मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने शिक्षक भर्ती से जुड़े एक मामले में बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक कारणों या कम मेरिट वालों को प्राथमिकता देकर अधिक अंक पाने वाले योग्य उम्मीदवारों के हितों का हनन नहीं होना चाहिए।

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा है कि चयन सूची में योग्यता के आधार पर उच्च स्थान पाने वाले उम्मीदवारों के अधिकारों का हनन नहीं किया जाना चाहिए। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बी. पी. शर्मा की खंडपीठ ने एकलपीठ के पुराने आदेश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी की है कि ऐसी व्यवस्था स्वीकार नहीं की जा सकती, जिसमें अधिक अंक प्राप्त करने वाले योग्य उम्मीदवार को कम अंक वाले उम्मीदवार की तुलना में निचले पायदान पर रखा जाए।
यह पूरा मामला शिक्षक पात्रता परीक्षा-2018 से जुड़ा हुआ है। प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड (PEB) ने स्कूल शिक्षा विभाग और आदिवासी कल्याण विभाग के शिक्षण पदों पर भर्ती के लिए एक संयुक्त (साझा) विज्ञापन जारी किया था। बड़ी संख्या में रिक्तियां होने के कारण दोनों विभागों की चयन प्रक्रिया को एक साझा ढांचे के तहत रखा गया था।
आरक्षित श्रेणियों के कई उम्मीदवारों ने अनारक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों से अधिक अंक हासिल किए। नियमों के तहत उन्हें मेरिट के आधार पर सामान्य रिक्तियों के विरुद्ध समायोजित किया गया और कई उम्मीदवारों को आदिवासी कल्याण विभाग के तहत स्कूल आवंटित कर दिए गए। हालांकि, इनमें से कई अभ्यर्थियों की पहली पसंद स्कूल शिक्षा विभाग के स्कूल थे, लेकिन कम अंक प्राप्त करने वाले अन्य उम्मीदवारों को स्कूल शिक्षा विभाग में नियुक्तियां दे दी गईं।
अक्टूबर-दिसंबर 2022 के दौरान जारी प्रशासनिक आदेशों के तहत यह नियम बना दिया गया कि जिन उम्मीदवारों को किसी एक विभाग में नियुक्ति मिल चुकी है, वे खाली सीटों के लिए होने वाली आगामी काउंसलिंग प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाएंगे। मूल भर्ती विज्ञापन में इस तरह की कोई शर्त नहीं थी।
अपीलकर्ताओं (रामनाथ शाह व अन्य) की ओर से अदालत में दलील दी गई कि इस नियम के कारण कम मेरिट वाले अभ्यर्थियों को स्कूल शिक्षा विभाग में नौकरी मिल गई, जबकि अधिक अंक होने के बावजूद उन्हें इस अवसर से वंचित कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन बताया। वहीं, शासन की ओर से तर्क दिया गया कि एक विभाग में नियुक्ति के बाद अभ्यर्थी दूसरे मौके का दावा नहीं कर सकते।
युगलपीठ ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि प्रशासनिक विसंगतियों के कारण अधिक योग्यता रखने वाले अभ्यर्थियों को नुकसान उठाना पड़ा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल प्रशासनिक कारणों या प्रक्रियागत खामियों के चलते मेरिट वाले उम्मीदवार को कम अंक पाने वाले अभ्यर्थी से पीछे नहीं छोड़ा जा सकता।
हाईकोर्ट ने एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए निर्देश दिए हैं कि मेरिट के आधार पर चयनित अपीलकर्ताओं को उनकी पसंद के अनुसार पोस्टिंग देने पर विचार किया जाए। संबंधित विभाग में रिक्तियां उपलब्ध होने पर उन्हें तुरंत समायोजित किया जाए। यदि वर्तमान में पद खाली नहीं हैं, तो अगले दो महीनों के भीतर स्कूल चॉइस फिलिंग पॉलिसी के तहत उन्हें दूसरे विभाग में विधिवत समायोजित किया जाए।
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