रीवा के संजय गांधी अस्पताल को लेकर मरीजों को निजी अस्पतालों में रेफर किए जाने, सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर असर और प्रशासनिक निगरानी को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। संबंधित आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना शेष है।

हाइलाइट्स:
रीवा, स्टार समाचार वेब
तीन दशक पहले जब विंध्य की वादियों में एक अत्याधुनिक अस्पताल की परिकल्पना की गई थी तो मकसद साफ था इलाज के अभाव में दम तोड़ती सांसों को बचाना। संजय गांधी अस्पताल की नींव से जो उम्मीदें जगी थीं वो वक्त के साथ सरकारी व्यवस्था की तरह ही चरमरा गर्इं। इस टूटते भरोसे को भांपकर उप मुख्यमंत्री के प्रयासों से शहर को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल की सौगात मिली। करोड़ों की मशीनें आर्इं, देश के नामी विशेषज्ञ आए लेकिन आज यह आलीशान ढांचा चंद डॉक्टरों की निजी महत्वाकांक्षाओं और लालच की भेंट चढ़ता दिखाई दे रहा है। आज विंध्य की लाइफ लाइन कहे जाने वाले संजय गांधी अस्पताल के वजूद का अंत लिखने वाले खुद यही धरती के भगवान हैं।
शाम ढलते ही शहर की चमचमाती सड़कों पर बड़े-बड़े साइनबोर्ड और एलईडी लाइट की रोशनी बिखरने लगती है। ये रोशनी उन डेढ़ सौ से ज्यादा निजी अस्पतालों की हैं जिन्हें आज एक तथाकथित मेडिकल हब की पहचान दी जा रही है। संजय गांधी अस्पताल के गलियारों में किसी कोने में बैठी एक बूढ़ी आंखें अपने मरीज के ठीक होने का इंतजार करती हैं तो वहीं दूसरी ओर कुछ सफेदपोश पहने धरती के भगवान एक दूसरी ही पटकथा लिख रहे होते हैं। सरकारी व्यवस्था को हांसिए पर धकेलने का खेल उन्हीं के हाथों हो रहा है जिन्हें इस व्यवस्था को मजबूत करने की जिम्मेदारी मिली थी। अस्पताल में भर्ती मरीजों को बेहतर इलाज, आधुनिक मशीन या किसी अन्य मजबूरी का वास्ता देकर धीरे से अपने खुद के निजी अस्पतालों का रास्ता दिखाया जाता है। इस रेफरल खेल में मरीज सिर्फ एक पर्चा नहीं बल्कि एक मोटी कमाई का जरिया बनकर रह जाता है। जो गरीब पाई-पाई जोड़कर आता है वह चंद दिनों में इन निजी अस्पतालों की चौखट पर कर्ज की दलदल में डूब जाता है।
प्रशासन का मौन और गहराती चिंता
सबसे हैरान करने वाली बात प्रशासनिक तंत्र की खामोशी है। सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद लेने का यह रवैया इस पूरे गोरखधंधे को शह दे रहा है। अगर समय रहते इस लापरवाही और चिकित्सकों के इन कारनामों पर लगाम नहीं कसी गई तो वह दिन दूर नहीं जब रीवा का यह गौरवशाली चिकित्सा संस्थान सिर्फ कागजों और इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगा। रीवा को मेडिकल हब बनाने की जरूरत जरूर है लेकिन सरकारी अस्पताल की अर्थी पर निजी अस्पतालों के महल खड़े करके नहीं।
वजूद पर मंडराता खतरा
संजय गांधी अस्पताल ने दशकों से विंध्य के लाखों परिवारों को नया जीवन दिया है लेकिन आज स्थिति यह है कि डॉक्टर्स के अपने निजी स्वार्थों और अपने ही अस्पतालों को चमकाने की होड़ ने इस सरकारी संस्थान के वजूद पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकारी अस्पताल के सबसे काबिल चेहरे ही मरीजों को निजी क्लीनिकों की ओर धकेलेंगे तो इस ऐतिहासिक संस्थान को अपनी साख बचाने के लिए किसके भरोसे छोड़ा जाएगा।
आयुष्मान है तो...
अस्पताल के भीतर एक और कड़वा सच पैर पसार चुका है। यहां सबसे ज्यादा तवज्जो उन मरीजों को मिलती है जिनके पास आयुष्मान कार्ड है। वजह साफ है सरकार द्वारा तय नियमों के मुताबिक आयुष्मान के तहत इलाज करने पर डॉक्टरों को एक निश्चित प्रोत्साहन राशि मिलती है। अगर आपके पास आयुष्मान कार्ड नहीं है तो सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में आपके लिए बेड अचानक फुल हो जाते हैं और चलती हुई मशीन खराब बता दी जाती हैं। ऐसे बेवस मरीजों को सीधे निजी अस्पतालों का रास्ता दिखाया जाता है। हैरानी की बात यह है कि जिन मरीजों को सरकारी अस्पताल में नो बेड का बहाना बनाकर रेफर किया जाता है, निजी अस्पतालों में वही डॉक्टर उनका इलाज करने खड़े मिलते हैं।


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