सतना और रीवा नगर निगम की राजनीति अक्सर जनप्रतिनिधियों के करियर की अंतिम सीढ़ी बनकर रह जाती है। जिले में अब तक कोई भी महापौर विधानसभा या लोकसभा तक नहीं पहुंच सका। इसके उलट, जिला पंचायत से निकलकर कई नेता विधायक-सांसद बने। सवाल है — क्या योगेश ताम्रकार, राजेश पालन और अजय मिश्रा इस ट्रेंड को बदल पाएंगे?

हाईलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
महापौर और नगर निगम अध्यक्ष बनने का सपना आम तौर पर किसी भी जनप्रतिनिधि की राजनीतिक यात्रा की ‘सफल शुरूआत’ मानी जाती है, लेकिन विंध्य क्षेत्र के सतना और रीवा जैसे जिÞलों में, हालात इसके उलट दिखते हैं। यहां नगर निगम की सत्ता की कुर्सी तक तो कई नेता पहुंचे, मगर अधिकांश की राजनीति वहीं थम गई। न तो लोकसभा का रास्ता खुला, न विधानसभा की चौखट पार कर सके। इसके उलट, यदि जिला पंचायत की ओर नजर दौड़ाई जाए तो तस्वीर पूरी तरह से बदली हुई दिखती है। जिला पंचायत ने सांसद व विधायक देकर जहां नेताओं के लिए पालिटिकल एक्सीलरेटर का काम किया वहीं नगर निगम पालिटिक्स में ब्रेक की तरह अब तक सामने आया है। ऐसे में सतना के वर्तमान महापौर योगेश ताम्रकार और नगर निगम अध्यक्ष राजेश चतुर्वेदी पालन के साथ-साथ रीवा के महापौर अजय मिश्रा और नगर निगम अध्यक्ष व्यंकटेश पांडे के समक्ष इस मिथक को तोड़ने की चुनौती होगी। देखना दिलचस्प होगा कि नगर निगम में बेहद सशक्तता के साथ राजनीति करने वाले योगेश और पालन भविष्य की राजनीति में क्या मुकाम हासिल करते हैं?
अब तक सतना-रीवा में इन चेहरों ने संभाली महापौर की कमान
सतना नगर निगम में महापौर की बागडोर अब तक जिन नेताओं के हाथों में रही है, उनमें राजाराम त्रिपाठी, डॉ बीएल यादव, विमला पांडेय, पुष्कर सिंह तोमर, विष्णु त्रिपाठी, ममता पांडेय और वर्तमान में योगेश ताम्रकार शामिल हैं। इनमें से राजाराम त्रिपाठी दो लोकसभा और दो विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं, परंतु कोई भी चुनाव नहीं जीत पाए। इसी प्रकार पुष्कर सिंह तोमर भी विधानसभा का चुनाव हार गए। स्व. डा. बीएल यादव के मेयर काल में नगर निगम अध्यक्ष रहे सुधीर सिंह तोमर ने लोकसभा तक की लड़ाई लड़ी मगर उन्हें भी सफलता नहीं मिली। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि सतना नगर निगम के महापौरों की राजनीतिक यात्रा जिÞला स्तर पर ही ठहर जाती है। इसी प्रकार यदि रीवा में महापौरों की सूची को देखा जाय तो पहली मर्तबा अमीर उल्ला खान महापौर बने । इसके बाद सावित्री पांडे, कमलजीत सिंह डांग, राजेंद्र ताम्रकार , आशा सिंह, वीरेंद्र गुप्ता,शिवेंद्र सिंहपटेल, ममता गुप्ता को मेयर का दायित्व रीवा की जनता ने सौंपा जबकि वर्तमान में अजय मिश्रा रीवा नगर निगम के महापौर हैं। रीवा के भी किसी महापौर की राजनीति नगर निगम के आगे नहीं बढ़ पाई। जाहिर है कि महापौर बनने वाले अधिकांश नेता या तो राजनीति से गायब हो गए या फिर स्थानीय स्तर पर ही सीमित रह गए।
क्या भविष्य में बदलेगा ट्रेंड?
मौजूदा समय पर सतना नगर निगम में योगेश ताम्रकार महापौर तो राजेंश चतुर्वेदी पालन नगर निगम अध्यक्ष का दायित्व संभाल रहे हैं जबकि रीवा नगर निगम में अजय मिश्रा मेयर और व्यकटेश पांडेय नगर निगम अध्यक्ष हैं। दोनो ही नगर निगम से अब तक बड़े नेता नहीं निकल सके हैं। ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि क्या नगर निगम सतना व रीवा के जनप्रतिनिधि भविष्य में अपनी राजनीति आगे ले जाकर यह ट्रेंड बदल सकेंगे? इस सवाल का जवाब तो आने वाले चुनाव ही देंगे लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कोई महापौर अपने कार्यकाल में जनता से सीधा जुड़ाव बना पाता है, स्मार्ट सिटी जैसी योजनाओं का असरदार क्रियान्वयन करता है और राजनीतिक जमीन मजबूत करता है-तो वह विधानसभा और संसद में भी अपनी जगह बना सकता है।
जिला पंचायत बनी आगे की राजनीति की सीढ़ी
अब यदि जिला पंचायत को देखें तो तस्वीर पूरी तरह से बदली हुई दिखती है। बीते 5 बार से लगातार चुनाव जीतकर लोकसभा में सतनाका प्रतिनिधिनित्व करने वाले वर्तमान सांसद गणेश सिंह जिला पंचायत की अध्यक्षी का दायित्व भी संभाल चुके हैं। एक और जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुके धीरेंद्र सिंह धीरू भी विस चुनाव जीतकर विधानसभा के गलियारे में पूर्व में पहुंच चुके हैं। उधर रीवा जिला पंचायत के प्रतिनिधि आगे की राजनीति में भी बढ़े। अभय मिश्रा इसके उदाहरण है जो जिला पंचायत रीवा के अध्यक्ष रहे और उसके बाद दो मर्तबा विधायक का दायित्व भी जनता ने दिया। ये उदाहरण बताते हैं कि जिला पंचायत अध्यक्ष का पद राजनीतिक दृष्टि से कहीं अधिक ‘लॉन्चिंग पैड’ साबित हुआ है, बजाय नगर निगम के महापौर पद के।
तो क्या है नगर निगम से आगे न बढ़ पाने की वजहें?
इस संबंध में स्टार समाचार ने पूर्व महापौरों से चर्चा कर यह समझने की कोशिश की कि आखिर वे कौन से कारण हैं जो नगर निगम का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधियों की राजनीति में ब्रेक लगा देती है जबकि जिला पंचायत की राजनीति नेताओं की पालिटिक्स को एक्सलरेट कर देती है। चर्चा में निम्न अहम कारण गिनाए गए
सीमित राजनीतिक प्रभाव: महापौर का पद दिखने में भले ही बड़ा हो, लेकिन उसका प्रभाव सिर्फ शहर के वार्डों तक ही सीमित रहता है। इसके मुकाबले जिला पंचायत ग्रामीण इलाकों तक पहुंच बनाती है, जो चुनावी गणित में अहम होते हैं।
संगठनात्मक समर्थन की कमी: महापौर बनने के बाद नेताओं को प्राय: पार्टी संगठन से व्यापक समर्थन नहीं मिलता, जिससे वे विधानसभा या लोकसभा जैसे बड़े चुनावों में जमीनी तैयारी नहीं कर पाते।
पब्लिक परसेप्शन: जनता महापौर को अक्सर एक ‘प्रशासनिक चेहरा’मानती है, जो सड़कों, नालियों और सफाई तक सीमित होता है। ऐसे में जब यही चेहरा विधानसभा या लोकसभा चुनाव में सामने आता है, तो लोग उस भूमिका को छोटा अनुभव मानते हैं।
सत्ता और संसाधनों की सीमाएं: नगर निगम महापौर के पास सीमित फंड और निर्णय लेने की सीमित शक्ति होती है। इसके चलते उनकी ‘राजनीतिक साख’ क्षेत्र में नहीं बन पाती।
रणनीति भी जिम्मेदार: कई बार पार्टियां भी महापौर को टिकट तो देती हैं, लेकिन उन्हें आगे की राजनीति के लिए तैयार नहीं करतीं। कई नेताओं को नगर निगम तक सीमित रखने की अनकही नीति भी राजनीतिक दलों के भीतर देखने को मिलती है।
देखिए जनता के नकारने जैसी कोई बात नहीं है। इसे आप संयोग कह लें या फिर भाग्य कि सतना-रीवा में नगर निगम की राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधि राजनीति में आगे कोई मुकाम नहीं बना पाए। दूसरे जिलों की नगर निगम के कई नेता बड़े मंच तक पहुंचे हैं। कैलाश विजय वर्गीय व उमाशंकर गुप्त इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
राजाराम त्रिपाठी, पूर्व महापौर
महापौर का पद दिखने में भले ही बड़ा हो, लेकिन उसका प्रभाव सिर्फ शहर के वार्डों तक ही सीमित रहता है। कई बार महापौर बनने के बाद जनप्रतिनिधि शहर की चिंता छोड़ दिल्ली-भोपाल को मेंटेन करने में जुट जाते हैं और शहर की फिक्र पीछे छूट जाती है, जिससे जनता विमुख हो जाती है। इसके मुकाबले जिला पंचायत ग्रामीण इलाकों तक पहुंच बनाती है, जो चुनावी गणित में अहम होते हैं। पार्टियां भी महापौर को टिकट तो देती हैं, लेकिन उन्हें आगे की राजनीति के लिए तैयार नहीं करतीं।
पुष्कर सिंह तोमर, पूर्व महापौर
देखिए नगर निगम का प्रतिनिधि जनता के काम से सीधा जुड़ा रहता है। नाली, सड़क व बिजली जैसे मसलों पर कई बार कड़े निर्णय भी लेने पड़ते हैं, जिससे लोग नाराज भी होते हैं। हालंकि नगर पालिका ने सतना व रीवा में डा. लालता प्रसाद खरे व नागेंद्र सिंह जैसे नेता दिए हैं जो विधायक भी बने। नगर निगम गठन के बाद जरूर जनता ने निगम के जनप्रतिनिधियों को मौका नहीं दिया।
सुधीर सिंह तोमर, पूर्व नगर निगम अध्यक्ष
महापौर शहर का मुखिया होता है जिसके पास पावर होती है। मेयर बनने के बाद राजनीतिक कद भी बढ़ता है जिससे कई बार पार्टी के ही लोग भयभीत होकर उसकी राजनीतिक जड़ें काटने लगते हैं। मेयर की राजनीति आगे न बढ़ पाने का एक बड़ा कारण यह भी है। दूसरी अहम बात यह है कि मेयर पद को आरक्षण के दायरे से बाहर रखना चाहिए ताकि सुयोग्य प्रत्याशियों को मौका मिल सके और वे आगे की राजनीति में बढ़ सकें।
ममता पांडेय, पूर्व महापौर
एक तो पार्टियां ननि के जनप्रतिनिधियों को बड़े चुनावों में मौका नहीं देती हैं। उदाहरणार्थ मैं 1999 से लगातार ननि की राजनीति कर रहा हूं और मेरा परिवार लगातार वार्ड की सेवा करता रहा है, लेकिन किसी चुनाव में मेरी दावेदारी को तवज्जों नहीं दी गई। जिन्हें चुनावों में मौका मिला उनकी असफलता जरूर हैरान करती है। जाहिर है कि जनता ने उनके कामों को नकार दिया।
रामकुमार तिवारी, पूर्व नेता प्रतिपक्ष


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