विश्व दुग्ध दिवस 2025 पर जानें मध्यप्रदेश में दूध उत्पादन की अपार संभावनाएं और पशुधन स्वास्थ्य, उचित मूल्य व निर्यात से जुड़ी चुनौतियां। कैसे बन सकता है MP श्वेत क्रांति का अग्रणी राज्य?

साल 2001 से दुनिया ने दुग्ध के महत्व और डेयरी उद्योग पर चर्चा की शुरूआत की थी. एक जून को 'विश्व दुग्ध दिवस' घोषित कर दूध उत्पादन की चुनौतियों एवं संभावनाओं पर मंथन की शुरूआत भी हुई थी। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, इसलिए उसे सबसे ज्यादा गंभीर और तैयार रहने की जरूरत है। मध्यप्रदेश देश में सबसे अधिक दूग्ध उत्पादक प्रदेशों में से एक है।
बात मध्यप्रदेश में दुग्ध उत्पादन की संभावनाओं को बढ़ाने और चुनौतियां की करेंगे। प्रदेश में बड़ी संख्या में पशुधन है। यहां उपजाऊ भूमि और अनुकूल जलवायु परिस्थितियां दूध उत्पादन के लिए एक मजबूत आधार है। प्रदेश के गांवों में पशुपालन एक प्रमुख आय का साधन है, जिससे लाखों परिवारों की रोजी रोटी जुड़ी हुई है। राज्य में सहकारी डेयरी फेडरेशन और निजी डेयरियां, दोनों ही दूध संग्रह और विक्रय से जुड़े हैं। बड़ी संख्या में ऐसे छोटे और सीमांत किसान हैं जो पशुपालन से जुड़े हैं। वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों, उन्नत नस्लों के पशुओं के उपयोग और बेहतर पोषण प्रबंधन से दूध उत्पादन में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। दूध से पनीर, दही, घी, छाछ, मिठाइयां और दूध पाउडर जैसे उत्पादों से अच्छी आय हासिल की जा सकती है। किसानों को उनके दूध का बेहतर मूल्य मिल सकता है और डेयरी उद्योग और बढ़ा हो सकता है। डेयरी क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की क्षमता है, चाहे वह पशुपालन, दूध संग्रह, प्रसंस्करण, परिवहन या विपणन में हो। ग्रामीण युवाओं और महिलाओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण आय का स्रोत बन सकता है।
पशुधन के स्वास्थ्य की चुनौतियां
पशुओं में होने वाली बीमारियां जैसे खुरपका-मुंहपका रोग दूध उत्पादन को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं। बेहतर पशु चिकित्सा सेवाएं और टीकाकरण अभियान में कमी है। पशुओं के लिए पर्याप्त और पौष्टिक चारे की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है, खासकर शुष्क मौसम में। चारे की गुणवत्ता और मात्रा सीधे दूध उत्पादन को प्रभावित करती है।
किसानों को नहीं मिलता उचित मूल्य
छोटे किसानों को अक्सर अपने दूध का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है। संगठित दूध संग्रह प्रणाली और किसानों के लिए बेहतर मूल्य निर्धारण तंत्र की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में दूध संग्रह केंद्र, शीतलन इकाइयां और परिवहन सुविधाओं की कमी दूध की बर्बादी का कारण बनती है। किसानों में आधुनिक पशुपालन तकनीकों, स्वच्छता मानकों और डेयरी प्रबंधन के बारे में जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी है।
निर्यात कसौटी पर प्रयासों में कमी
निर्यात की कसौटी पर प्रयासों में कमी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने की जरूरत है। दूध की गुणवत्ता जांच, शीत श्रृंखला प्रबंधन और डेयरी फार्मों के स्वचालन में नई तकनीकों का उपयोग कर दक्षता बढ़ाई जानी चाहिए। ऐसा होता है तो निर्यात बढ़ेगा। राज्य को अतिरिक्त राजस्व भी मिलेगा।
श्वेत क्रांति में संकल्प दिन
विश्व दुग्ध दिवस डेयरी क्षेत्र की क्षमता को पहचान ने और इसे देश की 'श्वेत क्रांति' में एक अग्रणी राज्य बनाने के लिए प्रयास पर फोकस करने के संकल्प का दिन है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि राज्य की समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
क्या करें राज्य सरकार
प्रदेश सरकार को दूध उत्पादन की संभावनाओं को भुनाने और चुनौतियों का सामना करने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। इसमें पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूत करना, चारे की उपलब्धता बढ़ाना, डेयरी सहकारी समितियों को सशक्त करना, प्रसंस्करण इकाइयों में निवेश को बढ़ावा देना और किसानों को आधुनिक तकनीकों का प्रशिक्षण देना शामिल है।

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