मध्य प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में 9 साल बाद छात्रसंघ चुनाव कराने की तैयारी शुरू हो गई है। हाईकोर्ट के निर्देश और अकादमिक कैलेंडर की पूरी जानकारी यहाँ पढ़ें।

मध्य प्रदेश के शासकीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में करीब नौ साल के लंबे अंतराल के बाद छात्रसंघ चुनावों का रास्ता साफ हो गया है। जबलपुर निवासी छात्र नेता अदनान अंसारी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को 2026-27 का अकादमिक कैलेंडर पेश करने का निर्देश दिया था। इसके बाद सरकार ने अकादमिक कैलेंडर में सितंबर माह में चुनाव कराने का प्रावधान किया है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने इस कैलेंडर को रिकॉर्ड पर लेते हुए चुनाव प्रक्रिया के निर्देश दिए हैं।
अकॉर्डमिक कैलेंडर में चुनाव का प्रावधान होने के बावजूद यह अभी तय नहीं हुआ है कि चुनाव प्रत्यक्ष होंगे या अप्रत्यक्ष प्रणाली के तहत कराए जाएंगे। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल का कहना है कि चुनाव व्यवस्था को लेकर छात्र संगठनों से चर्चा के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा। दूसरी ओर, कांग्रेस और एनएसयूआई (NSUI) ने हर छात्र को सीधे अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देने के लिए प्रत्यक्ष चुनाव की पुरजोर मांग की है और मांग पूरी न होने पर प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।
चुनाव की घोषणा से पहले ही कांग्रेस पार्टी ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के निर्देश पर पूरे प्रदेश को 13 अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया गया है और छात्रसंघ चुनावों के लिए विशेष प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। इन प्रभारियों को विभिन्न छात्र संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करने तथा एनएसयूआई समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर जीत सुनिश्चित करने की अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है।
मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में तत्कालीन सरकार ने प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनावों पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद कुछ समय तक अप्रत्यक्ष चुनाव हुए। वर्ष 2006 में उज्जैन के माधव कॉलेज में प्रोफेसर एचएस सभरवाल की दुखद घटना के बाद चुनावों पर पूरी तरह प्रतिबंध लग गया था। वर्ष 2017 में नौ साल बाद आंशिक रूप से चुनाव बहाल किए गए थे, लेकिन उसके बाद कोरोना और अन्य कारणों से यह प्रक्रिया थम गई। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित लिंगदोह समिति की सिफारिशों (जैसे उम्मीदवारों की आयु, उपस्थिति, और खर्च की सीमा) के मानकों के आधार पर एक बार फिर कैंपस की राजनीति गर्माने लगी है।

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