मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि एससी/एसटी एक्ट की एफआईआर और चार्जशीट रद्द होने पर पीड़ित वित्तीय मुआवजे के हकदार नहीं हैं। जानिए इस मामले की पूरी डिटेल।

ग्वालियर। स्टार समाचार वेब
यह पूरा मामला मध्यप्रदेश के ग्वालियर जिले का है, जहां पिछोर थाने में दर्ज एक आत्महत्या के मामले से जुड़ा विवाद हाईकोर्ट तक पहुंचा था। याचिकाकर्ता मुन्ना बाबू शाक्य के भाई राकेश ने अपनी पत्नी के कथित अवैध संबंधों और प्रताड़ना से आहत होकर नदी में कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी। घटना के तुरंत बाद पुलिस ने मृतक के भाई की शिकायत पर आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना), धारा 34 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम यानी एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत मामला दर्ज किया था।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों ने अपने ऊपर दर्ज एफआईआर और कानूनी कार्रवाई को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए 4 जनवरी 2023 को एक बड़ा फैसला सुनाया था।
अदालत ने इस पूरे आपराधिक प्रकरण, दर्ज एफआईआर और पुलिस द्वारा पेश की गई चार्जशीट सहित तमाम कार्यवाहियों को पूरी तरह से रद्द कर दिया था।
कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया था कि इस मामले में किसी भी प्रकार की जातिगत दुर्भावना या एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत अपराध का कोई भी ठोस प्रमाण या आधार नहीं बनता है।
मुख्य आपराधिक मामला और एफआईआर रद्द होने के बाद, याचिकाकर्ता मुन्ना बाबू शाक्य ने अपने भाई की मृत्यु के एवज में शासन से 8.50 लाख रुपए के सरकारी मुआवजे की मांग को लेकर एक बार फिर रिट याचिका दायर की।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता की सिंगल बेंच ने याचिकाकर्ता की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा-
"एससी/एसटी नियमों के तहत दी जाने वाली वित्तीय सहायता या आर्थिक मुआवजे का मुख्य उद्देश्य वास्तविक पीड़ितों का पुनर्वास करना होता है। लेकिन यह आर्थिक राहत पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करती है कि अधिनियम के तहत अपराध घटित हुआ हो या प्रथम दृष्टया स्थापित होता हो। जब न्यायालय पूर्व में ही मुख्य एफआईआर और चार्जशीट को कानूनी रूप से निरस्त कर चुका है और वह आदेश अंतिम हो चुका है, तो ऐसी स्थिति में मुआवजे के दावे की पूरी कानूनी नींव ही समाप्त हो जाती है।"
यह फैसला देश और राज्य की कानूनी व्यवस्था में एक बड़ा उदाहरण पेश करता है। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
मुआवजे का आधार:
एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मिलने वाला मुआवजा केवल तभी देय है जब अपराध का मामला प्रथम दृष्टया सिद्ध हो या अदालत में प्रक्रिया आगे बढ़े।
गलत मुकदमों पर लगाम:
यदि कोई एफआईआर झूठी साबित होती है या कोर्ट द्वारा तकनीकी या तार्किक आधार पर रद्द कर दी जाती है, तो उसके आधार पर किसी भी प्रकार के वित्तीय लाभ या राहत की मांग नहीं की जा सकती।
न्यायपालिका की स्पष्टता:
इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि मुआवजे की राशि केवल वास्तविक पीड़ितों के कल्याण और पुनर्वास के लिए है, न कि कानूनी रूप से खारिज हो चुके मामलों में लाभ लेने का साधन।
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