गोरसरी पहाड़ में डेरा जमाए नर हाथी ई-5 को सुरक्षित पकड़ने वन विभाग का रेस्क्यू अभियान जारी है। मैहर के मां शारदा मंदिर की त्रिकूट पहाड़ी पर तेंदुए की आवाजाही सीढ़ियों तक पहुंच गई।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
गोरसरी पहाड़ में डेरा जमाए बांधवगढ़ से आए नर हाथी ई-5 (सी-4) को सुरक्षित पकड़ने के लिए वन विभाग ने पूरी ताकत झोंक दी है। बुधवार रात चलाए गए बड़े रेस्क्यू अभियान में बांधवगढ़ से छह प्रशिक्षित कुमकी हाथी बुलाए गए। इनमें मादा हाथी चित्रा भी शामिल थी। रणनीति के तहत ई-5 को चित्रा की ओर आकर्षित किया गया और वह उसके करीब भी पहुंचा, लेकिन अगले ही पल दिशा बदलकर घने जंगल में गायब हो गया। इसके बाद उसे गन्ने का रस और चावल देकर रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन हाथी ने इनकी ओर भी ध्यान नहीं दिया। ट्रैंक्विलाइजर गन से निशाना साधने का प्रयास हुआ, मगर ई-5 उसे भी चकमा देकर जंगल की ओर निकल गया।रेस्क्यू अभियान में 150 से अधिक वनकर्मी दिन-रात जुटे हुए हैं। मैहर वन मंडल के साथ अमरपाटन, मुकुंदपुर और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की टीमें भी अभियान में लगी हैं। डीएफओ विद्या भूषण मिश्रा, बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक अनुपम सहाय, उपसंचालक युहान कटारा, मैहर एसडीओ सिद्धार्थ दीपांकर और रेंजर प्रफुल्ल त्रिपाठी की निगरानी में कार्रवाई की जा रही है। हाथी के मुख्य मार्गों की ओर आने की आशंका को देखते हुए गोरसरी, रामनगर और अमरपाटन मार्ग पर भी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी।
बारिश और पहाड़ी भूभाग बन रहे सबसे बड़ी चुनौती
वन विभाग के अनुसार ई-5 का गहन अनुश्रवण और सुरक्षा विपरीत परिस्थितियों के बावजूद लगातार किया जा रहा है। भू-भाग की कठिन बनावट और प्रतिकूल मौसम रेस्क्यू अभियान में सबसे बड़ी बाधा बने हुए हैं। गोरसरी पहाड़ में वन विभाग की टीम लगातार डेरा डाले हुए है और हाथी की गतिविधियों पर नजर रख रही है।
बारिश और अंधेरा बढ़ने पर अभियान को रोकना भी पड़ा, क्योंकि ऐसे हालात में हाथी को नियंत्रित करना जोखिमपूर्ण हो जाता है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि 7 और 8 सितंबर की दरम्यानी रात हुई दुर्घटना में एक जनहानि के अलावा हाथी के कारण अन्य कोई जनहानि नहीं हुई है। हालांकि ई-5 द्वारा फसलों को नुकसान पहुंचाने और कच्चे मकानों को क्षतिग्रस्त करने की घटनाएं हुई हैं। फसल और मकान क्षति की भरपाई के लिए राजस्व पुस्तक परिपत्र के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा रही है। विभाग के अनुसार प्रक्रिया पूरी होने के बाद शासन द्वारा पात्र प्रभावितों को क्षतिपूर्ति उपलब्ध कराई जाएगी।
जंगल में जाने और बिजली तार फैलाने पर रोक
वन मंडलाधिकारी ने ग्रामीणों से अपील की है कि रेस्क्यू अभियान पूरा होने तक जंगल में न जाएं और हाथी से सुरक्षित दूरी बनाए रखें। खेतों में हाथी को रोकने के लिए बिजली के तार न फैलाएं, क्योंकि इससे हाथी के साथ-साथ मानव जीवन के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। ग्रामीणों से गोरसरी घाटी में अनावश्यक आवाजाही नहीं करने को भी कहा गया है। ई-5 को सुरक्षित पकड़ने का अभियान करीब एक सप्ताह से पूरी क्षमता के साथ चल रहा है। वन विभाग का कहना है कि वन्यजीव रेस्क्यू संबंधी निर्धारित दिशा-निदेर्शों का पालन करते हुए हाथी को सुरक्षित पकड़कर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व भेजने का प्रयास जारी है। फिलहाल गोरसरी पहाड़ में उसकी मौजूदगी, लगातार बदलती दिशा और कठिन भू-भाग ने वन अमले की चुनौती बढ़ा दी है। बुधवार रात का घटनाक्रम यह जरूर बता गया कि ई-5 को पकड़ना केवल घेराबंदी का नहीं, बल्कि धैर्य और रणनीति की परीक्षा भी है।
सीढ़ियों तक पहुंचा तेंदुआ, नवरात्रि से पहले श्रद्धालुओं की सुरक्षा पर सवाल

मां शारदा देवी मंदिर की त्रिकूट पहाड़ी पर तेंदुए की बढ़ती आवाजाही अब मंदिर मार्ग तक पहुंच गई है। बीती रात कुत्ते का पीछा करते हुए एक तेंदुआ सीढ़ियों के पास पहुंच गया। उस समय श्रद्धालुओं का आवागमन जारी था। गनीमत रही कि सीढ़ियों के किनारे लगी सुरक्षा जाली तेंदुए और श्रद्धालुओं के बीच अवरोध बनी रही, जिससे कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। तेंदुए को सीढ़ी मार्ग के नजदीक देखकर वहां मौजूद लोगों में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। कुछ देर बाद वह पहाड़ी की ओर लौट गया। स्थानीय लोगों के मुताबिक त्रिकूट पहाड़ी क्षेत्र में एक मादा तेंदुआ पिछले छह महीने से अधिक समय से दो शावकों के साथ सक्रिय है। सीढ़ी मार्ग के अलावा सड़क और रोपवे के आसपास भी उसकी मौजूदगी सामने आती रही है। तेंदुए के कई वीडियो भी इंटरनेट माध्यमों पर प्रसारित हो चुके हैं। अब नवरात्रि सामने है और मां शारदा मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ने की संभावना है। ऐसे में जिस मार्ग से हजारों श्रद्धालु पैदल मंदिर पहुंचते हैं, वहां तेंदुए का पहुंचना वन विभाग और मंदिर प्रबंधन के लिए सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर चुनौती बन गया है। श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने से पहले तेंदुए की निगरानी और मानव-वन्यजीव टकराव रोकने के इंतजामों पर सवाल उठने लगे हैं।


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