संपदा 2.0 योजना, जिसे सरकार ने डिजिटल क्रांति की दिशा में बड़ा कदम बताया था, अब जनता के लिए मुसीबत बन गई है। सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली और विदिशा समेत प्रदेश के जिलों में नामांतरण, बटवारा, खसरा सुधार और रजिस्ट्री जैसी प्रक्रियाएं महीनों से अटकी हुई हैं। तकनीकी खामियां, सर्वर डाउन, अधूरी प्रविष्टियां और पटवारियों की मनमानी ने लोगों का भरोसा डगमगा दिया है।
By: Yogesh Patel
Sep 25, 20255:52 PM
हाइलाइट्स
सतना, स्टार समाचार वेब
सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली और विदिशा समेत प्रदेश के कई जिलों में नामांतरण, बटवारा, रिकार्ड सुधार के हजारों आवेदन लंबित पड़े हुए हैं, जिसके चलते सरकार ने जिस संपदा 2.0 योजना को डिजिटल क्रांति की दिशा में एक बड़ा कदम बताया था, वही अब आम जनता के लिए सिरदर्द बन गई है। रजिस्ट्री, नामांतरण, रिकार्ड सुधार प्रक्रिया को आसान और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई इस व्यवस्था में तकनीकी खामियां, अधूरी प्रविष्टियां और राजस्व कर्मचारियों की मनमानी ऐसी बाधाएं बन रही हैं कि आम लोग रजिस्ट्री कराने से पहले ही हतोत्साहित हो जाते हैं।
हालांकि, अधिकारी इसे तकनीकी समस्या कहकर टाल रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि नामांतरण, खसरा सुधार, रजिस्ट्री जैसी जरूरी प्रक्रिया में तकनीकी खामियां और विलंब लोगों को परेशान कर रही है। इससे न केवल डिजिटल व्यवस्था से जनता का भरोसा डगमगा रहा है, बल्कि भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की आशंका भी बढ़ रही है। डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य पारदर्शिता और सुविधा था, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। सर्वर डाउन और तकनीकी खामियां तो हैं ही, साथ ही पटवारियों और राजस्व कर्मचारियों की लापरवाही तथा मनमानी ने जनता का भरोसा तोड़ दिया है। लोग अब यह कहने लगे हैं कि नई व्यवस्था भ्रष्टाचार को खत्म करने के बजाय और बढ़ावा दे रही है।
राजस्व कर्मी भी परेशान
पोर्टल की तकनीकी गड़बड़ी से आम जनता के साथ ही राजस्व महकमे के कर्मचारी भी परेशान हैं, क्योंकि उन्हें जनता के सीधे सवालों से जूझना पड़ता है। सतना की रघुराजनगर तहसील के तहसीलदार सौरभ मिश्र बताते हैं कि संपदा 2 में की गई व्यवस्थाएं जनमानस के लिए बेहद हितकारी हैं, लेकिन अभी तकनीकी त्रुटियों से लेटलतीफी हो जाती है। कई बार पटवारी प्रतिवेदन तैयार कर रिपोर्ट देता है तो अनआइडेंटिफाइड एरर बताने लगता है। चूंकि पटवारी रिपोर्ट के बिना प्रक्रिया पूरी नहीं होती तो प्रकरण लंबित हो जाता है। एआई बेस्ड साफ्टवेयर की इस नई व्यवस्था में नामांतरण एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। कारण, एक खसरा के अलग-अलग भाग के सभी भूमि मालिकों को ओटीपी भेजकर सहमति ली जाती है। भले ही क्रेता ने किसी एक भाग को खरीदा है। ऐसे में सभी भूमि मालिकों को खोजना चुनौती है। किसी एक का भी ओटीपी नहीं मिलता तो जमीन का नामांतरण नहीं हो पाता। जिले के संपत्ति खरीदारों, पटवारियों और स्टांप वेंडरों से बात की गई तो अलग-अलग तरह की परेशानियां सामने आर्इं।
पटवारियों और राजस्व कर्मचारियों की मनमानी
तकनीकी खामियों से भी बड़ी समस्या पटवारियों और स्थानीय राजस्व कर्मियों की लापरवाही और जानबूझकर की जाने वाली गड़बड़ियां हैं। जमीन का पूरा ब्यौरा न भरकर अधूरी प्रविष्टियां डाल दी जाती हैं, बल्कि नामांतरण या खातेदारी के मामलों में सही जानकारी दर्ज नहीं की जाती। कई बार जानबूझकर गलत जानकारी पोर्टल पर चढ़ाई जाती है, ताकि बाद में आवेदक को दिक्कत हो और वे चढ़ोत्री चढ़ाने के लिए मजबूर हो जाएं। इससे न केवल खातेदार महीनों तक परेशान होते हैं, बल्कि फर्जीवाड़े और विवादों की आशंका भी बढ़ती है। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और गंभीर है। जिन किसानों को डिजिटल व्यवस्था से पारदर्शिता और सुविधा मिलने की उम्मीद थी, वही अब पटवारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार के कारण न्याय पाने से वंचित हो रहे हैं।
लंबी प्रतीक्षा जनता की परेशानी
संपदा 2.0 के सुचारू रूप से काम न करने के चलते लोग मजबूरी में संपदा 1.0 का सहारा ले रहे हैं। लेकिन वहां भी स्लॉट कम होने के कारण 10 दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। इस बीच राजस्व कर्मचारी अपनी पकड़ बनाए रखते हैं और आवेदक से मनमानी वसूली करने का अवसर तलाशते हैं।
केस क्र. 1- सतना जिले के बचवई निवासी रामजी बागरी पिता नत्थूलाल बागरी बीते 6 माह से पट्टा के लिए भटक रहे हैं। रजिस्ट्री हो गई पर पट्टे के लिए बता दिया जाता है कि सर्वर डाउन है या फिर कोई तकनीकी त्रुटि बताकर लौटा दिया जाता है।
केस 2- इटमा गांव निवासी राम औतार कुशवाहा बीते कई माह से दस्तावेज सुधार के लिए भटक रहे हैं। दावा कि वे 10 बार तो जनसुनवाई में फरियाद सुना चुके हैं, लेकिन उनकी समस्या जस की तस है।
केस-3 - सरिस ताल, अमौधा समेत कई स्थलों पर लोगों ने महीनों पहले जमीनें खरीदीं लेकिन नामंतरण व रिकार्ड दुरूस्तगी के लिए अभी भी भटकाव जारी है। कभी पोर्टल की समस्या सामने आती है तो कभी कर्मचारियों की।
केस-4- जून माह की 4 तारीख को सक्सेना परिवार ने सीधी में नामांतरण का आवेदन लगाया। हर बार सर्वर डाउन की समस्या बताकर टाल दिया गया। लंबी जद्दोजहद के बाद सितंबर माह में गत दिवस नामांतरण व बंटवारा के दस्तावेज दुरूस्त हुए।
ये हैं तकनीकी खामियां
सर्वर का बार-बार डाउन होना, ओटीपी न आना, जीआईएस मैपिंग की गड़बडिय़ां और आधार प्रमाणीकरण की समस्याओं ने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कई बार फाइल अपलोड नहीं हो पाती।
नामांतरण और शहरी रिकाड्र्स में त्रुटियां रहती हैं।
बुजुर्गों के थंब इंप्रेशन या रेटिना स्कैन काम न करने से प्रक्रिया अटक जाती है।
जीआईएस मैपिंग में प्लॉट की सही लोकेशन तक नहीं मिलती।
कहते हैं अफसर
शासन ने संपदा-2 योजना चालू की है ताकि रजिस्ट्री कराने वाले लोगों को भटकना न पड़े और सहूलियत मिल सके। लेकिन संपदा-2 में कुछ परेशानियां आ रही हैं, इसकी हम जानकारी लेंगे। इसके बाद ही इस संबंध में कुछ बता पाएंगे कि इससे कैसे निजात मिल सकती है।
बीएस जामोद, कमिश्नर रीवा संभाग
देखिए संपदा 2 जनता के हित के लिए बेहद मुफीद योजना है। अभी कुछ तकनीकी समस्याएं हैं, जिसके कारण नामांतरण, खसरा सुधार जैसी प्रक्रिया बाधित हो रही है। इससे हम उच्चाधिकारियों को लगातार अवगत करा रहे हैं।
सौरभ मिश्रा, तहसीलदार, रघुराजनगर तहसील, सतना
रीवा जिले में रजिस्ट्री के मामले में सर्वर में किसी तरह की दिक्कतें नहीं आ रही हैं। यहां सर्वर ठीक चल रहा है। रजिस्ट्रियां भी जो स्लॉट बुक होती हैं वह समय पर हो रही हैं, कोई रजिस्ट्री होल्ड पर नहीं है। दिक्कतें नामांतरण वगैरह में हो सकती हैं।
सोनीलाल परस्ते, वरिष्ठ उप पंजीयक, रीवा
देखिए, रजिस्ट्री में कोई दिक्कत नहीं है। यदि कोई समस्या है तो रजिस्ट्रार बता सकेंगे। संपदा 2 पोर्टल एक बेहतर योजना है, हालांकि नामांतरण जैसे मामलों में कभी-कभी तकनीकी समस्या आ जाती है।
सृजन वर्मा, एसडीएम सिंगरौली
संपदा 2 के प्रावधान बेहद सुविधाजनक हैं, लेकिन अभी तकनीकी दिक्कत के कारण काम प्रभावित होते हैं। यह समस्या भोपाल तक बनी हुई है। उम्मीद है कि जल्द ही पोर्टल की तकनीकी बाधाएं शासन स्तर से दुरुस्त हो जाएगी और प्रक्रिया सरल हो जाएगी।
आरती यादव, तहसीलदार, सिंगरौली