
भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल अतीत की धरोहर नहीं है; वह वर्तमान की पहचान और भविष्य की नींव भी है। इसी अवधारणा पर आधारित इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) की स्थापना हुई, जिसका मुख्य उद्देश्य देश की जीवित, निर्मित और प्राकृतिक विरासत का संरक्षण करते हुए नागरिकों में उसके प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता विकसित करना है। इंटैक केवल “संरक्षण” तक सीमित न होकर नागरिक समाज में जागरूकता, सहभागिता और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभाता है।
मध्यप्रदेश जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में इंटैक की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। सांची से खजुराहो, मांडू से ओरछा तक अनगिनत विरासत स्थल न केवल देश की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं, बल्कि पर्यटन, शोध और स्थानीय आर्थिक विकास दोनों के लिए आधार बन सकते हैं। राज्य में लगभग बीस सक्रिय चैप्टर्स भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, खजुराहो, चंदेरी, मांडला, विदिशा आदि—अपने‑अपने स्थानीय स्तर पर विरासत संरक्षण के कार्यों को ले चलने के लिए गठित हैं, जिनका नेतृत्व एक कन्वीनर और सह‑कन्वीनर करते हैं।
इंटैक के मुख्य उद्देश्यों में भारत की बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनता को जागरूक करना, ऐतिहासिक और स्थापत्य महत्व के स्थलों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, संरक्षण हेतु नीतिगत सुझाव विकसित करना, प्रशिक्षण कार्यक्रमों द्वारा क्षमता निर्माण और संकट की स्थिति में विरासत की रक्षा के लिए त्वरित हस्तक्षेप जैसे कार्य शामिल हैं। इन उद्देश्यों के आधार पर यह तर्कसंगत है कि प्रत्येक चैप्टर्स अपने क्षेत्र में एक सक्रिय, जागरूक और उत्तरदायी संस्था के रूप में कार्य करे, न कि औपचारिक बैठकों और रिपोर्टों तक सीमित रहे।
किन्तु वर्तमान स्थिति का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि मध्यप्रदेश के अधिकांश चैप्टर्स अपनी पूरी क्षमता का दोहन नहीं कर पा रहे। गतिविधियाँ सीमित, असंगठित या अनियमित हैं; नियमित बैठकें, व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, जनजागरूकता अभियान, स्कूल–कॉलेजों में कार्यक्रम तथा स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय—इन क्षेत्रों में अपेक्षित गतिविधि अभी भी स्पष्ट दिखाई नहीं देती। विरासत संरक्षण का पहला और आधारभूत चरण ‘दस्तावेजीकरण’ माना जाता है, मगर अनेक जिलों में अभी भी अनगिनत ऐतिहासिक भवन, पुरातात्विक स्थल और सांस्कृतिक परंपराएँ बिना सूचीबद्ध हुए उपेक्षा का शिकार बनी हैं।
मध्यप्रदेश में नगरीय विकास, पर्यटन और औद्योगिक विस्तार के साथ विरासत संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है; यदि चैप्टर्स सक्रिय रूप से नगर निगमों, पंचायतों और प्रशासन के साथ समन्वय करें, तो ऐतिहासिक स्थलों को उन्हें स्थानीय आर्थिक व सांस्कृतिक विकास के मॉडल के रूप में भी विकसित किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में आवश्यकता यह है कि मध्यप्रदेश के सभी इंटैक चैप्टर्स अपनी भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करें और एक नई ऊर्जा के साथ कार्य प्रारंभ करें। इसके लिए सदस्यता विस्तार, युवाओं की सक्रिय भागीदारी, शैक्षणिक संस्थानों के साथ जुड़ाव, डिजिटल दस्तावेजीकरण तथा जनभागीदारी आधारित कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इस दृष्टि से भावी कार्ययोजना का सर्वोच्च उद्देश्य यह होना चाहिए कि प्रत्येक इंटैक अध्याय स्थानीय स्तर पर विरासत‑संरक्षण का एक स्वाभाविक और जीवंत केंद्र बन जाए। चैप्टर्स नियमित गतिविधियों को संस्थागत ढाँचे में बाँधें, दस्तावेजीकरण को वैज्ञानिक अभियान और जनजागरूकता को लगातार चलने वाली शिक्षा के रूप में ढालें। विशेष रूप से युवा छात्र, शिक्षक, शोधार्थी और स्थानीय स्वयंसेवकों को इस यात्रा का सक्रिय अंग बनाकर विरासत को “केवल देखने की चीज़” से “रचना और रक्षा का विषय” बनाना होगा।
चैप्टर्स को नगर निगमों, पंचायतों, शिक्षा विभागों और पर्यटन प्राधिकरणों के साथ नियमित समितियों, राउंडटेबल बैठकों और योजनाबद्ध वार्ताओं के माध्यम से जुड़ना चाहिए, ताकि विकास योजनाएँ विरासत को नष्ट करने की बजाय उसे आधार और आकर्षण बनाती दिखाई दें। डिजिटल मानचित्रण, निजी तस्वीरों के भंडार, ऑडियो‑वीडियो दस्तावेज़ और इंटरैक्टिव वर्चुअल वॉक्स जैसे उपकरणों का उपयो ही दिखाई दें। डिजिटल मानचित्रण, निजी तस्वीरों के भंडार, ऑडियो‑वीडियो दस्तावेज़ और इंटरैक्टिव वर्चुअल वॉक्स जैसे उपकरणों का उपयोग भी इस दिशा में नए आयाम खोल सकते हैं। ये तकनीकी साधन न केवल विरासत को अधिक जागरूक और डिजिटल रूप से सुरक्षित बनाएँगे, बल्कि स्कूली बच्चों से लेकर शोधार्थियों और पर्यटकों तक विस्तृत वर्ग को इससे जोड़ने का माध्यम भी बनेंगे।
अंततः यह स्पष्ट है कि इंटैक के लिए मध्यप्रदेश एक व्यापक मंच नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रयोगशाला है, जहाँ विरासत की रक्षा, नागरिक जागरूकता और स्थानीय विकास का बार‑बार परीक्षण हो रहा है। जब तक इन चैप्टर्स की भूमिका अस्पष्ट या अनियमित रहेगी, विरासत भी अधूरी और अस्थिर रहेगी। इसलिए अब आवश्यकता यह है कि सभी चैप्टर्स अपनी गतिविधियों की पारदर्शिता बनाए रखें, स्थानीय प्रशासन के साथ खुले वार्तालाप को बढ़ावा दें और हर संभव मौके पर समुदाय को विरासत के प्रति प्रेरित करें; केवल तभी इंटैक का राष्ट्रीय मिशन और मध्यप्रदेश की विरासत, दोनों साथ‑साथ गति और गौरव ले पाएँगे।
विरासत संरक्षण मात्र एक संस्था या सरकार का कार्य नहीं है; यह नागरिकों के प्रत्येक व्यक्ति की सामूहिक जिम्मेदारी है। जहाँ इतिहास हर कदम पर जीवित है, जैसे अष्टभुजा माता से लेकर खजुराहो की मंदिर‑कला तक, मांडू के दुर्गों से ओरछा के महलों तक—वहाँ यह दायित्व और भी गंभीर, अर्थपूर्ण और प्रेरणादायक हो उठता है। अगर इंटैक अपने मिशन के प्रति स्पष्ट रहें, संगठनात्मक दायरे को विस्तृत करें और नागरिकों को भागीदार बनाएँ, तो न केवल विरासत सुरक्षित रहेगी, बल्कि वह राज्य की सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक अवसर और सामाजिक एकता का एक जीवंत स्रोत भी बन उठेगी। ऐसी परिस्थिति में इंटैक की प्रत्येक स्थानीय इकाई न केवल एक औपचारिक संरचना, बल्कि एक जीवंत जनआंदोलन के रूप में उभर सकेगी, जो मध्यप्रदेश की विरासत को भविष्य की पीढ़ियों तक सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से पहुँचाएगी। इंटैक की सफलता मध्यप्रदेश में उसके चैप्टर्स की जीवंत और जागरूक भूमिका पर निर्भर है। विरासत सिर्फ़ इतिहास की बात नहीं, बल्कि वर्तमान की जागरूकता और भविष्य की जिम्मेदारी है। जब तक हर चैप्टर्स लोकल स्तर पर पारदर्शी ढंग से काम करेगा, नियमित दस्तावेजीकरण और जनजागरूकता को प्राथमिकता देगा और स्थानीय प्रशासन व समुदाय के साथ खुली वार्ताएँ बनाए रखेगा, तब तक ही विरासत सच में सुरक्षित और सम्मानजनक ढंग से आगे बढ़ सकेगी।
इसलिए आवश्यक है कि मध्यप्रदेश के सभी इंटैक चैप्टर्स एक सामूहिक विश्वास के साथ इस बात को ग्रहण करें कि विरासत संरक्षण कोई अलग‑थलग गतिविधि नहीं, बल्कि हमारी रोज़मर्रा की जिम्मेदारी है। निर्मित, जीवित और प्राकृतिक विरासत को जब समाज अपनी सांस्कृतिक संपत्ति के रूप में स्वीकार करेगा, तो इंटैक का राष्ट्रीय मिशन अपने वास्तविक रूप में साकार होगा और मध्यप्रदेश की विरासत न केवल सुरक्षित रहेगी, बल्कि एक गौरवशाली, गतिशील और जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचेगी।
- लेखक पूर्व कुलपति, भोपाल हैं।
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