, बल्कि यह हमारे अंतर्मन को झकझोरने वाला एक आईना होता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे समाज में, जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, जिन आँखों ने हमें सपने देखना सिखाया, और जिन दिलों ने हमें निस्वार्थ प्रेम दिया, वे ही हाथ, आँखें और दिल आज अक्सर दुर्व्यवहार और उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। यह एक ऐसा दर्दनाक सच है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन जिसे अब और नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 2011 में इस दिवस को मनाने की घोषणा करके एक चुप्पी को तोड़ने का प्रयास किया था। इंटरनेशनल नेटवर्क फॉर द प्रिवेंशन ऑफ एल्डर एब्यूज (INPEA) की यह पहल हमें बताती है कि बुजुर्गों के साथ होने वाला दुर्व्यवहार कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर वैश्विक समस्या है।
जागरूकता बढ़ाना: क्या हम सचमुच जानते हैं कि हमारे आस-पास के बुजुर्ग किस तरह के शारीरिक, भावनात्मक, वित्तीय या यौन दुर्व्यवहार का सामना कर रहे हैं? क्या हम उनकी उपेक्षा को पहचान पा रहे हैं? यह दिवस हमें इन सवालों से रूबरू कराता है।
रोकथाम को बढ़ावा देना: हमें यह सोचना होगा कि कैसे हम एक ऐसा समाज बनाएं जहाँ बुजुर्ग सुरक्षित महसूस करें। सरकारों, संगठनों और हम सभी की यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम ऐसी रणनीतियाँ विकसित करें जो इस दुर्व्यवहार को जड़ से खत्म कर सकें।
अधिकारों की रक्षा: हमारे बुजुर्गों को भी गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने का पूरा अधिकार है। उनका हर आंसू, उनकी हर खामोशी हमें उनके अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने की प्रेरणा देनी चाहिए।
सहायता प्रदान करना: जो बुजुर्ग इस दर्द से गुजर रहे हैं, उन्हें सहारे की सख्त ज़रूरत है। हमें उनके लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बनानी होगी, जहाँ वे बिना किसी डर के अपनी बात कह सकें और मदद पा सकें।
बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार कई रूपों में सामने आता है, और हर रूप उनके मन और आत्मा पर एक गहरा घाव छोड़ जाता है:
शारीरिक दुर्व्यवहार: जब वे हाथ, जिन्होंने हमें चलना सिखाया, आज मार और धक्के झेल रहे हों, तो यह सिर्फ शारीरिक दर्द नहीं, बल्कि आत्मा पर चोट है।
भावनात्मक या मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार: धमकाना, अपमानित करना या अकेला छोड़ देना—यह सब धीरे-धीरे उनकी जीने की इच्छा को खत्म कर देता है। कल्पना कीजिए, जिनके पास यादों का खजाना है, उन्हें अकेलापन कितना सताता होगा।
वित्तीय दुर्व्यवहार: जब उनकी जीवन भर की कमाई को धोखे से छीन लिया जाता है, तो यह सिर्फ पैसों का नुकसान नहीं, बल्कि उनके भरोसे और सुरक्षा का हनन है।
उपेक्षा: उन्हें भोजन, पानी या दवा न देना, यह सिर्फ आवश्यकताओं की कमी नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व से इनकार है। यह ऐसा है जैसे कोई उन्हें धीरे-धीरे मिटा रहा हो।
यौन दुर्व्यवहार: यह शायद सबसे वीभत्स रूप है, जो उनके शरीर और आत्मा दोनों को तार-तार कर देता है।
भारत में, जहाँ बुजुर्गों को कभी सम्मान और ज्ञान का प्रतीक माना जाता था, आज स्थिति बदल रही है। संयुक्त परिवारों के टूटने और बदलती सामाजिक संरचना ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है। कई बुजुर्ग अपने ही घरों में, अपनों के बीच उपेक्षा और दुर्व्यवहार का सामना कर रहे हैं। इस दिवस के माध्यम से हमें इस सामाजिक संकट को पहचानना होगा और अपने बुजुर्गों को वह सम्मान और सुरक्षा देनी होगी जिसके वे हकदार हैं।
विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस हमें सिर्फ आंकड़ों या समस्याओं के बारे में नहीं बताता, यह हमें एक संकल्प लेने का अवसर देता है। हमारे बुजुर्ग हमारे समाज का अमूल्य हिस्सा हैं; उनके अनुभव, उनका ज्ञान, और उनका असीम प्रेम हमारे लिए एक विरासत है।
हम सब मिलकर यह प्रण लें कि...
हम एक ऐसा समाज बनाएंगे जहाँ हर बुजुर्ग व्यक्ति सम्मान, सुरक्षा और गरिमा के साथ जी सके।
यह हमारे लिए अपनी जड़ों को मजबूत करने और भविष्य की पीढ़ी के लिए एक बेहतर उदाहरण स्थापित करने का समय है। आइए, मिलकर एक ऐसी दुनिया बनाएं जहाँ कोई भी बुजुर्ग अकेला या असुरक्षित महसूस न करे।

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