23 मार्च "विश्व मौसम विज्ञान दिवस" पर विशेष आलेख। विस्तार से जानें कैसे मानवीय स्वार्थ प्रकृति का विनाश कर रहे हैं और बदलता मौसम क्यों पूरी जीवसृष्टि के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।

विश्व मौसम विज्ञान दिवस (23 मार्च)
हर साल 23 मार्च को 'विश्व मौसम विज्ञान दिवस' (World Meteorological Day) मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जिस वायुमंडल और मौसम के चक्र ने पृथ्वी पर जीवन को फलने-फूलने का अवसर दिया, आज वही चक्र मानवीय स्वार्थों के कारण छिन्न-भिन्न हो रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने यह भुला दिया कि हम प्रकृति के स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक छोटा सा हिस्सा हैं। आज जब हम 'बदलते मौसम' की बात करते हैं, तो यह केवल तापमान में वृद्धि का मामला नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण जीवसृष्टि के विनाश की प्रस्तावना है।
सामान्यतः लोग मौसम और जलवायु को एक ही समझ लेते हैं। मौसम वायुमंडल की अल्पकालिक अवस्था है, जबकि जलवायु एक लंबे समय (लगभग 30-35 वर्ष) का औसत पैटर्न है। आज समस्या यह है कि जलवायु ही बदल रही है। पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से लगातार बढ़ रहा है। यदि यह वृद्धि $1.5^\circ C$ से $2^\circ C$ की सीमा को पार कर जाती है, तो होने वाले नुकसान की भरपाई असंभव होगी।
बदलते मौसम का सबसे भयावह रूप ध्रुवीय क्षेत्रों में दिख रहा है। आर्कटिक और अंटार्कटिक की बर्फ जिस गति से पिघल रही है, उससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। दुनिया के कई प्रमुख शहर जैसे मुंबई, न्यूयॉर्क, और जकार्ता के डूबने का खतरा पैदा हो गया है। जब मीठे पानी के स्रोत (ग्लेशियर) खत्म हो जाएंगे, तो नदियाँ सूखने लगेंगी और जल संकट केवल प्यास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह विश्व युद्धों का कारण बनेगा।
मनुष्य के पास तो तकनीक है कि वह एयर कंडीशनर लगाकर गर्मी से बच जाए, लेकिन उन मूक पशु-पक्षियों का क्या जो अपनी प्राकृतिक लय खो चुके हैं? बदलते मौसम के कारण फूलों के खिलने का समय बदल गया है, जिससे मधुमक्खियों और तितलियों का जीवन चक्र प्रभावित हो रहा है। कई प्रजातियाँ पलायन करने को मजबूर हैं, लेकिन उनके रहने लायक स्थान (Habitat) कम होते जा रहे हैं। यदि पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem) की एक भी कड़ी टूटती है, तो इसका असर अंततः मानव खाद्य श्रृंखला पर पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि बिन मौसम बरसात, भीषण सूखा, विनाशकारी चक्रवात और जंगलों की आग (Wildfires) सामान्य घटनाएँ बन गई हैं। 'अल-नीनो' और 'ला-नीना' जैसे समुद्री प्रभाव अब अधिक आक्रामक हो चुके हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति और भी खतरनाक है, क्योंकि यहाँ की अर्थव्यवस्था मानसून पर टिकी है। जब मानसून अनिश्चित होता है, तो किसान कर्ज के जाल में फँसता है और खाद्य सुरक्षा को खतरा पैदा होता है।
बदलते मौसम का सीधा संबंध वायु और जल प्रदूषण से भी है। बढ़ता तापमान हवा में ओजोन और अन्य प्रदूषकों की सांद्रता को बढ़ा देता है, जिससे श्वसन संबंधी बीमारियाँ महामारी का रूप ले लेती हैं। 'क्लाइमेट एंग्जायटी' (Climate Anxiety) जैसी मानसिक समस्याएँ युवाओं में बढ़ रही हैं। भीषण गर्मी (Heat Waves) अब हर साल हजारों लोगों की जान ले रही है, विशेषकर उन लोगों की जो खुले आसमान के नीचे काम करने को मजबूर हैं।
आज हम 6th जेनरेशन फाइटर जेट्स और AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या हमारे पास ऐसी कोई तकनीक है जो एक वयस्क पेड़ की तरह ऑक्सीजन पैदा कर सके या कार्बन को सोख सके? विज्ञान ने प्रगति की है, लेकिन प्रकृति के बिना वह प्रगति खोखली है। 'नॉन-कॉन्टैक्ट वारफेयर' की तैयारी तो ठीक है, लेकिन मानवता को इस समय 'नेचर के साथ कॉन्टैक्ट' की ज्यादा जरूरत है।
विश्व मौसम विज्ञान दिवस केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन करने होंगे:
नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy): कोयले और पेट्रोल पर निर्भरता कम कर सौर और पवन ऊर्जा को अपनाना।
सतत जीवनशैली (Sustainable Living): प्लास्टिक का त्याग और न्यूनतम कचरा पैदा करना।
वृक्षारोपण: केवल पेड़ लगाना काफी नहीं, उनका पोषण भी जरूरी है।
नीतिगत बदलाव: सरकारों को 'इकोनॉमी' से ऊपर 'इकोलॉजी' को रखना होगा।
प्रकृति विनाशकारी नहीं है, वह केवल अपनी प्रतिक्रिया देती है। यदि हम उसे जख्म देंगे, तो वह भी विनाश के रूप में पलटवार करेगी। बदलते मौसम की यह चेतावनी हमारे लिए अंतिम अवसर है। 23 मार्च का यह दिन हमें संकल्प लेने के लिए प्रेरित करता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को एक जलती हुई धरती नहीं, बल्कि एक हरा-भरा और सुरक्षित संसार सौंपकर जाएंगे।
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