जनार्दनपुर में प्रस्तावित खनन लीज को लेकर किसानों का विरोध तेज, आश्रम भूमि, मवेशियों की मौत, मुआवजा नीति और सुरक्षा मानकों पर गंभीर सवाल।

हाइलाइट्स:
सतना, स्टार समाचार वेब
रामपुर बघेलान विकासखंड की जनार्दनपुर ग्राम पंचायत में मेसर्स डालमिया भारत सीमेंट लिमिटेड को प्रस्तावित माइनिंग लीज की प्रक्रिया अब बड़े विवाद का रूप लेती जा रही है। सोमवार को कंपनी प्रबंधन की ओर से उत्खनन के लिए पहुंची भारी मशीनों का ग्रामीणों ने तीखा विरोध किया, जिसके बाद कर्मचारियों को बैरंग लौटना पड़ा। हालांकि, मशीनें वापस चली गर्इं, लेकिन खेतों और आसपास की जमीन पर खोदे गए गहरे गड्ढे खुले खतरे की तरह छोड़ दिए गए। ग्रामीणों के अनुसार कई स्थानों पर कमर से लेकर कंधे तक गहरे गड्ढों में गिरकर कई मवेशियों की मौत हो चुकी है। कर्मचारियों से गड्ढे पाटने की मांग की गई, पर उन्हें खुला छोड़ दिया गया। बाद में ग्रामीणों ने पराली डालकर अस्थायी रूप से उन्हें ढकने की कोशिश की, लेकिन हादसे का खतरा अब भी बना हुआ है।
पहले नोटिस, फिर वार्षिक प्रतिकर पर असहमति
यह विवाद अचानक नहीं उठा। इससे पहले जारी एसडीएम नोटिस और प्रस्तावित वार्षिक भूतल प्रतिकर (एनुअल सरफेस कंपंसेशन) नीति को लेकर ग्रामीणों में असंतोष था। किसानों का कहना है कि बिना ग्राम पंचायतों की स्पष्ट सहमति और व्यापक जनसुनवाई के प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है। उनका तर्क है कि यदि भूमि अधिग्रहण कानून के तहत बाजार मूल्य के अनुरूप एकमुश्त मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार की गारंटी दी जाए तो वे संवाद के लिए तैयार हैं। लेकिन वार्षिक किराए के नाम पर जमीन देना उन्हें अपने भविष्य से समझौता लगता है।
पवित्र भूमि पर खनन का प्रस्ताव क्यों?
जनार्दनपुर केवल उपजाऊ खेती के लिए ही नहीं, बल्कि जिले के विख्यात संत बाबा कंगाल दास के आश्रम के कारण भी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। यहां प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि आश्रम परिसर और आसपास की जमीन को भी प्रस्तावित खनन क्षेत्र में शामिल किए जाने की चर्चा से धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। उनका कहना है कि जिस भूमि को वे पवित्र मानते हैं, वहां खनन की अनुमति देना सामाजिक और सांस्कृतिक अस्मिता की अनदेखी है।
प्रशासनिक प्रक्रिया पर किसानों ने उठाए सवाल
सतीश शुक्ला, कृष्णनारायण सिंह, रामप्रसाद शुक्ला, सतेंद्र पांडेय, कुलदीप और समरबहादुर सिंह समेत कई ग्रामीणों का दावा है कि एसडीएम की नोटिस सार्वजनिक होने तक उन्हें यह जानकारी तक नहीं थी कि उनकी जमीन खनन के लिए चयनित की जा रही है। उनका आरोप है कि न तो कोई प्रशासनिक अधिकारी गांव पहुंचा और न ही कंपनी प्रबंधन ने खुली बैठक कर स्थिति स्पष्ट की। अब मवेशियों की मौत और खुले गड्ढों से बढ़ते खतरे ने ग्रामीणों के आक्रोश को और तीखा कर दिया है। गांव में यह सवाल उठ रहा है कि यदि खनन से पहले ही सुरक्षा मानकों की यह स्थिति है, तो आगे हालात क्या होंगे?
पुजारी गिरजाशरण की आत्मदाह की चेतावनी
कंगालदास आश्रम के पुजारी गिरजाशरण शुक्ल, जो स्वयं स्थानीय किसान भी हैं, प्रशासनिक रवैये से बेहद आहत हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना उचित मुआवजा और वैधानिक प्रक्रिया के वे अपनी जमीन पर कंपनी कर्मचारियों को कदम नहीं रखने देंगे। उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वे आंदोलन और कानूनी लड़ाई का रास्ता अपनाएंगे। इसके बाद भी यदि जबरदस्ती की गई तो आत्मदाह जैसे कठोर कदम से भी पीछे नहीं हटेंगे।
अब 26 को किसानों की एसडीएम कार्यालय में पेशी
विवाद के बीच 26 फरवरी को रामपुर स्थित एसडीएम कार्यालय में किसानों को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया है। पहले ग्रामीणों को बताया गया था कि 17 फरवरी को उन्हें पक्ष रखना है। इधर, किसानों का कहना है कि कई किसानों को व्यक्तिगत रूप से नोटिस नहीं मिला है, ऐसे में यह देखना अहम होगा कि कितने किसान अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाते हैं। गांवों की जमीनों के लिए आज का दिन निर्णायक माना जा रहा है। किसानों का स्पष्ट कहना है कि संवाद और न्याय के बिना खनन नहीं करने देंगे तथा सुरक्षा और रोजगार की गारंटी के बिना जमीन नहीं देंगे। यदि प्रशासन और कंपनी ने संवाद का रास्ता नहीं अपनाया, तो यह असंतोष व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
जनार्दनपुर और आसपास के गांवों में माहौल फिलहाल तनावपूर्ण है और सभी की निगाहें आज होने वाली एसडीएम कार्यालय की सुनवाई पर टिकी हैं।

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